गृह मंत्री ने रक्षा बलों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया। साथ ही, स्पष्ट किया कि शून्य घुसपैठ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्नत तकनीक अनिवार्य है।
सीमा प्रबंधन के समक्ष उभरती चुनौतियां
- प्रौद्योगिकी का उपयोग (असममित खतरे): पश्चिमी क्षेत्र में ड्रोन घुसपैठ में भारी वृद्धि हुई है, जिसके माध्यम से मादक पदार्थों और हथियारों की तस्करी की जा रही है।
- साइबर एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्ध: उदाहरण के लिए- सीमा निगरानी अवसंरचना और संचार नेटवर्क पर हमले किए जाते हैं।
- भौगोलिक क्षेत्र: दुर्गम इलाकों में ऐसे क्षेत्रों का प्रबंधन करना कठिन होता है, जहां बाड़ नहीं लगाई जा सकती। उदाहरण के लिए- पूर्व में मार्ग बदलने वाली नदियों द्वारा निर्धारित सीमाएं और गुजरात के दलदली इलाके।
सीमा प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका
- स्मार्ट फेंसिंग: व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) का उपयोग उन क्षेत्रों में करना चाहिए, जहां भौतिक बाड़ लगाना संभव नहीं है।
- उदाहरण के लिए: भारत-बांग्लादेश और पाकिस्तान सीमा के कुछ खंडों पर BOLD-QIT (बॉर्डर इलेक्ट्रॉनिकली डॉमिनेटेड QRT इंटरसेप्शन टेक्निक) का उपयोग किया गया है।
- एंटी-ड्रोन सिस्टम: हवाई खतरों से निपटने के लिए जैमिंग और डिटेक्शन तकनीक का एकीकरण।
- उदाहरण के लिए: आईजी टी-शूल पल्स (IG T-Shul Pulse) एंटी-ड्रोन सिस्टम।
- तमिलनाडु का वी.ओ. चिदंबरनार पत्तन उन्नत 'ड्रोन-रोधी प्रणाली' स्थापित करने वाला भारत का प्रथम पत्तन बना।
- संचार और डेटा प्रणाली: सुरक्षित उपग्रह और डिजिटल संचार नेटवर्क, वास्तविक समय (Real-time) के कमान केंद्र तथा AI -आधारित विश्लेषण एजेंसियों के बीच समन्वय में सहायता करते हैं।
- जीवंत ग्राम कार्यक्रम (VVP): सीमावर्ती गांवों में डिजिटल और भौतिक कनेक्टिविटी को बढ़ाने में मददगार होती हैं, ताकि इन गांवों को भारत के "प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता गांवों" के रूप में विकसित किया जा सके।
भारत में सीमा प्रबंधन
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