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अटल इनोवेशन मिशन (AIM), नीति आयोग और केंद्र सरकार ने कश्मीर विश्वविद्यालय के सहयोग से ATL सारथी और फ्रंटियर रीजन प्रोग्राम शुरू किया है।

  • फ्रंटियर रीजन प्रोग्राम के तहत जम्मू और कश्मीर में 500 नए अटल टिंकरिंग लैब्स (ATLs) स्थापित किए जाएंगे।

अटल इनोवेशन मिशन (AIM) के बारे में:

  • 2016 में नीति आयोग द्वारा शुरू किया गया।
  • उद्देश्य: नवाचार और उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देना।

अटल टिंकरिंग लैब (ATL) के बारे में:

  • ये अटल इनोवेशन मिशन के तहत स्कूलों में स्थापित अत्याधुनिक लैब हैं।
  • उद्देश्य: देश भर में कक्षा 6 से 12 तक के बच्चों में 21वीं सदी के उपकरणों और तकनीकों (जैसे-इंटरनेट ऑफ थिंग्स, 3D प्रिंटिंग आदि) के माध्यम से जिज्ञासा और नवाचार को बढ़ावा देना।

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने डिजिटल भुगतान लेन-देन के लिए नई ऑथेंटिकेशन (सत्यापन) दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

  • इस फ्रेमवर्क के तहत सभी प्रकार के डिजिटल भुगतानों में टू फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) अनिवार्य है, हालांकि किसी विशेष पद्धति या फैक्टर को अनिवार्य नहीं किया गया है।
  • कम से कम एक ऑथेंटिकेशन फैक्टर ऐसा होना चाहिए, जो  डिजिटल भुगतान लेन-देन में बदलते रहना चाहिए (जैसे-पासवर्ड, OTP) या पुष्टि वाला होना चाहिए (जैसे-फिंगरप्रिंट)  । कार्ड-प्रेजेंट ट्रांजेक्शन में यह लागू नहीं होगा।

टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) के बारे में:

  • यह लेनदेन को सुरक्षित बनाने का एक तरीका है। इसमें किसी रिसोर्स या डेटा को अधिकृत रूप से प्राप्त करने के लिए पहचान के दो चरणों से गुजरना पड़ता है।
  • प्रक्रिया: इसका मैकेनिज्म तीन में से किसी दो फैक्टर को जोड़ता है:
    1. जिसे केवल आप जानते हैं (जैसे पासवर्ड);
    2. जो आपके पास है (जैसे फोन, टोकन);
    3. जो केवल आपकी विशेषता हैं (जैसे बायोमेट्रिक – फिंगरप्रिंट, फेस आईडी आदि)।

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ऑटोनॉमस मोबिलिटी रणनीति को बढ़ावा देने के लिए अपनी पहली सॉवरेन मोबिलिटी क्लाउड तकनीक लॉन्च की है।

  • सॉवरेन मोबिलिटी क्लाउड: यह अगली पीढ़ी के परिवहन के लिए सुरक्षित डिजिटल अवसंरचना प्रदान करता है।
    • यह हाई-डेफिनिशन मैपिंग, टेलीमैटिक्स, फ्लीट ऑपरेशंस, और ट्रैफिक मैनेजमेंट जैसी सेवाओं में मदद करता है।

ऑटोनॉमस मोबिलिटी के बारे में

  • यह तकनीक स्वचालित वाहनों के उपयोग पर आधारित है।
    • स्वचालित वाहन ऐसे वाहन होते हैं जिसे चलाने के लिए इंसान की बिलकुल जरुरत नहीं पड़ती है या बहुत कम जरुरत पड़ती है।
    • यह LiDAR (लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग), AI, GPS जैसी तकनीकों पर आधारित है।
  • संभावित लाभ: ट्रैफ़िक का बेहतर प्रबंधन, सड़क सुरक्षा में सुधार, आदि।

दूरसंचार विभाग (DoT) और FIU-IND ने साइबर अपराधों और वित्तीय धोखाधड़ी से निपटने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।

FIU-IND के बारे में:

  • स्थापना: 2004 में हुई।
  • यह एक केंद्रीय और राष्ट्रीय एजेंसी है, जो संदिग्ध वित्तीय लेन-देन से जुड़ी जानकारी प्राप्त करती है, उनकी जांच-पड़ताल और विश्लेषण करती है, और फिर यह जानकारी सुरक्षा एजेंसियों व विदेशी फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट के साथ साझा करती है।
  • यह एक स्वायत्त संस्था है, जो सीधे इकोनॉमिक इंटेलिजेंस काउंसिल (EIC) को सूचित करती है। इस परिषद का अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री हैं। यह संस्था धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के तहत अधिकार एवं शक्तियों का प्रयोग करती है।

डेनमार्क में संदिग्ध रूसी ड्रोन देखे जाने के बाद यूरोपीय संघ ने ‘ड्रोन वॉल’ बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। 

