उच्चतम न्यायालय ने 'गर्भधारण-पूर्व और प्रसव-पूर्व निदान तकनीक' (PCPNDT) अधिनियम, 1994 के सख्त क्रियान्वयन की आवश्यकता दोहराई है। न्यायालय ने कहा कि लिंग चयन (यानी पुत्र प्राप्ति को प्राथमिकता) की प्रथाएं अभी भी जारी हैं, जिससे लिंगानुपात में असंतुलन उत्पन्न हो रहा है।
- PCPNDT अधिनियम, 1994: यह अधिनियम घटते लिंगानुपात की समस्या से निपटने और लिंग-चयन संबंधी प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए 1994 में पारित किया गया था तथा 1996 में लागू हुआ।
लिंगानुपात में असंतुलन के कारण
- पितृसत्तात्मक पुत्र-मोह: समाज में गहरी जड़ें जमा चुके लैंगिक मानदंड लड़कों को लड़कियों की तुलना में अधिक सामाजिक और आर्थिक महत्व देते हैं। वृद्धावस्था में माता-पिता के सहारे की अपेक्षा भी इस सोच को और अधिक मजबूत करती है।
- विवाह संबंधी रीति-रिवाज: दहेज और पितृस्थानिकता (शादी के बाद ससुराल जाकर रहना) परंपरा के कारण बेटियों को परिवार पर आर्थिक बोझ के रूप में देखा जाता है तथा परिवार के भविष्य के सहारे के रूप में उनकी भूमिका कम आंकी जाती है।
- प्रत्येक स्तर पर लैंगिक भेदभाव: महिलाओं के प्रति लगातार होने वाला भेदभाव और अवसरों की असमानता लिंगानुपात में असंतुलन जारी रखती है।
- वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट 2025 (Global Gender Gap Report 2025) में भारत की रैंकिंग 148 देशों में 129वें स्थान से गिरकर 131वें स्थान पर पहुंच गई, जो देश में लगातार जारी लैंगिक असमानता को दर्शाती है।
- प्रौद्योगिकियों का दुरुपयोग: प्रसव-पूर्व निदान तकनीकें लिंग-चयन और कन्या भ्रूण हत्या को आसान बनाती हैं।
- कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन का अभाव: भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (IPC) में सख्त प्रावधान होने के बावजूद उनका प्रभावी और व्यापक क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप, लिंगानुपात में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है।
- जनगणना के बाल-लिंगानुपात के आंकड़ों के अनुसार, 1991 में प्रति 1000 लड़कों पर 945 लड़कियाँ थीं, जो 2001 में घटकर 927 और 2011 में 919 रह गईं।
लिंगानुपात बढ़ाने हेतु सरकारी पहलें
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