संसद ने 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026' पारित किया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2024, 2019 के अधिनियम में संशोधन करता है, जिसमें स्व-निर्धारण का प्रावधान हटा दिया गया है और पहचान सत्यापन के लिए एक चिकित्सा बोर्ड की स्थापना की गई है।
  • चिंताओं में स्वायत्तता का नुकसान, गैर-बाइनरी व्यक्तियों का बहिष्कार, चिकित्सा परीक्षाओं के माध्यम से गोपनीयता का उल्लंघन और सामुदायिक परामर्श का अभाव शामिल हैं।
  • ट्रांसजेंडर कल्याण का समर्थन करने वाली प्रमुख पहलों में एनएएलएसए का 2014 का निर्णय, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद, एक राष्ट्रीय पोर्टल और स्माइल योजना शामिल हैं।

In Summary

इस विधेयक के द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में कई बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों का उद्देश्य ट्रांसजेंडर समुदाय को बेहतर विधिक सुरक्षा प्रदान करना है।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • संशोधित परिभाषा: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान (किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता), जैविक भिन्नता (बायोलॉजिकल वैरिएशंस) आदि के आधार पर परिभाषित किया गया है।
  • स्व-पहचान के अधिकार को हटाना: इस विधेयक के द्वारा 2019 के अधिनियम की धारा 4(2) को हटा दिया गया है। इसमें  प्रावधान था कि कोई भी शख्स अपनी इच्छा से खुद को ट्रांसजेंडर (self-determination) घोषित कर सकता था, उसके बाद उसे प्रमाणपत्र मिल जाता था। अब स्व-निर्धारण की विधिक मान्यता समाप्त कर दी गई है।
  • सत्यापन प्राधिकरण: ट्रांसजेंडर की पहचान के सत्यापन हेतु मुख्य चिकित्सा अधिकारी/उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता में एक चिकित्सा बोर्ड की स्थापना जाएगी।
  • कठोर दंड का प्रावधान: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध अपराधों के लिए कई तरह के दंड के प्रावधान किए गए हैं। इनमें आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान भी है।
  • राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद: इसकी संरचना में संशोधन करके राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व रोटेशन के आधार पर सुनिश्चित किया गया है।

विधेयक से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ

  • स्वतंत्रता की हानि: स्व-पहचान की बजाय अब राज्य-निर्धारित चिकित्सा बोर्ड की पुष्टि के आधार पर ट्रांसजेंडर को मान्यता मिलेगी।
  • संकीर्ण परिभाषा के कारण कई लोग समुदाय से बाहर हो जाएंगे: 2019 अधिनियम के विपरीत, यह विधेयक ट्रांस-पुरुषों, नॉन-बाइनरी और जेंडर-क्वियर व्यक्तियों को ट्रांसजेंडर समुदायों के लिए उपलब्ध विधिक सुरक्षा के दायरे से बाहर कर सकता है।
  • निजता (प्राइवेसी) और गरिमा का उल्लंघन: लैंगिक पहचान सिद्ध करने हेतु चिकित्सा परीक्षण को ‘निजता के अधिकार’ और ‘मानव गरिमा’ के विरुद्ध माना जा रहा है।
  • मेडिकल गेटकीपिंग: यह विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को चिकित्सा बोर्ड द्वारा जांच/सत्यापन के लिए मजबूर करता है, जिससे उन्हें एक बीमारी की तरह देखा जा सकता है और इससे उन्हें परेशानी या उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है।
  • विधेयक पर अधिक परामर्श नहीं किया जाना: विधेयक को संसद की स्थायी समिति को भेजे बिना और ट्रांसजेंडर समुदाय से परामर्श किए बिना पारित किया गया।

भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के कल्याण हेतु पहलें

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) बनाम भारत संघ वाद: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दी गयी। ट्रांसजेंडर के "स्व-पहचान के अधिकार" की पुष्टि की गई।
  • राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद: यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन हेतु एक सांविधिक निकाय है।
  • राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर पोर्टल: यह ट्रांसजेंडर को पहचान प्रमाणपत्र प्रदान करने और लाभों की प्राप्ति के लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा प्रदान करता है।
  • SMILE/स्माइल (आजीविका और उद्यम के लिए हाशिए पर रहने वाले व्यक्तियों हेतु सहायता) योजना: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के व्यापक पुनर्वास और सशक्तिकरण के लिए; आश्रय के लिए 'गरिमा गृह'
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SMILE/स्माइल (SMILE - Support for Marginalized Individuals for Livelihood and Enterprise)

यह एक सरकारी योजना है जिसका उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्तियों सहित हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए आजीविका, पुनर्वास और सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है। इसमें 'गरिमा गृह' जैसे आश्रय भी शामिल हैं।

राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद (National Council for Transgender Persons)

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित एक सांविधिक निकाय, जो नीतियों और कार्यक्रमों की देखरेख करता है।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) बनाम भारत संघ वाद

यह एक ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय था जिसने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को 'थर्ड जेंडर' के रूप में मान्यता दी और उनके 'स्व-पहचान के अधिकार' की पुष्टि की।

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