विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी ने 'न्यायिक पारदर्शिता सूचकांक रिपोर्ट' जारी की | Current Affairs | Vision IAS

Upgrade to Premium Today

Start Now
मेनू
होम

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के लिए प्रासंगिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विकास पर समय-समय पर तैयार किए गए लेख और अपडेट।

त्वरित लिंक

High-quality MCQs and Mains Answer Writing to sharpen skills and reinforce learning every day.

महत्वपूर्ण यूपीएससी विषयों पर डीप डाइव, मास्टर क्लासेस आदि जैसी पहलों के तहत व्याख्यात्मक और विषयगत अवधारणा-निर्माण वीडियो देखें।

करंट अफेयर्स कार्यक्रम

यूपीएससी की तैयारी के लिए हमारे सभी प्रमुख, आधार और उन्नत पाठ्यक्रमों का एक व्यापक अवलोकन।

अपना ज्ञान परखें

आर्थिक अवधारणाओं में महारत हासिल करने और नवीनतम आर्थिक रुझानों के साथ अपडेट रहने के लिए गतिशील और इंटरैक्टिव सत्र।

ESC

In Summary

  • न्यायिक पारदर्शिता सूचकांक, जिसे JALDI पहल द्वारा 2025 में विकसित किया गया था, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा अपनी वेबसाइटों पर सूचनाओं के प्रकटीकरण का आकलन करता है।
  • प्रमुख मुद्दों में न्यायिक प्रक्रियाओं जैसे कि न्यायाधीशों के खुद को अलग करने के मानदंडों का खुलासा न होना, सुप्रीम कोर्ट के लाइव-स्ट्रीमिंग नियमों का अभाव, बजट संबंधी अपारदर्शिता (जिसमें 8 उच्च न्यायालयों द्वारा बजट का कोई विवरण प्रकाशित नहीं किया गया है) और न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति का अधूरा खुलासा शामिल हैं।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों के कारणों के संबंध में सीमित जानकारी ही उपलब्ध है।

In Summary

यह रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर सार्वजनिक की गई जानकारी  का मूल्यांकन करती है।

न्यायिक पारदर्शिता सूचकांक के बारे में

  • इसे 2025 में जस्टिस, एक्सेस एंड लोअरिंग डिलेज़ इन इंडिया (JALDI) पहल द्वारा तैयार किया गया था।
    • JALDI का दृष्टिकोण: शून्य विलंब वाली न्यायपालिका; समावेशी और सुलभ अदालतें; प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण न्याय।
  • यह सूचकांक ऐसे आधारभूत मानक प्रदान करता है, जिनके आधार पर भारतीय न्यायालयों में पारदर्शिता का आकलन किया जा सकता है।
  • इसमें न्यायिक पारदर्शिता का मूल्यांकन तीन श्रेणियों में किया जाता है; न्यायिक प्रक्रियाएं; संस्थागत शासन एवं प्रशासन तथा न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्मिक। 
    • न्यायिक पारदर्शिता का अर्थ है कि न्यायालय अपनी वेबसाइटों पर सक्रिय रूप से ऐसी जानकारी सार्वजनिक करें, जिससे आम लोग न्यायालयों के कामकाज का आकलन कर सकें।

न्यायिक पारदर्शिता से जुड़ी चिंताएं

  • न्यायिक प्रक्रियाओं को सार्वजनिक नहीं करना: कोई भी उच्च न्यायालय (HC) अपनी वेबसाइट पर न्यायाधीशों के स्वयं को किसी मामले से अलग करने (Judicial Recusal) के मानदंड प्रकाशित नहीं करता है।
    • केवल दिल्ली उच्च न्यायालय ने “स्वयं को किसी मामले से अलग करने” का अनुरोध करने की प्रक्रिया बताई है।
  • उच्चतम न्यायालय में लाइव-स्ट्रीमिंग के नियमों का अभाव: स्वप्निल त्रिपाठी बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय नियम, 2013 में संशोधन का निर्देश दिया गया था। इसके बावजूद न्यायिक कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग के लिए औपचारिक दिशा-निर्देश अब तक लागू नहीं किए गए हैं और न ही उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। 
  • बजटीय अपारदर्शिता: 8 उच्च न्यायालयों ने अपने बजट का कोई विवरण प्रकाशित नहीं किया है। 
    • 15 उच्च न्यायालयों ने वर्तमान या पिछले वर्षों के व्यय से संबंधित कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
  • संपत्ति का प्रकटीकरण: किसी भी उच्च न्यायालय ने अपने सभी न्यायाधीशों की संपत्ति का पूर्ण विवरण प्रकाशित नहीं किया है। 
    • केवल 7 उच्च न्यायालयों में कुछ न्यायाधीशों ने ही अपनी संपत्ति सार्वजनिक की है।
  • न्यायिक नियुक्तियां: उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानांतरण की अनुशंसा के कारणों को सीमित तौर पर सार्वजनिक किया गया है। 

न्यायालयों में अधिक न्यायिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख सिफारिशें

1. नियुक्तियों और स्थानांतरण में पारदर्शिता

  • स्पष्ट नीतियाँ तथा नियुक्ति/स्थानांतरण के कारण सार्वजनिक किए जाएं। 'प्रशासनिक हित’ जैसी व्यापक एवं अस्पष्ट शब्दावलियों के स्थान पर स्पष्ट कारण बताए जाएँ।

2. वित्तीय पारदर्शिता

  • न्यायालयों के बजट का अद्यतन डेटाबेस बनाए रखा जाए तथा सार्वजनिक जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट प्रकाशित की जाए।

3. वर्चुअल (ऑनलाइन) पहुंच का विस्तार

  • अधिक न्यायालय कक्षों में कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग का विस्तार किया जाए और इसके लिए स्पष्ट एवं व्यापक विनियामक ढांचा तैयार किया जाए।

4. अनुशासनात्मक प्रक्रिया में स्पष्टता

  • न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता प्रकाशित की जाए और शिकायत दर्ज कराने हेतु सरल, पारदर्शी एवं सुलभ व्यवस्था विकसित की जाए।

5. अन्य सिफारिशें

  • सभी उच्च न्यायालय नागरिक चार्टर अपनाएं, जो उच्चतम न्यायालय के मानकीकृत सार्वजनिक सूचना चार्टर के अनुरूप हो; सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के अंतर्गत अस्पष्ट एवं व्यापक अपवाद को समाप्त किया जाए।
Watch Video News Today

Explore Related Content

Discover more articles, videos, and terms related to this topic

RELATED TERMS

3

Right to Information (RTI) Act

An act of the Parliament of India which facilitates the citizens to secure information from the Government of India. Its application to cooperatives is suggested as a measure for transparency.

Standardized Public Information Charter

A set of guidelines established by the Supreme Court for publicizing information. The article suggests High Courts adopt a similar charter to ensure uniformity in transparency efforts.

Citizen Charter

A document outlining the standards of service a citizen can expect from a public organization. The article suggests all High Courts adopt a Citizen Charter aligned with the Supreme Court's standardized public information charter.

Title is required. Maximum 500 characters.

Search Notes

Filter Notes

Loading your notes...
Searching your notes...
Loading more notes...
You've reached the end of your notes

No notes yet

Create your first note to get started.

No notes found

Try adjusting your search criteria or clear the search.

Saving...
Saved

Please select a subject.

Referenced Articles

linked

No references added yet