यह रिपोर्ट नीति आयोग ने ऊर्जा और संसाधन संस्थान (TERI) के सहयोग से जारी की है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): यह उत्पादन और उपभोग का एक मॉडल है। इसमें मौजूदा सामग्रियों व उत्पादों को साझा करना, पट्टे पर देना, पुन: उपयोग करना, मरम्मत करना, नवीनीकरण करना और पुनर्चक्रण करना शामिल है।
ई-अपशिष्ट की चक्रीयता में चुनौतियां
- अनौपचारिक और अक्षम संग्रह: भारत के कुल ई-अपशिष्ट का लगभग 78% अनौपचारिक क्षेत्रक द्वारा संसाधित किया जाता है। इसमें सामग्री की पुनर्प्राप्ति दर केवल 10-20% होती है, जबकि औपचारिक सुविधाओं में यह 95-97% तक होती है।
- कमजोर निगरानी और प्रवर्तन: विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) प्रणाली में हेरफेर देखा गया है। उदाहरण के लिए- फर्जी EPR प्रमाण-पत्रों का चलन।
- सीमित EPR कवरेज: वर्तमान में केवल कुछ धातुओं का ही सर्वाधिक उपयोग होता है, जैसे लोहा (52%) और तांबा (18%)। इनके विपरीत, लिथियम और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) उपेक्षित रह जाते हैं।
- कम तकनीकी क्षमता: कुशल, सुरक्षित और बड़े स्तर पर पुनर्चक्रण के लिए कौशल एवं प्रौद्योगिकियों की कमी है।
सिफारिशें
- अपशिष्ट प्रबंधन नियमों को मजबूत करना: उच्च मूल्य वाली धातुओं को शामिल करने के लिए EPR कवरेज का विस्तार करके पुनर्चक्रणकर्ताओं की निगरानी करनी चाहिए।
- प्रोत्साहन प्रदान करना: उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत 'एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल' के निर्माताओं के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन का प्रस्ताव करना चाहिए।
- कार्बन बाजार में एकीकरण: बैटरी पुनर्चक्रण को भारतीय कार्बन बाजार से जोड़ना चाहिए। इससे पुनर्चक्रणकर्ता ग्रीन हाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में कमी का मुद्रीकरण (monetize) कर सकेंगे।
- अनौपचारिक क्षेत्रक का समेकन: सिंगल-विंडो सिस्टम का उपयोग करना चाहिए। साथ ही, राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM) में विशेष रूप से पुनर्चक्रण के लिए एक अलग घटक स्थापित करना चाहिए।
- अन्य: उपभोक्ता जागरूकता बढ़ानी चाहिए; कार्यबल का कौशल विकास करना चाहिए और पुन: कौशल विकास (Re-skilling) पर ध्यान देना चाहिए आदि।
भारत में ई-अपशिष्ट की स्थिति
भारत द्वारा की गई पहलें
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