भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) को लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को फिर से शुरू करने पर एक चर्चा-पत्र जारी किया है। इन बैंकों में सकारात्मक सुधारों, हितधारकों की बढ़ती मांग और RBI के तहत मजबूत विनियामक ढांचे को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।
- वर्ष 2004 से UCBs को लाइसेंस देने पर रोक लगा दी गई थी, क्योंकि यह पाया गया था कि बड़ी संख्या में नए लाइसेंस प्राप्त बैंक बहुत कम समय में वित्तीय रूप से कमजोर हो गए थे।
लाइसेंसिंग फिर से शुरू करने के पक्ष में तर्क
- वित्तीय समावेशन: UCBs दूरदराज के और छोटे कस्बों में बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलता है।
- विनियामक शक्तियों में वृद्धि: बैंकिंग विनियमन अधिनियम में 2020 के संशोधन के बाद RBI की पर्यवेक्षण क्षमताएं काफी मजबूत हुई हैं।
- संस्थागत सहायता: नवनिर्मित अम्ब्रेला संगठन (NUCFDC) से पूंजी, ज्ञान और तकनीकी सहायता मिलने की उम्मीद है, जिससे यह UCB क्षेत्रक और मजबूत होगा।
- NUCFDC: राष्ट्रीय शहरी सहकारी वित्त और विकास निगम लिमिटेड
शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के बारे में
- UCB एक ऐसी सहकारी समिति है, जो किसी राज्य सहकारी समिति अधिनियम या बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत होती है। साथ ही, जिसे बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के तहत प्राथमिक सहकारी बैंक के रूप में बैंकिंग लाइसेंस प्राप्त होता है।
- भारत में UCBs की वर्तमान स्थिति:
- कुल UCBs: 31 मार्च, 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार देश में 1,457 UCBs हैं।
- नियंत्रण और विनियमन: UCBs एक दोहरी विनियामक संरचना के तहत कार्य करते हैं:
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI): 1966 से RBI लाइसेंसिंग, पूंजी पर्याप्तता, ऋण नीतियां, विवेकपूर्ण मानदंड और वित्तीय स्थिरता सहित बैंकिंग कार्यों को विनियमित करता है।
- सहकारी समितियों का रजिस्ट्रार (RCS): संबंधित राज्य सरकारें या केंद्र सरकार RCS के माध्यम से UCBs के प्रशासनिक व प्रबंधकीय कार्यों को नियंत्रित करती हैं।
- स्तरीय विनियामक संरचना: RBI ने जमा राशि के आकार के आधार पर UCBs को चार स्तरों (Tiers) में वर्गीकृत किया है, ताकि उनके आकार के अनुसार उचित विनियमन एवं पर्यवेक्षण सुनिश्चित किया जा सके।