विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के CCUS रोडमैप 2025 के अनुरूप इन प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा। इससे विद्युत, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन जैसे पांच औद्योगिक क्षेत्रों में अंतिम-उपयोग अनुप्रयोगों में उच्च तत्परता स्तर हासिल किया जा सकेगा।
कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) के बारे में
- CCUS क्या है?: इसमें मुख्य रूप से विद्युत उत्पादन या औद्योगिक संयंत्रों जैसे ऐसे बड़े कार्बन उत्सर्जक स्रोतों से CO2को कैप्चर किया जाता है, जहां ईंधन के रूप में जीवाश्म ईंधन या बायोमास का उपयोग होता है।
- यदि कैप्चर की गई CO2 का उपयोग साइट पर नहीं किया जाता है, तो इसे संपीडित (compress) कर परिवहन के माध्यम से ले जाया जाता है। इसके बाद इसका उपयोग विभिन्न अनुप्रयोगों में किया जाता है या इसे गहरी भूगर्भीय संरचनाओं (जैसे समाप्त हो चुके तेल और गैस भंडार या लवणीय जलभृतों/saline aquifers) में इंजेक्ट कर दिया जाता है।
- प्रमुख प्रौद्योगिकियां: रासायनिक विलायक-आधारित अवशोषण, क्रायोजेनिक पृथक्करण, डायरेक्ट एयर कैप्चर, एन्हांस्ड ऑयल रिकवरी (EOR), बायो-एनर्जी कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज आदि।
- इसकी आवश्यकता क्यों है?
- महत्वपूर्ण उद्योगों (हार्ड टू एबेट सेक्टर्स) में उत्सर्जन कम करना: सीमेंट, इस्पात या रसायन जैसे भारी उद्योगों में कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना।
- कम लागत वाला हाइड्रोजन: यह वहनीय कम कार्बन युक्त हाइड्रोजन उत्पादन को सक्षम बनाती है। यह हाइड्रोजन विभिन्न क्षेत्रकों के विकार्बनीकरण में सहायक है।
- वैश्विक लक्ष्य: 2050 तक वैश्विक नेट जीरो लक्ष्य प्राप्त करने के लिए 2030 तक प्रतिवर्ष कम-से-कम 1 बिलियन टन CCUS क्षमता की आवश्यकता है।
- उल्लेखनीय है कि भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य निर्धारित किया है।
- प्रतिस्पर्धा: कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसे कार्बन-संबंधित प्रशुल्क के मद्देनजर उत्पादों को विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाना।
- चुनौतियां
- अपर्याप्त तकनीकी परिपक्वता;
- संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में अत्यधिक लागत (विशेष रूप से कार्बन कैप्चर में);
- प्रौद्योगिकियों के परीक्षण और विस्तार की सीमित सुविधा;
- अपर्याप्त वित्त-पोषण आदि।
DST का CCUS रोडमैप
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