यह विधेयक विदेशी अंशदान (फंड) के दुरुपयोग को रोकने तथा अंशदान प्राप्ति में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया है।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान
- "निर्धारित प्राधिकरण" का गठन: किसी NGO का पंजीकरण रद्द होने, इसे समर्पित करने (surrender) या नवीनीकरण नहीं होने की दशा में विदेशी अंशदान से निर्मित परिसंपत्तियों को संभालने, प्रबंधित करने या निपटान करने के लिए इस प्राधिकरण का गठन किया जाएगा।
- यदि पंजीकरण बहाल नहीं होता है, तो उपर्युक्त प्राधिकरण परिसंपत्तियों को स्थानांतरित कर सकता है या बेच सकता है और इससे प्राप्त राशि भारत की संचित निधि में जमा होगी। इस निर्णय के खिलाफ केवल न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
- दंड को युक्तिसंगत बनाया गया: अधिकतम कारावास 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष किया गया।
- पूर्व-स्वीकृति आवश्यक: केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी जांच शुरू नहीं की जा सकती।
- NGO के मुख्य पदाधिकारी की नई परिभाषा: परिभाषा का विस्तार करके NGO के निदेशक, साझेदार, ट्रस्टी और संगठन के कार्यों को नियंत्रित करने वाले पदाधिकारियों को शामिल किया गया है।
- अन्य प्रावधान:
- पूर्व-अनुमति श्रेणी के तहत फंड के उपयोग के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई है;
- पंजीकरण के निलंबन के दौरान परिसंपत्तियों के प्रबंधन का विनियमन किया जाएगा;
- समय पर पंजीकरण नवीनीकरण न होने पर FCRA पंजीकरण स्वतः समाप्त हो जाएगा।
विधेयक से जुड़ी प्रमुख चिंताएं
- अत्यधिक प्रत्यायोजन (Excessive Delegation): महत्वपूर्ण पहलुओं (परिसंपत्ति का प्रबंधन, समय-सीमा, अपील) को कानून के द्वारा प्रशासित करने की बजाय सरकारी नियमों पर छोड़ दिया गया है।
- लोकतंत्र से जुड़ी चिंताएँ: संगठन के संचालन व उल्लंघन से जुड़े दायित्यों की जिम्मेदारी व्यक्तिगत रूप से पदाधिकारियों पर सौंपने, साक्ष्य प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी भी एनजीओ व इसके पदाधिकारियों पर डालने से एनजीओ के कार्य करने की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। इससे उनके बीच अनिश्चितता और डर का माहौल बन सकता है।
- संविधान का अनुच्छेद 300A: पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना नामित प्राधिकरण द्वारा एनजीओ की संपत्तियों पर कार्यपालिका का व्यापक नियंत्रण संभावित रूप से संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन कर सकता है।
- संविधान का अनुच्छेद 14: पहले से अनुमति लेने की शर्त का गलत तरीके से इस्तेमाल हो सकता है, जिससे कुछ लोगों पर ही नियम लागू किए जा सकते हैं। इससे 'विधि के समक्ष समानता' का मूल अधिकार कमजोर पड़ सकता है।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 के बारे में
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