भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के बारे में

- यह एक बहु-आयामी कनेक्टिविटी परियोजना है। इसे 2023 में नई दिल्ली में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन के दौरान एक समझौता ज्ञापन (MoU) के माध्यम से औपचारिक रूप दिया गया था। इस पर भारत, यूरोपीय संघ, फ्रांस, जर्मनी, इटली, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और संयुक्त राज्य अमेरिका ने हस्ताक्षर किए थे।
- उद्देश्य: भारत, अरब प्रायद्वीप, भूमध्यसागरीय क्षेत्र और यूरोप के बीच व्यापार में वृद्धि करना। इसके लिए पत्तनों, रेलवे, सड़कों, समुद्री लाइनों और पाइपलाइनों की अवसंरचना का विकास किया जाएगा।
भारत के लिए IMEC का महत्त्व
- व्यापार मार्ग का विविधीकरण: IMEC स्वेज नहर पर निर्भरता कम करके भारत-यूरोपीय संघ कनेक्टिविटी में विविधता लाएगा।
- उदाहरण के लिए: 2023-24 के लाल सागर संकट के दौरान वाणिज्यिक जहाजों पर हूती विद्रोहियों के हमलों ने वैकल्पिक मार्गों की आवश्यकता को रेखांकित किया था।
- कम लॉजिस्टिक्स लागत और समय: IMEC से पारगमन समय में 40% तक और लॉजिस्टिक्स लागत में लगभग 30% की कमी आने की उम्मीद है। इससे निर्यातकों को देरी से बचने में मदद मिलेगी।
- पत्तन अनुकूलन: यह भारत के पश्चिमी तट के पत्तनों (जैसे- मुंबई व मुंद्रा) को भूमध्यसागरीय और खाड़ी लॉजिस्टिक्स तंत्र के साथ गहराई से जोड़कर उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने की प्रतिबद्धता प्रकट करता है।
- वैश्विक मूल्य श्रृंखला में सुधार: यूरोप के साथ बेहतर संपर्क भारत को कम-मूल्य वाली असेंबली से उच्च-मूल्य वाले विनिर्माण एवं सेवाओं की ओर बढ़ने में सक्षम बनाएगा।
चुनौतियां
- भू-राजनीतिक तनाव: उदाहरण के लिए- हमास-इजरायल युद्ध जैसी स्थितियां परियोजना की प्रगति में बाधा डाल सकती हैं।
- पत्तन क्षमता में विषमता: उदाहरण के तौर पर, जहां संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का 'जेबेल अली' पत्तन वार्षिक 90 मिलियन टन कार्गो संभाल सकता है, वहीं इजरायल का 'हाइफा' पत्तन लगभग 30 मिलियन टन तक ही सीमित है।
- वित्त-पोषण अंतराल: IMEC कई देशों में फैला हुआ है जिनकी राजकोषीय क्षमता और क्रेडिट प्रोफाइल (ऋण चुकाने की क्षमता) अलग-अलग है। इससे पारंपरिक सार्वजनिक वित्त-पोषण सुरक्षित करना कठिन हो रहा है।
IMEC की सफलता के लिए एक परिष्कृत वित्त-पोषण संरचना की आवश्यकता है, जिसमें सार्वजनिक निवेश, संप्रभु संपदा पूंजी (Sovereign Wealth Capital) और बहुपक्षीय गारंटी आदि का मिश्रण हो।