अनुच्छेद 142: न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक अतिक्रमण | Current Affairs | Vision IAS

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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए 'राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षित यात्रा के अधिकार' को अनुच्छेद 21 के मूल अधिकार ‘जीवन का अधिकार’ का एक अभिन्न अंग घोषित किया। 

  • न्यायालय ने व्यापक निर्देश जारी करते हुए कहा कि सुरक्षित, अच्छी तरह से रखरखाव वाली और चलने योग्य सड़कें उपलब्ध कराना राज्य का बाध्यकारी संवैधानिक कर्तव्य है, न कि केवल एक नीतिगत उद्देश्य

अनुच्छेद 142 क्या है?

  • पूर्ण न्याय: इस अनुच्छेद के तहत, उच्चतम न्यायालय (SC) को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश या डिक्री जारी करने का अधिकार है, जहां वर्तमान कानून कोई विशेष समाधान प्रदान करने में असफल हों।
  • उच्च न्यायालयों को उपलब्ध नहीं है: अनुच्छेद 142 के तहत उपर्युक्त शक्तियां संवैधानिक रूप से केवल उच्चतम न्यायालय को प्रदान की गई हैं। 
  • महत्व: यह अनुच्छेद विधायी प्रावधानों की अनुपस्थिति की समस्या को दूर करता है। यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जहां स्पष्ट अन्याय दिखाई दे लेकिन उसे दूर करने के लिए कोई स्पष्ट कानून न हो, तो अनुच्छेद 142 न्यायालय को हस्तक्षेप कर तत्काल समाधान प्रदान करने की शक्ति देता है।
    • उदाहरण के लिए: कार्यस्थलों पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की शिकायत से निपटने के लिए 1997 में विशाखा दिशा-निर्देश जारी किए गए, क्योंकि उस समय इस विषय पर कोई सांविधिक कानून मौजूद नहीं था।
  • आलोचना: हालांकि, यह अनुच्छेद कानून के अभाव को दूर करने के लिए एक ‘संवैधानिक सुरक्षा वाल्व’ है, लेकिन इससे कार्यपालिका या विधायिका के अधिकार क्षेत्र में न्यायिक अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। 
    • न्यायिक अतिक्रमण वह स्थिति है, जब न्यायपालिका अपनी संवैधानिक सीमाओं को पार कर कार्यपालिका या विधायिका के कार्यों में हस्तक्षेप करने लगती है। 

न्यायिक अतिक्रमण से संबद्ध चिंताएं:

  • शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन: न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर प्रशासन चलाने लगता है। उदाहरण के लिए- BCCI में सुधार के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा लोढ़ा पैनल का गठन करना
  • जवाबदेही में कमी आना: जब 'चेक एंड बैलेंस' (नियंत्रण और संतुलन) का सिद्धांत कमजोर हो जाता है तो जवाबदेही में कमी आती है।  उदाहरण के लिए - उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक नियुक्तियों में अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग/NJAC (2015) को निरस्त कर दिया।
  • सभी विषयों पर विशेषज्ञता का अभाव: उदाहरण के लिए-तमिलनाडु बनाम के. बालू वाद में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 142 की शक्ति का प्रयोग करते हुए राजमार्गों के 500 मीटर के भीतर शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे रातों-रात लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं।
  • कार्यपालिका की सीमाओं की अनदेखी: न्यायालय कई बार संसाधनों या अवसंरचना की सीमाओं पर विचार किए बिना निर्देश जारी कर देते हैं।
    • उदाहरण के लिए - एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (2018) वाद में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए BS-IV वाहनों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि सरकार द्वारा दिए गए अतिरिक्त समय और उससे जुड़ी लॉजिस्टिक एवं वित्तीय चुनौतियों की अनदेखी की गई। 
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एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (2018) वाद

इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए BS-IV वाहनों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस निर्णय की आलोचना कार्यपालिका की सीमाओं और लॉजिस्टिक व वित्तीय चुनौतियों की अनदेखी के लिए की गई थी।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग/NJAC (2015)

एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से स्थापित एक आयोग जिसका उद्देश्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना था। उच्चतम न्यायालय ने 2015 में इसे निरस्त कर दिया था, जिससे न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका का प्रभुत्व बना रहा।

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत

यह शासन का एक सिद्धांत है जिसमें सरकार की शक्तियों को तीन अलग-अलग शाखाओं - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका - में विभाजित किया जाता है। इसका उद्देश्य किसी एक शाखा के अत्यधिक शक्तिशाली होने से रोकना और शक्तियों के दुरुपयोग को रोकना है।

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