भारत में एशियाई हाथियों की वैश्विक आबादी का लगभग 60% हिस्सा है। मानव-हाथी संघर्ष के कारण प्रतिवर्ष लगभग 500 लोगों की मृत्यु होती है।
मानव-हाथी संघर्ष के लिए उत्तरदायी मुख्य कारक
- मानव-जनित कारक
- पर्यावास क्षति और विखंडन: वनों की कटाई, कृषि का विस्तार और मानवीय बस्तियों के कारण हाथियों के प्राकृतिक पर्यावास विभाजित हो गए हैं। इस कारण वे कई बार बस्तियों की ओर निकल पड़ते हैं।
- अवसंरचना का विकास: राजमार्गों और रेलवे पटरियों के निर्माण ने हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों (गलियारों) को बाधित कर दिया है।
- प्राकृतिक कारक
- जलवायु परिवर्तन: सूखा और बढ़ता तापमान खाद्य एवं जल की उपलब्धता को कम कर देते है। इससे हाथी नए क्षेत्रों में जाने के लिए बाध्य हो जाते हैं।
- मौसमी प्रवास: हाथी खाद्य एवं जल की तलाश में प्रवास करते हैं, और इनकी कमी उन्हें कृषि क्षेत्रों की ओर ले जाती है।
- प्राकृतिक पर्यावास का क्षरण: वनाग्नि, आक्रामक प्रजातियों का प्रसार या पारिस्थितिक परिवर्तनों के कारण प्राकृतिक खाद्य की उपलब्धता कम हो जाती है।
संभावित समाधान
- भू-परिदृश्य स्तरीय पर्यावास संबद्धता: विखंडित पर्यावासों को फिर से समेकित करने के लिए 'इफा (IFAW) के रूम टू रोम' जैसी पहलों के माध्यम से हाथी गलियारों को सुरक्षित और कानूनी रूप से संरक्षित करना चाहिए।
- पूर्व-चेतावनी और तकनीक: अचानक होने वाले संघर्षों को रोकने के लिए SMS अलर्ट, LED चेतावनी प्रणाली, सेंसर, GPS कॉलर और रेलवे डिटेक्शन सिस्टम का उपयोग करना चाहिए।
- भौतिक और जैविक अवरोध: खेतों में हाथियों के प्रवेश को रोकने के लिए सौर बाड़, खाइयां, मधुमक्खी बाड़, मिर्च के निवारक और जैव-बाड़ का उपयोग करना चाहिए।
- पर्यावास सुधार के उपाय: जल स्रोतों, बोरवेल, चारा पौधरोपण, बांस उगा कर और आक्रामक प्रजातियों को हटाकर वन संसाधनों को बढ़ाना चाहिए।
- वैकल्पिक फसल चक्र: सुभेद्य क्षेत्रों में मिर्च, खट्टे फल, अदरक और प्याज जैसी उन फसलों की खेती को बढ़ावा देना चाहिए, जिन्हें हाथी खाना पसंद नहीं करते।
संघर्ष कम करने के लिए प्रमुख पहलें
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