यह रिपोर्ट भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) ने जारी की है। इस रिपोर्ट का शीर्षक है- 'भारत में मृदा उपचार: बेहतर फसल स्वास्थ्य और मानव पोषण के लिए’।
मृदा गिरावट के प्राथमिक कारण
- विकृत उर्वरक नीति: अत्यधिक सब्सिडी वाले यूरिया (नाइट्रोजन का स्रोत) पर 80% से अधिक सब्सिडी मिलती है, जबकि फास्फोरस (P) और पोटेशियम (K) के लिए सब्सिडी काफी कम है। मूल्य का यह अंतर किसानों को नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग के लिए प्रोत्साहित करता है।
- दोषपूर्ण कृषि पद्धतियां: गहन जुताई, धान की खेती में लंबे समय तक जलभराव, एकल फसल कृषि/ मोनोक्रॉपिंग (जैसे अनाज-अनाज चक्र) पर भारी निर्भरता और फसल अवशेषों को जलाने से मृदा के प्राकृतिक कार्बन की हानि होती है तथा इसकी संरचना को नुकसान पहुंचता है।
- व्यापक पैमाने पर मृदा अपरदन: भारत में जल और वायु अपरदन के कारण वार्षिक लगभग 5.3 बिलियन टन ऊपरी मृदा का लोप हो जाता है। इससे प्रतिवर्ष 5.4–8.4 मिलियन टन प्राथमिक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।

फसल और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव
- फसल दक्षता में गिरावट: पौधे अब पोषक तत्वों को अच्छी तरह से अवशोषित नहीं कर पाते हैं। इससे फसल उत्पादन की दक्षता कम हो जाती है।
- पोषण संबंधी गुणवत्ता की हानि: कमजोर मृदा ऐसी फसलें पैदा करती है, जिनमें जिंक और आयरन जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है।
- 'प्रच्छन्न भुखमरी' (Hidden Hunger) में वृद्धि: पोषक तत्वों की कमी वाली फसलों के कारण बच्चों में बौनापन (Stunting), दुबलापन (Wasting) और कुपोषण जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
- जल संदूषण: उर्वरकों की अधिक मात्रा रिसकर भौमजल में मिल जाती है, जिससे वह पीने के लिए असुरक्षित हो जाता है।
आगे की राह
|