यह कॉम्पैक्ट, 'एकीकृत AMR प्रतिक्रिया गठबंधन' द्वारा समर्थित है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक और निजी दोनों स्रोतों से स्थायी वित्त-पोषण प्राप्त करना है, ताकि वैश्विक स्तर पर AMR से होने वाली मौतों को कम किया जा सके। साथ ही, 2050 तक 100 मिलियन से अधिक लोगों का जीवन बचाया जा सके।
रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance: AMR) के बारे में
- यह तब होता है, जब जीवाणु, विषाणु, कवक और परजीवी रोगाणुरोधी दवाओं (जैसे- एंटीबायोटिक, एंटीवायरल, एंटीफंगल आदि) का प्रतिरोध करने के लिए तंत्र विकसित कर लेते हैं। इससे ये दवाएं अप्रभावी हो जाती हैं।
- यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो समय के साथ रोगजनकों (pathogens) में आनुवंशिक परिवर्तनों के माध्यम से होती है।
- हालांकि, मानव-जनित गतिविधियों, मुख्य रूप से रोगाणुरोधी दवाओं के दुरुपयोग एवं अत्यधिक उपयोग के कारण इसके प्रसार में तेजी आई है।
- भारत में स्थिति: भारत में प्रतिवर्ष प्रतिरोधी संक्रमणों के कारण लगभग 6 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है।

AMR से निपटने के लिए प्रमुख पहलें
- राष्ट्रीय कार्य योजना (NAP) 2.0 (2025-2029): मनुष्यों, पशुओं, कृषि और पर्यावरण के लिए एक एकीकृत एवं समन्वित प्रयास करना।
- प्रथम स्वदेशी एंटीबायोटिक, नेफिथ्रोमाइसिन (Nafithromycin): इसे 2024 में प्रस्तुत किया गया था। इसे सामान्य और असामान्य दोनों तरह के दवा-प्रतिरोधी जीवाणु के उपचार के लिए विकसित किया गया है।
- राष्ट्रीय निगरानी नेटवर्क्स: वार्षिक AMR निगरानी रिपोर्ट तैयार करना, जिसका डेटा 'वैश्विक AMR निगरानी तंत्र' (GLASS) को भेजा जाता है।
- वैश्विक प्रयास:
- 2015 की विश्व स्वास्थ्य सभा के दौरान AMR पर वैश्विक कार्य योजना (GAP);
- संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की AMR पर उच्च स्तरीय बैठक, 2024: इसका लक्ष्य 2019 की आधाररेखा के मुकाबले 2030 तक जीवाणु संबंधी AMR से जुड़ी वैश्विक मौतों को 10% तक कम करना है।