ईरान युद्ध ने एक ओर IMEC की आवश्यकता और महत्ता को और अधिक बढ़ा दिया है, वहीं दूसरी ओर इसके क्रियान्वयन को अधिक दुष्कर भी बना दिया है।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के बारे में:
- IMEC एक मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी परियोजना है। इसका उद्देश्य बंदरगाहों, रेलवे, सड़कों, समुद्री मार्गों और पाइपलाइन अवसंरचनाओं का विकास करके भारत, अरब प्रायद्वीप, भूमध्यसागरीय क्षेत्र और यूरोप के बीच व्यापार को बढ़ावा देना है।
- घोषणा: भारत की अध्यक्षता में आयोजित G-20 शिखर सम्मेलन 2023 के दौरान।
- हस्ताक्षरकर्ता: भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ।
- दो मुख्य गलियारे (कॉरिडोर):
- पूर्वी गलियारा (ईस्ट कॉरिडोर): यह भारत को अरब खाड़ी से जोड़ता है (दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व को जोड़ना)।
- उत्तरी गलियारा (नॉर्थ कॉरिडोर): यह खाड़ी देशों को यूरोपीय बाजारों से जोड़ता है।
- भारत के लिए महत्व: इसके माध्यम से परिवहन समय में 40% और लॉजिस्टिक्स की लागत में 30% की कमी आने का अनुमान है। इससे स्वेज नहर जैसे भीड़भाड़ वाले समुद्री मार्गों का एक बेहतर विकल्प मिलेगा।
IMEC के समक्ष मुख्य चुनौतियां:

- ईरान-इजरायल युद्ध: यह संकट एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले चुका है। इससे IMEC के प्रस्तावित परिवहन मार्गों के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है।
- व्यापार मार्गों में व्यवधान: होर्मुज जलसंधि जैसे रणनीतिक चोकपॉइंट्स में जहाजों का आवागमन बाधित होने के कारण तेल की कीमतों में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। इससे IMEC की आर्थिक उपयोगिता कम हो गई है।
- क्षेत्रीय सहयोग कम होना: इजरायल और अरब देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों में तनाव आ गया है। इस वजह से अवसंरचना विकास में सहयोग लगभग रुक गया है।
- क्रियान्वयन में चुनौतियां: विभिन्न हितधारकों के अलग-अलग हित (जैसे यूएई और सऊदी अरब के बीच) होने के कारण IMEC परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण जुटाना और उन्हें समय पर पूरा करना और अधिक जटिल हो गया है।
आगे की राह:
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