उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और राज्यों को 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे साइबर धोखाधड़ी के मामलों पर रोक लगाने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOPs) तैयार करने का निर्देश दिया है।
उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी मुख्य निर्देश:
- RBI को निर्देश: चार सप्ताह के भीतर ऐसी SOP तैयार करे, जिसके तहत साइबर धोखाधड़ी से जुड़े 'म्यूल अकाउंट्स' पर अस्थायी डेबिट रोक लगाई जा सके।
- राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को निर्देश: राज्य साइबर अपराध समन्वय केंद्र को शीघ्र कार्यरत किया जाए और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के परामर्श से e-जीरो FIR व्यवस्था 4 सप्ताह के भीतर लागू की जाए।
- अंतर-विभागीय समिति (IDC) को निर्देश: साझा दायित्व और पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था पर विचार करे।
- साथ ही, IDC, CBI को यह भी निर्देश दे कि यदि किसी संगठित साइबर गिरोह द्वारा की गई कुल धोखाधड़ी ₹10 करोड़ से कम भी हो, तब भी उसकी जांच की जाए।
- इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और दूरसंचार विभाग (DoT) को निर्देश: "किल स्विच" प्रणाली की व्यवहार्यता का अध्ययन करें। इसके तहत आवश्यकता पड़ने पर ऑडियो और वीडियो कॉल पर समय-आधारित रोक लगाकर उगाही करने वाले नेटवर्क को बाधित किया जा सके।
डिजिटल अरेस्ट और इससे जुड़ी चिंताएं:
- डिजिटल अरेस्ट: डिजिटल अरेस्ट मनोवैज्ञानिक तरीके से ठगी की एक तकनीक है। इसमें ठग स्वयं को CBI, पुलिस या अन्य सरकारी अधिकारी बताकर फर्जी गिरफ्तारी वारंट दिखाते हैं। वे पीड़ित को तुरंत गिरफ्तारी का डर दिखाकर बड़ी धनराशि उनके बताए गए खातों में ट्रांसफर करवाते हैं।
- धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग): ठगी से प्राप्त धन को कई 'म्यूल अकाउंट्स' में बाँट दिया जाता है। बाद में इसे विभिन्न खातों के माध्यम से विदेशों में भेज दिया जाता है।
- डिजिटल अरेस्ट से निपटने में चुनौतियां: धोखाधड़ी के बाद राशि फ्रीज करने में देरी, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी, शिकायत निवारण प्रणाली का बिखरा हुआ ढाँचा, पीड़ितों को धन वापस मिलने की कम दर।
पहले से जारी सुरक्षा उपाय
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