भारत में बड़े पैमाने पर रासायनिक उद्योगों के विस्तार के कारण औद्योगिक दुर्घटनाओं की प्रकृति और गंभीरता बढ़ी है, जैसा कि निम्न घटनाओं से स्पष्ट है:
- 1984 की भोपाल गैस त्रासदी (मिथाइल आइसोसाइनेट का रिसाव); 1985 में दिल्ली में ओलियम गैस रिसाव; 2017 में एनटीपीसी ऊंचाहार (उत्तर प्रदेश) पावर प्लांट बॉयलर विस्फोट; विशाखापत्तनम गैस रिसाव (2020); आदि।
औद्योगिक दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण
- व्यवस्थागत और विनियामक कमियां: भारत में औद्योगिक सुरक्षा से जुड़े विधिक प्रावधान होने के बावजूद, इनका प्रभावी रूप से कार्यान्वयन नहीं हो पाता है।
- 'व्यवसाय सुगमता' को बढ़ावा देने के लिए कार्यकारी आदेशों के माध्यम से औद्योगिक सुरक्षा और पर्यावरण-संरक्षण से संबंधित कई नियमों को "कमजोर" कर दिया जाता है।
- परिचालन से संबद्ध और तकनीकी कारण: इंसान जनित त्रुटियां, इंजीनियरिंग डिजाइन की खामियां, खराब रखरखाव, या कारखाने के भीतर प्रोटोकॉल का उल्लंघन। उदाहरण के लिए: 2017 का एनटीपीसी ऊंचाहार बॉयलर विस्फोट।
- खतरनाक पदार्थ और प्रक्रिया से जुड़े जोखिम: जिन उद्योगों में विषाक्त गैसें (जैसे क्लोरीन, अमोनिया आदि) उपयोग होती हैं, वहां सुरक्षा में चूक की कोई गुंजाइश नहीं होती, यानी थोड़ी सी गलती से भी बड़ा हादसा हो सकता है।
- पर्यावरणीय कारक: उदाहरण के लिए, भूकंप औद्योगिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा सकते हैं (जैसे 2001 के गुजरात भूकंप के कारण कुछ रासायनिक गोदामों में रिसाव हुआ था)।
- आर्थिक और प्रबंधकीय कारक: औद्योगिक सुरक्षा पर खर्च कम करना, आधुनिक सुरक्षा प्रौद्योगिकियों में निवेश की कमी, आदि।
औद्योगिक दुर्घटनाओं को रोकने के प्रमुख उपाय
- विधायी उपाय: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (भोपाल त्रासदी के बाद बनाया गया), सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम; आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, आदि।
- संस्थागत उपाय: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ-साथ राज्य और जिला स्तरों पर संस्थानों की स्थापना की गई हैं।
- आपदा मोचन बल: खतरनाक पदार्थों (HAZMAT) से निपटने के लिए विशेष टीमें बनाई जाती हैं। साथ ही, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) के पास ऐसी टीमें होती हैं जो रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (CBRN) जनित आपात स्थितियों से निपटने के लिए प्रशिक्षित होती हैं।
- प्रौद्योगिकीय उपाय: उन्नत प्रक्रिया सुरक्षा प्रबंधन (PSM) प्रणाली, आदि।
- सामुदायिक तैयारी और स्वास्थ्य आपदा से निपटने की तैयारी: इसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी और संकट के समय जानकारी देने के लिए स्थानीय समूह तैयार करना शामिल हैं।