ड्रोन वॉल के बारे में

  • यह AI आधारित बहुस्तरीय ड्रोन-डिफेंस प्रणाली है। इसे  एयरशील्ड (Eirshield) कहा जाता है। यह एंटी-ड्रोन प्लेटफॉर्म है।
  • इसे हथियारों से लैस तेज गति से उड़ने वाले मानवरहित लक्ष्यों से निपटने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
  • यह ड्रोन घुसपैठ, GPS जैमिंग और अन्य अपरंपरागत हमलों के खिलाफ अर्ली वार्निंग, रियल टाइम में खतरे का पता लगाने और खुफिया जानकारी प्रदान करता है।

हाल ही में, ईरान द्वारा यूरेनियम संवर्धन फिर से शुरू करने पर चिंताएं व्यक्त की गई हैं।

यूरेनियम संवर्धन के बारे में

  • यूरेनियम संवर्धन (Enrichment of uranium) अर्थ है प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले तत्व में यूरेनियम-235 (U-235) के अनुपात को बढ़ाना तथा यूरेनियम-238 (U-238) को हटाना
  • तरीका: यह मुख्य रूप से सेंट्रीफ्यूज मशीन का उपयोग करके किया जाता है।
    • इसके तहत सेंट्रीफ्यूज में यूरेनियम गैस को अत्यधिक तेज गति से घुमाया जाता है। घुमाने से भारी U-238 (जो बाहर की ओर चला जाता है) हल्के U-235 (जो केंद्र के पास रहता है) से अलग हो जाता है।
  • संवर्धन स्तर और उपयोग:
    • (3–5%) U-235: इसका उपयोग नागरिक परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों में किया जाता है।
    • (20% से कम) U-235: इसे उच्च संवर्धित यूरेनियम (HEU) कहा जाता है, जिसमें परमाणु हथियार का रूप लेने की क्षमता होती है।
    • (लगभग 90%) U-235: इसे हथियार-ग्रेड माना जाता है, जो परमाणु हथियारों के लिए अनुकूल और कुशल होता है।

हाल ही में, भारत ने अनिवार्य लाइसेंस और फीडस्टॉक प्रमाण-पत्र आवश्यकताओं के तहत द्वितीय पीढ़ी (2G) के इथेनॉल के निर्यात की अनुमति दी है।

द्वितीय पीढ़ी (2G) के इथेनॉल के बारे में:

  • इसे "सेलुलोसिक इथेनॉल" या "एडवांस्ड बायोफ्यूल" भी कहा जाता है।
  • इसका उत्पादन पौधों के रेशे से होता है, जिसे सेलुलोज कहा जाता है।
  • 2G इथेनॉल के स्रोत: अपशिष्ट कृषि-अवशेष-जैसे धान के पुआल और गेहूं के डंठल, गन्ने का अपशिष्ट, मक्के के भुट्टे (Corn cobs) और डंठल, आदि।

इथेनॉल की अन्य पीढ़ियां 

  • प्रथम पीढ़ी (1G): खाद्य फसलें जैसे चावल, गेहूं, जौ, मक्का, आदि से बनाया जाता है।
  • तृतीय पीढ़ी (3G): जलीय बायोमास, जैसे-शैवाल से प्राप्त किया जाता है।
  • चतुर्थ पीढ़ी (4G): इंजीनियर्ड पौधों और सूक्ष्मजीवों से प्राप्त किया जाता है।

DRDO और सामरिक बल कमान (SFC) ने चलती ट्रेन में स्थापित मोबाइल लॉन्चर प्रणाली से मध्यम दूरी की अग्नि-प्राइम मिसाइल का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया।

  • यह चलती ट्रेन से दागी जाने वाली अपनी तरह की पहली फ्यूचरिस्टिक मिसाइल प्रणाली है जो बिना किसी पूर्व शर्त के रेल नेटवर्क पर संचालित हो सकती है।

अग्नि-प्राइम मिसाइल के बारे में 

  • यह DRDO द्वारा विकसित अत्याधुनिक, दो-चरणीय, ठोस-ईंधन वाली, कैनिस्टर-से लॉन्च होने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है।
    • यह अग्नि श्रृंखला में सबसे नई मिसाइल है।
  • मारक क्षमता: 2000 किलोमीटर तक
  • यह पारंपरिक और परमाणु, दोनों तरह के वारहेड्स ले जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 304 (a) का हवाला देते हुए कहा है कि, टैक्स प्रणाली का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता कि दूसरे राज्यों से आने वाली वस्तुओं के साथ भेदभाव हो

  • राज्य करों को इस तरह से निर्धारित कर सकते हैं कि बाहर से आने वाले सामान और राज्य के भीतर बने सामान पर टैक्स भार एक समान पड़े।

अनुच्छेद 304 (a) के बारे में

  • इसमें उल्लेख किया गया है कि एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश अन्य राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों से आने वाली वस्तुओं पर कर लगा सकता है।
    • हालाँकि, उसे आयातित वस्तुओं और स्थानीय रूप से निर्मित समान वस्तुओं के बीच भेदभाव नहीं करना चाहिए।
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