16वें वित्त आयोग ने अगले पांच वर्षों (वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31) के लिए भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को कुल लगभग ₹7.9 लाख करोड़ का अनुदान देने की सिफारिश की है। इसके साथ ही कुछ अन्य महत्वपूर्ण सिफारिशें भी की हैं।
स्थानीय निकाय वित्त-पोषण में चुनौतियां
- संरचनात्मक राजस्व अंतराल: उदाहरण के लिए- संपत्ति कर (Property Tax) का संग्रह बहुत कम है, क्योंकि संपत्ति के रिकॉर्ड अधूरे व गलत हैं, कवरेज कम है और संपत्तियों का मूल्यांकन वास्तविक मूल्य से कम किया जाता है।
- केंद्र/राज्य सरकार पर अत्यधिक निर्भरता: उदाहरण के लिए- पंचायतों के राजस्व का 90% से अधिक हिस्सा सरकारी अनुदानों पर निर्भर है।
- ऋण और पूंजी बाजार तक सीमित पहुंच: भारत में नगरपालिकाओं द्वारा लिया जाने वाला कर्ज GDP के 0.05% से भी कम अनुमानित है।
- अन्य: अविकसित बॉण्ड बाजार; डेटा अंतराल और लेखांकन संबंधी समस्याएं; राज्य वित्त आयोगों (SFCs) के गठन में देरी आदि।
16वें वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशें
- संपत्ति डेटाबेस: राज्यों को एक नागरिक-अनुकूल GIS-आधारित संपत्ति कर सूचना प्रौद्योगिकी (IT) प्रणाली विकसित करनी चाहिए।
- ग्रामीण-शहरी विभाजन: कुल अनुदान को ग्रामीण स्थानीय निकायों (RLBs) और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के बीच 60:40 के अनुपात में विभाजित किया जाना चाहिए।
- शहरीकरण प्रीमियम: आसपास के गांवों (peri-urban villages) को 1 लाख से अधिक जनसंख्या वाले बड़े ULBs में विलय करने को प्रोत्साहित करने के लिए ₹10,000 करोड़ आवंटित किए जाने चाहिए।
- संवैधानिक संशोधन: संविधान के अनुच्छेद 280(3) (bb) और (c) की उस बाध्यता को हटाना चाहिए, जो केंद्रीय वित्त आयोग को राज्य वित्त आयोगों (SFCs) की सिफारिशों के "आधार पर" ही सिफारिशें करने के लिए बाध्य करती है।
- सर्वोत्तम प्रथाएं: नीति आयोग द्वारा SFCs के कामकाज का अध्ययन करने और राज्यों के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं का एक संग्रह (Compendium) प्रकाशित करने की सिफारिश की गई है।
स्थानीय निकायों के लिए वित्त-पोषण के स्रोत
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