जैसे ही न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) लागू होगा, भारत के पास चीन को छोड़कर सभी RCEP देशों के साथ व्यापार समझौते होंगे।
क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) के बारे मे
- यह 15 एशिया-प्रशांत देशों के बीच एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौता है।
- सदस्य: 10 आसियान (ASEAN) सदस्य देश — ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम। इसके साथ ही आसियान के 5 प्रमुख व्यापारिक भागीदार: ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड।
- भारत वर्ष 2019 में RCEP वार्ताओं से पीछे हट गया था।
भारत के RCEP से बाहर होने के कारण
- "चीन का जोखिम" और व्यापार असंतुलन: RCEP चीन को भारतीय बाजार तक लगभग शुल्क-मुक्त पहुंच प्रदान करता है। इससे सस्ती व अधिक प्रतिस्पर्धी चीन निर्मित वस्तुओं की भारी आमद हो सकती थी।
- घरेलू उद्योगों और कृषि को संरक्षण: डेयरी एवं कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रकों की सुरक्षा के लिए।
- अनसुलझी तकनीकी और कानूनी मांगें: टैरिफ आधार दरों, MFN (मोस्ट फेवर्ड नेशन) दर्जे में संशोधन तथा निवेश संबंधी निर्णयों में भारत के संघीय ढांचे की मान्यता जैसी चिंताओं का समाधान नहीं किया गया था।
- आत्मनिर्भरता को खतरा: RCEP में शामिल होने को 'आत्मनिर्भर भारत', 'मेक इन इंडिया' और 'वोकल फॉर लोकल' जैसे घरेलू कार्यक्रमों को संभावित रूप से कमजोर करने के रूप में देखा गया था।
भारत ने RCEP के लाभ कैसे सुरक्षित किए?
- "RCEP माइनस चाइना" फॉर्मूला: 2025 के अंत तक, भारत ने चीन को छोड़कर सभी RCEP सदस्यों के साथ FTAs पर हस्ताक्षर कर लिए हैं। इससे चीन से आयात पर टैरिफ नियंत्रण बनाए रखते हुए RCEP देशों के बाजारों तक पहुंच सुरक्षित हो गई है।
- चयनात्मक उदारीकरण और सुरक्षा उपाय: द्विपक्षीय समझौते भारत को डेयरी एवं कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रकों को बाहर रखने की अनुमति देते हैं।
- अप्रत्यक्ष प्रवेश को रोकना: RCEP से बाहर रहने से चीनी वस्तुओं के अन्य देशों के माध्यम से भारत के बाजार में अप्रत्यक्ष प्रवेश पर रोक लगी है।
निष्कर्ष
RCEP से बाहर रहने का भारत का निर्णय एक सुविचारित व्यापार रणनीति को दर्शाता है, जो रणनीतिक स्वायत्तता के साथ खुलेपन को संतुलित करती है। द्विपक्षीय FTAs के माध्यम से "RCEP माइनस चाइना" दृष्टिकोण अपनाकर, भारत ने RCEP देशों के बाजारों तक पहुंच सुरक्षित की है, संवेदनशील क्षेत्रकों की रक्षा की है, अपनी टैरिफ संप्रभुता को बरकरार रखा है और प्रणालीगत सुभेद्यताओं से बचा है। भारत की यह रणनीति सिद्ध करती है कि एकीकरण के लिए आर्थिक सुरक्षा के साथ समझौता करना आवश्यक नहीं है।