न्यायालय ने इस बात पर गौर किया कि इसकी शुरुआत के एक दशक से भी अधिक समय बाद राजनीतिक दलों द्वारा चुने जाने वाले उम्मीदवारों के चयन पर इसका बहुत कम प्रभाव पड़ा है।
- नोटा में नागरिक किसी भी राजनीतिक उम्मीदवार को वोट न देकर चुनाव में उम्मीदवारों को अस्वीकार या ख़ारिज कर सकते हैं।
- 2013 में 'PUCL बनाम भारत संघ' मामले में, उच्चतम न्यायालय ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) पर नोटा विकल्प शामिल करने का निर्देश दिया था।
- नोटा को पहली बार 2013 में छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में लागू किया गया था।
नोटा संबंधी चुनौतियां
- निर्विरोध चुनाव: उन निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता नोटा विकल्प का उपयोग नहीं कर सकते, जहां उम्मीदवार निर्विरोध चुना जाता है।
- चुनाव परिणामों पर कोई प्रभाव नहीं: वर्तमान में, यदि नोटा के पक्ष में सबसे अधिक मतदान होता है, तब भी दूसरे नंबर पर सबसे अधिक मत पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित कर दिया जाता है।
- अपराधीकरण के विरुद्ध अप्रभावी: राजनीतिक दल नैतिक विचारों की बजाय केवल 'चुनाव जीतने की क्षमता' (electability) के आधार पर उम्मीदवारों का चयन करना जारी रखते हैं।
आगे की राह
- 50%+1 नियम और उम्मीदवारों पर प्रतिबंध: इस नियम के तहत, यदि नोटा को 51% वैध मत मिलते हैं, तो वहां फिर से चुनाव कराए जाते हैं और पिछले उम्मीदवारों को दोबारा चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता है।
- उदाहरण: कोलंबिया में इसी नियम का पालन किया जाता है।
- राज्य-स्तरीय पहल: महाराष्ट्र और हरियाणा के राज्य चुनाव आयोगों ने सकारात्मक कदम उठाते हुए नोटा को स्थानीय निकाय चुनावों में एक 'काल्पनिक उम्मीदवार' (fictional candidate) माना है तथा नोटा को बहुमत मिलने की स्थिति में फिर से चुनाव कराने के आदेश दिए हैं।