यह परियोजना इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत स्वीकृत की गई है। यह फैसिलिटी बाजार में लॉन्च करने से पहले सेमीकंडक्टर चिप्स की टेस्टिंग और पैकेजिंग का कार्य करेगी।
भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग की वर्तमान स्थिति
- वर्ष 2023 में भारत का सेमीकंडक्टर उद्योग लगभग 38 बिलियन डॉलर मूल्य का था। इसके 2030 तक बढ़कर 100-110 बिलियन डॉलर हो जाने का अनुमान है।
सेमीकंडक्टर उद्योग को बढ़ावा देने हेतु पहलें

- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0: भारत में सेमीकंडक्टर उपकरण और सामग्री का उत्पादन करने, फुल-स्टैक भारतीय सेमीकंडक्टर बौद्धिक संपदा (IP) डिजाइन करने, आदि के लिए।
- सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम: इसके तहत सेमीकंडक्टर फैब्स (fabs), डिस्प्ले फैब्स और ATMP/OSAT सुविधाओं के लिए परियोजना लागत की 50% तक राजकोषीय सहायता प्रदान की जाती है।
- सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले फैब्स योजनाएं: इसके तहत भारत में सेमीकंडक्टर वेफर फैब्रिकेशन और डिस्प्ले विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- डिजाइन से संबद्ध प्रोत्साहन (DLI) योजना: इसके तहत स्वदेशी चिप डिजाइन और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप्स और MSMEs को प्रोत्साहन दिया जाता है।
मुख्य चुनौतियां
- आयात पर अधिक निर्भरता: भारत अति-महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भर है। विश्व का 6% दुर्लभ भू-तत्व (रेयर अर्थ) भंडार भारत के पास है, हालांकि इन तत्वों के वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी केवल 1% है।
- कौशल की कमी: विश्व के लगभग 20% सेमीकंडक्टर डिजाइन इंजिनीयर्स भारत में हैं, लेकिन वास्तविक फैब्रिकेशन (विनिर्माण) में कुशल कर्मियों की कमी है।
- उच्च निवेश और लाभकारी बनने में लंबी अवधि: सेमीकंडक्टर विनिर्माण में अधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है, इसमें परिचालन से जुड़े जोखिम भी अधिक है, लेकिन निवेश पर रिटर्न मिलने में अधिक समय लगता है।
- उच्च वैश्विक प्रतिस्पर्धा: भारत को सेमीकंडक्टर विनिर्माण में चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे स्थापित देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।