कोयला लॉजिस्टिक्स नीति एवं योजना (2024) के तहत, भारत का लक्ष्य वित्त वर्ष 2030 तक प्रति वर्ष 1.5 बिलियन टन (BT) कोयला उत्पादन करना है।
भारत के लिए कोयला का महत्व
- ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता है: कोयला अभी भी भारत में लगभग 74% बिजली उत्पादन में योगदान देता है। इससे निरंतर विद्युत आपूर्ति (बेस-लोड पावर) सुनिश्चित होती है, खासकर अन्य ऊर्जा स्रोतों की आपूर्ति बाधित होने की दशा में।
- जैसे कि पश्चिम एशिया संघर्ष की वजह से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित होना, यूरेनियम की सीमित आपूर्ति, और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के लिए आवश्यक अति-महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल) पर चीन का प्रभुत्व।
- मुख्य उद्योगों के संचालन में सहायक: जैसे कि विद्युत, इस्पात और सीमेंट उद्योगों के लिए, जो अवसंरचना विकास और आर्थिक संवृद्धि के महत्वपूर्ण संचालक हैं।
- आयात की जगह: घरेलू कोयला भंडार होने की वजह से पूरी तरह आयात नहीं करना पड़ता है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है और चालू खाता संतुलन में सुधार होता है।

भारत में कोयले पर निर्भरता की चुनौतियां
- कोयले की खपत की चरणबद्ध समाप्ति हेतु वैश्विक दबाव: विकसित देश जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु कोयले के उपयोग में चरणबद्ध कमी की वकालत कर रहे हैं। इससे नई परियोजना के लिए वित्तपोषण मिलने में समस्या उत्पन्न हो रही है। साथ ही, ऐसी परियोजना के लंबे समय तक उपयोगी बने रहने पर संदेह उत्पन्न होता है।
- आयात पर निर्भरता: भारत में उत्पादित कोयले की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। भारतीय कोयला में राख (ash) की उच्च मात्रा होती है और उष्मीय मान कम (low calorific value) होता है। वहीं बिजली उत्पादन हेतु कोयला की मांग बहुत अधिक है। इसलिए भारत ने 2024–25 में लगभग 248.5 मिलियन टन कोयला आयात किया।
- अन्य समस्याएं: भूमि अधिग्रहण में देरी, ओपन-कास्ट खनन से पर्यावरण को नुकसान, और परियोजना की वजह से पुनर्वास से जुड़ी चिंताएं।
भारत में कोयला क्षेत्रक के लिए उठाए गए कदम
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