इस रिपोर्ट का शीर्षक 'विकसित भारत और नेट जीरो की दिशा में परिदृश्य' है। यह रिपोर्ट 'चरणबद्ध रणनीति' (Strategic sequencing) को 'परिवर्तन की रणनीति' के रूप में अपनाने पर जोर देती है। इसमें सूक्ष्म सिंचाई और उर्वरक अनुकूलन जैसी संसाधन दक्षता पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
- फसल विविधीकरण (चावल व गन्ने के स्थान पर अन्य फसलें), सौर एवं इलेक्ट्रिक पंपों की हिस्सेदारी बढ़ाने जैसे मार्गों का रणनीतिक विस्तार, जलवायु परिवर्तन शमन (mitigation) और ऊर्जा बचत जैसे लाभ प्रदान कर सकता है।
भारत का कृषि क्षेत्रक
- योगदान: यह क्षेत्रक 46% कार्यबल को सहारा प्रदान करता है और सकल मूल्य वर्धित (GVA) में लगभग 14% का योगदान देता है।
- खाद्य सुरक्षा में भूमिका: 2011 और 2019 के बीच, खाद्यान्न उत्पादन बढ़कर लगभग 285 मिलियन टन हो गया था। 2023-24 में यह लगभग 332 मिलियन टन तक पहुंच गया था।
- प्रमुख चुनौतियां:
- लघु और सीमांत किसानों की अधिकता।
- खाद्य मांग को पूरा करने और कृषि द्वारा होने वाले पर्यावरणीय उत्सर्जन के प्रबंधन की दोहरी चुनौती।
- वर्तमान में यह क्षेत्रक राष्ट्रीय ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में लगभग 14% का योगदान देता है। इसका मुख्य कारण 'आंत्र किण्वन' (पशुओं द्वारा मीथेन उत्सर्जन), धान की खेती से निकलने वाली मीथेन और कृषि मृदा से निकलने वाली नाइट्रस ऑक्साइड है।
- यह क्षेत्रक मुख्य रूप से भौमजल से सिंचाई और बढ़ते मशीनीकरण के लिए राष्ट्रीय विद्युत का लगभग 18% उपभोग करता है।
- उत्सर्जन परिदृश्य
- वर्तमान नीतिगत परिदृश्य के तहत: कृषि से उत्सर्जन (गैर-ऊर्जा) 2019 के लगभग 506 MtCO₂e से बढ़कर 2070 में लगभग 531 MtCO₂e होने की संभावना है।
- नेट जीरो परिदृश्य: 2070 में कुल उत्सर्जन लगभग 399 MtCO₂e रहने का अनुमान है, जो वर्तमान नीतियों की तुलना में लगभग 25% शमन लाभ प्रदान करता है।
- प्रमुख नीतिगत सुझाव: लक्षित रोडमैप बनाने के लिए मांग और आपूर्ति दोनों पक्षों के कारकों को एकीकृत करना चाहिए; एकीकृत "कृषि-खाद्य" प्रणाली ढांचे को संस्थागत बनाना चाहिए आदि।
