हाल ही में, विमानन क्षेत्रक में इंडिगो उड़ान संकट उत्पन्न हुआ था। इस संकट ने वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति में द्वयाधिकार के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं व चिंताओं को उजागर किया है।
द्वयाधिकार (Duopoly) क्या है?
- यह एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है, जिसमें दो आपूर्तिकर्ता किसी वस्तु या सेवा के बाजार पर पूरी तरह हावी होते हैं।
- भारत में, केवल दो आपूर्तिकर्ताओं वाले बाजार सामान्य होते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए- कैब सेवाओं में ओला (Ola) और उबर (Uber) का द्वयाधिकार।
- द्वयाधिकार के बढ़ने के लिए उत्तरदायी कारक:
- अत्यधिक पूंजी की आवश्यकता: बहुत अधिक निवेश की जरूरत लघु फर्मों के लिए व्यवसाय में प्रवेश करना और अस्तित्व को बनाए रखना कठिन बना देती है। उदाहरण के लिए- विमानन क्षेत्रक।
- नेटवर्क प्रभाव: बड़ी कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए शुरुआती दौर में अत्यधिक व्यय करती हैं। इससे प्रतिस्पर्धी बाहर हो जाते हैं। उदाहरण के लिए- दूरसंचार क्षेत्रक।
- विनियामक कमियां: विनियमों में स्पष्टता की कमी प्रभुत्व को और मजबूत करने में सक्षम बनाती है।
द्वयाधिकार से उत्पन्न चुनौतियां
- कीमतों में बढ़ोतरी और कम सामर्थ्य: प्रतिस्पर्धी दबाव की कमी के कारण प्रमुख कंपनियां बिना किसी विरोध के उत्पादों की कीमतें बढ़ा देती हैं। इससे उपभोक्ताओं के लिए लागत बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए- फूड डिलीवरी।
- उपभोक्ताओं के पास सीमित बाजार विकल्प: लघु अभिकर्ताओं की कम मौजूदगी होने से उपभोक्ताओं के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं।
- नवाचार में ठहराव: नवाचार केवल अपने एकमात्र प्रतिद्वंद्वी से बढ़त बनाए रखने के लिए किया जाता है, न कि नए प्रवेशकों के भय से। उदाहरण के लिए- दूरसंचार क्षेत्रक।
- अत्यधिक लॉबिंग शक्ति और विनियामक प्रभाव: शक्तिशाली द्वयाधिकार संपन्न कंपनियां अपने हितों की रक्षा करने तथा नई तकनीकों को रोकने के लिए अपने प्रभाव का उपयोग कर सकती हैं। उदाहरण के लिए- ई-कॉमर्स क्षेत्रक।
- प्रणालीगत सुभेद्यता और क्षमता की विफलता: द्वयाधिकार में एक अभिकर्ता की विफलता से अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान हो सकता है और मांग अधूरी रह सकती है। उदाहरण के लिए- विमानन क्षेत्रक में हालिया इंडिगो संकट।
निष्कर्ष
भारत में उभरते द्वयाधिकार को रोकने के लिए केवल "घटना के बाद" के विनियमन से आगे बढ़कर अग्र-सक्रिय बाजार डिजाइन की आवश्यकता है। इसमें भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की शक्तियों को बढ़ाना; CCI और क्षेत्रकीय विनियामकों के बीच समन्वय में सुधार करना; 'रेगुलेटरी सैंडबॉक्स' एवं साझा अवसंरचना के माध्यम से प्रवेश बाधाओं को कम करना तथा उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने के लिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण व डेटा पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करना शामिल है।
मौजूदा विनियामक तंत्र
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