16वां वित्त आयोग तथा वित्तीय हस्तांतरण व समानता के मुद्दे | Current Affairs | Vision IAS

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  • 16वें वित्त आयोग (जिसकी अध्यक्षता डॉ. अरविंद पनागरिया ने की) ने राज्यों के कर हिस्से को 41% पर बनाए रखने की सिफारिश की और स्थानीय निकायों के लिए 9.47 लाख करोड़ रुपये का अनुदान दिया।
  • चुनौतियों में उपकरों/अतिरिक्त शुल्कों के कारण विभाज्य निधि का सिकुड़ना और हस्तांतरण में प्रदर्शन प्रोत्साहन के साथ समानता को संतुलित करना शामिल है।
  • आगे बढ़ने का रास्ता उपकरों को युक्तिसंगत बनाने, हस्तांतरण मानदंडों को परिष्कृत करने और राज्य स्वायत्तता के लिए पूर्वानुमानित, बिना शर्त अनुदान सुनिश्चित करने का सुझाव देता है।

In Summary

यह चिंता सामने आई है कि क्या वित्त आयोग द्वारा राज्यों को किए जाने वाले हस्तांतरण (ट्रांसफर), केंद्र की बढ़ती व्यय आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ राज्यों के बीच वित्तीय समानता को उचित रूप से संतुलित कर पा रहे हैं।

16वें वित्त आयोग (2026-31) के बारे में:

  • इसका गठन संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत गठित किया गया। डॉ. अरविंद पनगढ़िया इसके अध्यक्ष हैं।
  • मुख्य सिफारिशें:
    • केंद्रीय करों के विभाज्य पूल (divisible pool) में राज्यों की हिस्सेदारी 41% पर अपरिवर्तित रखी गई है।
    • 5 वर्षों में स्थानीय निकायों और आपदा प्रबंधन के लिए ₹9.47 लाख करोड़ की कुल अनुदान सहायता का प्रावधान है।
    • राजस्व-घाटा आधारित, क्षेत्रक-विशिष्ट और राज्य-विशिष्ट अनुदानों को समाप्त कर दिया गया है।

वित्तीय हस्तांतरण और समानता से जुड़ी चुनौतियां:

  • विभाज्य कर पूल में कमी: साझा न किए जाने वाले उपकर (cess) और अधिभार (surcharge) बढ़ने से राज्यों को उपलब्ध वास्तविक धनराशि कम हो जाती है।
  • समानता बनाम प्रदर्शन: 'आय विषमता’ (income distance) को अधिक महत्व देने से कम विकसित राज्यों को अधिक लाभ मिलता है। विकसित राज्यों को लगता है कि उन्हें आर्थिक विकास और जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडित किया जा रहा है।
  • सशर्त हस्तांतरण: विशेष उद्देश्यों के लिए दिए गए अनुदान (आबद्ध अनुदान/Tied grants) राज्यों की खर्च करने की स्वायत्तता को सीमित कर सकते हैं।
  • ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण में असंतुलन (Vertical Imbalance): स्वास्थ्य-देखभाल, शिक्षा और कल्याण जैसे क्षेत्रकों में व्यय जैसी बड़ी जिम्मेदारी राज्यों के पास होती है, लेकिन उनके पास कर लगाने की सीमित शक्तियाँ होती हैं। 
    • उदाहरण के लिए, पुनर्गठित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम यानी 'विकसित भारत—रोजगार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण)' में 40% लागत राज्यों को वहन करनी पड़ेगी।
  • राजस्व-घाटा आधारित अनुदान की समाप्ति: इससे समानता और राज्यों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखने से जुड़े मुद्दे उठते हैं, जिसे “आधार वर्ष की तानाशाही” (Tyranny of the base year) कहा जाता है।  

आगे की राह

  • विभाज्य कर पूल को बढ़ाने के लिए उपकर और अधिभार को तर्कसंगत बनाना चाहिए। साथ ही, व्यापक परामर्श के माध्यम से 'सहकारी संघवाद' को बढ़ावा देना चाहिए।
  • वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहन और समानता के बीच संतुलन बनाने हेतु मानदंडों को और बेहतर बनाना चाहिए।
  • विकास के मामले में राज्यों की स्वायत्तता को सुदृढ़ करने के लिए पूर्वानुमान योग्य और बिना शर्त वित्तीय हस्तांतरण किए जाएं।  
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विकसित भारत—रोजगार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) (Developed India - Guarantee Mission for Employment and Livelihood (Rural))

यह पुनर्गठित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम का एक संभावित नाम है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आजीविका सुनिश्चित करने का लक्ष्य है। इसमें राज्यों को लागत का एक हिस्सा वहन करना पड़ सकता है।

सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)

यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकारें राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सहयोग और समन्वय के साथ काम करती हैं। नीति आयोग इस सिद्धांत को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आधार वर्ष की तानाशाही (Tyranny of the Base Year)

यह एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है जहां पिछले वर्षों के डेटा या स्थापित आधार वर्षों के आधार पर आवंटन तय किए जाते हैं, जो वर्तमान या भविष्य की बदलती जरूरतों और परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं कर पाते।

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