भारत में मृदा के स्वास्थ्य में गिरावट पर रिपोर्ट जारी की गई | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • आईसीआरआईईआर की रिपोर्ट में भारत में मृदा क्षरण के प्राथमिक कारणों के रूप में विकृत उर्वरक नीति, दोषपूर्ण खेती और बड़े पैमाने पर मृदा अपरदन को उजागर किया गया है।
  • मिट्टी के क्षरण से फसलों की दक्षता और पोषण गुणवत्ता कम हो जाती है, साथ ही यह अप्रत्यक्ष भुखमरी और जल प्रदूषण में भी योगदान देती है।
  • आगे बढ़ने के तरीकों में उर्वरक नीतियों में सुधार करना, नवोन्मेषी उत्पादों को बढ़ावा देना, 4R फ्रेमवर्क को अपनाना और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी सरकारी योजनाओं को लागू करना शामिल है।

In Summary

यह रिपोर्ट भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) ने जारी की है। इस रिपोर्ट का शीर्षक है- 'भारत में मृदा उपचार: बेहतर फसल स्वास्थ्य और मानव पोषण के लिए’। 

मृदा गिरावट के प्राथमिक कारण

  • विकृत उर्वरक नीति: अत्यधिक सब्सिडी वाले यूरिया (नाइट्रोजन का स्रोत) पर 80% से अधिक सब्सिडी मिलती है, जबकि फास्फोरस (P) और पोटेशियम (K) के लिए सब्सिडी काफी कम है। मूल्य का यह अंतर किसानों को नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग के लिए प्रोत्साहित करता है।
  • दोषपूर्ण कृषि पद्धतियां: गहन जुताई, धान की खेती में लंबे समय तक जलभराव, एकल फसल कृषि/ मोनोक्रॉपिंग (जैसे अनाज-अनाज चक्र) पर भारी निर्भरता और फसल अवशेषों को जलाने से मृदा के प्राकृतिक कार्बन की हानि होती है तथा इसकी संरचना को नुकसान पहुंचता है।
  • व्यापक पैमाने पर मृदा अपरदन: भारत में जल और वायु अपरदन के कारण वार्षिक लगभग 5.3 बिलियन टन ऊपरी मृदा का लोप हो जाता है। इससे प्रतिवर्ष 5.4–8.4 मिलियन टन प्राथमिक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।

फसल और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव

  • फसल दक्षता में गिरावट: पौधे अब पोषक तत्वों को अच्छी तरह से अवशोषित नहीं कर पाते हैं। इससे फसल उत्पादन की दक्षता कम हो जाती है।
  • पोषण संबंधी गुणवत्ता की हानि: कमजोर मृदा ऐसी फसलें पैदा करती है, जिनमें जिंक और आयरन जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है।
  • 'प्रच्छन्न भुखमरी' (Hidden Hunger) में वृद्धि: पोषक तत्वों की कमी वाली फसलों के कारण बच्चों में बौनापन (Stunting), दुबलापन (Wasting) और कुपोषण जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
  • जल संदूषण: उर्वरकों की अधिक मात्रा रिसकर भौमजल में मिल जाती है, जिससे वह पीने के लिए असुरक्षित हो जाता है।

आगे की राह

  • उर्वरक नीतियों में सुधार:
    • यूरिया को NBS (पोषक तत्व आधारित सब्सिडी) शासन के तहत लाना चाहिए, ताकि इसकी कीमतों को तर्कसंगत बनाया जा सके।
    • सब्सिडी के स्थान पर प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान करनी चाहिए। 
    • अभिनव उत्पादों को बढ़ावा देना: अनुकूलित उर्वरक, जल-घुलनशील फॉर्मूला, जैव-उर्वरक आदि को बढ़ावा देना चाहिए।
    • तकनीक का उपयोग: भूमि रिकॉर्ड, उपग्रह इमेजरी और उर्वरक बिक्री के आंकड़ों को जोड़ने के लिए AI एवं मशीन लर्निंग का उपयोग करना चाहिए, ताकि काश्तकार किसानों की पहचान कर उन्हें सहायता प्रदान की जा सके।
    • 4R फ्रेमवर्क: उपयुक्त स्रोत (Right Source), उचित दर (Right Rate), सही समय (Right Time) और सही स्थान (Right Place) पर उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए।
  • अन्य उपाय:
    • सिंथेटिक उर्वरकों को जैविक इनपुट (जैसे गोबर की खाद और बायोचार) के साथ मिलाकर एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM) को बढ़ावा देना चाहिए।
    • मृदा कार्बन को पुनर्जीवित करने के लिए कवर क्रॉपिंग और फसल विविधीकरण (जैसे दलहन को शामिल करना) अपनाना चाहिए।
  • मृदा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहलें: मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना; पीएम प्रणाम/ PRANAM (प्रोग्राम फ़ॉर रेस्टोरेशन, अवेयरनेस जनरेशन, नौरिश्मेंट, एंड अमेलियरेशन ऑफ मदर अर्थ) योजना; परंपरागत कृषि विकास योजना; नीम-लेपित यूरिया योजना; आदि।
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नीम-लेपित यूरिया योजना

यूरिया को नीम के तेल से लेपित करने की एक प्रक्रिया, जिसका उद्देश्य यूरिया के घुलने की दर को धीमा करना, पौधों द्वारा इसके अवशोषण को बढ़ाना और मृदा में नाइट्रोजन के लीचिंग को कम करना है।

परंपरागत कृषि विकास योजना

जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की एक योजना, जो क्लस्टर आधारित जैविक खेती को प्रोत्साहित करती है और किसानों को जैविक इनपुट के उत्पादन व उपयोग के लिए सहायता प्रदान करती है।

पीएम प्रणाम/ PRANAM (प्रोग्राम फ़ॉर रेस्टोरेशन, अवेयरनेस जनरेशन, नौरिश्मेंट, एंड अमेलियरेशन ऑफ मदर अर्थ) योजना

रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने और वैकल्पिक तथा जैविक उर्वरकों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई एक सरकारी योजना, जो राज्यों को प्रोत्साहन प्रदान करती है।

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