ये गलियारे ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में निर्मित किए जाएंगे। इन्हें दुर्लभ भू स्थायी चुंबक (REPMs) के खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और निर्माण के लिए विकसित किया जाएगा।
दुर्लभ भू स्थायी चुंबक (REPMs) क्या हैं?
- ये सबसे शक्तिशाली प्रकार के स्थायी चुंबकों में से हैं, जिनमें उच्च चुंबकीय शक्ति और स्थिरता होती है।
- उपयोग: इलेक्ट्रिक वाहन (EV) मोटर, पवन टरबाइन जनरेटर जैसे उन्नत इंजीनियरिंग अनुप्रयोगों में इनका उपयोग होता है।
- महत्त्व: 2030 तक REPMs की मांग दोगुनी होने की उम्मीद है।
भारत के लिए महत्त्व
- रणनीतिक आत्मनिर्भरता: इन गलियारों से भारत की महत्वपूर्ण सामग्रियों तक पहुंच सुनिश्चित होगी। इससे विशेष रूप से चीन से आयात पर भारत की अत्यधिक निर्भरता कम होगी।
- भारत ने 2022-25 के दौरान चीन से 60-80% (मूल्य के आधार पर) और 85-90% (मात्रा के आधार पर) REPMs का आयात किया था।
- जलवायु संबंधी लक्ष्य: REPMs भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और 'नेट जीरो 2070' के विज़न का समर्थन करते हैं।
- नेट जीरो 2070 का अर्थ है वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन करना।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: ये गलियारे रक्षा उपकरणों और सटीक सेंसर्स के लिए विश्वसनीय घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों का खतरा कम होगा।

प्रमुख सरकारी पहलें
- REPM विनिर्माण योजना: ₹7,280 करोड़ के व्यय वाली एक योजना है। इसके तहत एकीकृत घरेलू REPM विनिर्माण तंत्र स्थापित किया जाएगा। इसकी क्षमता 6,000 MTPA होगी। यह तंत्र दुर्लभ-भू ऑक्साइड से लेकर तैयार चुंबक तक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को कवर करेगा।
- राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM): इसका उद्देश्य दुर्लभ भू तत्वों सहित महत्वपूर्ण खनिजों के लिए एक दीर्घकालिक व एंड-टू-एंड आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण करना।
- MMDR संशोधन अधिनियम, 2023: खान और खनिज (विकास और विनियमन) (MMDR) अधिनियम, 1957 में संशोधन किए गए हैं। ये संशोधन महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की एक समर्पित सूची; खनिज रियायतों की नीलामी आदि का प्रावधान करते हैं।