भारत और फ्रांस ने दोहरे कराधान परिहार अभिसमय (DTAC) में संशोधन के लिए एक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए हैं। DTAC पर मूल रूप से 1992 में हस्ताक्षर किए गए थे।
- DTAC कुछ 'दोहरे कराधान परिहार समझौतों' (DTAAs) के लिए उपयोग किया जाने वाला औपचारिक/कानूनी नाम है।
- DTAA दो देशों के बीच हस्ताक्षरित एक समझौता है, ताकि व्यक्तियों या व्यवसायों को उनकी आय पर दोहरे कराधान से बचाया जा सके।
प्रमुख संशोधन
- संधि लाभों में अस्पष्टता को समाप्त करने के लिए 'मोस्ट-फेवर्ड-नेशन' (MFN) क्लॉज को हटा दिया गया है।
- लाभ स्थानांतरण को रोकने के लिए 'आधार क्षरण एवं लाभ स्थानांतरण' (BEPS) बहुपक्षीय साधन (MLI) के प्रावधानों को शामिल किया गया है।
मोस्ट-फेवर्ड-नेशन (MFN) के बारे में
- यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) का एक मौलिक सिद्धांत है।
- यह सुनिश्चित करता है कि देश अपने व्यापारिक भागीदारों के बीच भेदभाव न करें।
- यदि कोई WTO सदस्य किसी एक देश को कम प्रशुल्क (टैरिफ) जैसी अनुकूल व्यापारिक शर्तें प्रदान करता है, तो उसे वही लाभ अन्य सभी WTO सदस्यों को भी देने होंगे।
BEPS बहुपक्षीय साधन (MLI) के बारे में
- यह एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जो देशों को मौजूदा द्विपक्षीय कर संधियों को व्यक्तिगत रूप से फिर से वार्ता किए बिना संशोधित करने में सक्षम बनाती है।
- BEPS MLI 2018 में लागू हुआ और इसके प्रावधान 2019 में प्रभावी हुए।
- उद्देश्य:
- आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD)/G20 BEPS परियोजना के तहत विकसित कर संधि उपायों को लागू करना।
- आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण (BEPS) को रोकने में मदद करना।
- BEPS बहुराष्ट्रीय उद्यमों (MNEs) द्वारा उपयोग की जाने वाली कर से बचने की रणनीति है। ये कंपनियां कर का भुगतान करने से बचने के लिए कर नियमों में खामियों और अलग-अलग देशों के नियमों में अंतर का फायदा उठाती हैं।
- इसके तहत जानबूझकर मुनाफे को ऐसे देशों या क्षेत्रों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जहां कम कर लगता है या कोई कर नहीं लगता है, और जहां बहुत कम या न के बराबर आर्थिक गतिविधियां होती हैं। इसके अलावा, कंपनियां ब्याज या रॉयल्टी के भुगतान के नाम पर कर छूट के जरिए कर आधार या कर योग्य आय को समाप्त कर देती हैं।