केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने ‘पश्मीना प्रमाणन के लिए एडवांस्ड फैसिलिटी’ और ‘नेक्स्ट जनरेशन DNA सीक्वेंस सेंटर’ का उद्घाटन किया | Current Affairs | Vision IAS
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इन केंद्रों को भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून में स्थापित किया गया है। 

  • पहले से स्थापित पश्मीना प्रमाणन केंद्र को एडवांस्ड फैसिलिटी के रूप में अपग्रेड किया गया है।
  • नेक्स्ट जनरेशन DNA सीक्वेंस सेंटर जलवायु परिवर्तन के प्रति आनुवंशिक अनुकूलन तथा रोगजनक और होस्ट जीव के बीच अंतर्क्रिया पर शोध अध्ययन को बढ़वा देगा। इसके अलावा, यह केंद्र बाघों, हाथियों, नदी डॉल्फिन जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए संरक्षण रणनीतियों के विकास को भी बढ़ावा देगा। 

‘नेक्स्ट जनरेशन DNA सीक्वेंसिंग’ के बारे में 

  • DNA सीक्वेंसिंग या अनुक्रमण: इसमें DNA अणुओं में एडेनिन, गुआनिन, साइटोसिन, और थायमिन नामक न्यूक्लियोटाइड्स के सटीक क्रम का पता लगाया जाता है। 
    • DNA सीक्वेंसिंग से वैज्ञानिकों को पता चलता है कि किसी विशेष DNA सेगमेंट में किस तरह की आनुवंशिक जानकारी मौजूद है। 
  • नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS): यह आनुवंशिक सूचनाओं का विश्लेषण करने का एक आधुनिक तरीका है। यह तरीका बड़ी संख्या में DNA या RNA का तेजी से अनुक्रमण कर सकता है।
  • लाभ: जहां पुरानी तकनीक से अनुक्रमण में महीनों लग जाते थे, वहीं नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग से केवल कुछ दिनों में ही पूरे जीनोम का अनुक्रमण किया जा सकता है। 

अलग-अलग क्षेत्रों में नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग के मुख्य उपयोग

  • माइक्रोबायोलॉजी: बैक्टीरिया, वायरस जैसे रोगजनकों की जीनोम सीक्वेंसिंग से रोगजनकों की पहचान करने, बीमारी के प्रसार पर नजर रखने और रोगाणुरोधी प्रतिरोध का अध्ययन करने में मदद मिलती है।
  • चिकित्सा अनुसंधान और जीन थेरेपी: कैंसर के प्रकारों की पहचान करने, वंशानुगत बीमारियों के लिए उत्तरदायी दोषपूर्ण जीन को बदलने और शरीर में सटीक अंग तक दवा पहुंचाने में सहायता मिलती है।
  • वन्यजीव संरक्षण: नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग से वन्यजीवों की आबादी के आनुवंशिक स्वास्थ्य, विविधता, विकासवादी इतिहास, रोग निगरानी और अवैध व्यापार का पता लगाने में मदद मिलती है। साथ ही, यह तकनीक जलवायु परिवर्तन का जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने में भी सहायक है।
  • कृषि: फसल जीनोम की सिक्वेंसिंग से फसल किस्मों को सूखा सहिष्णु बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के DNA का विश्लेषण करके पर्यावरण-अनुकूल कीट-नियंत्रण तरीकों की खोज की जा सकती है। 

पश्मीना: कश्मीर का गोल्डन फाइबर

  • लद्दाख की चांगथांगी बकरियों से ऊन प्राप्त किया जाता है और बुनाई के बाद उसे पश्मीना कहा जाता है। इस उत्पाद को 2019 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला था।
  • यह अति महीन (12-16 माइक्रोन) कश्मीरी ऊन है। इसकी पारंपरिक रूप से हाथ से कताई और बुनाई की जाती है।
  • श्रीनगर में पश्मीना परीक्षण और गुणवत्ता प्रमाणन केंद्र की स्थापना की गई है। यह केंद्र पश्मीना की प्रामाणिकता और सख्त परीक्षण प्रोटोकॉल का पालन करके गुणवत्ता मानक सुनिश्चित करता है। 
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