इस अध्ययन के अनुसार 2014–2022 के बीच रात्रिकालीन कृत्रिम प्रकाश में लगभग 16% की वृद्धि (लगभग 2% वार्षिक दर से) दर्ज की गई है। इसकी वजहें हैं-शहरीकरण, विद्युतीकरण और अवसंरचना विकास।
अध्ययन के प्रमुख बिंदु
- कृत्रिम प्रकाश जनित चमक में क्षेत्रीय भिन्नताएं: उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में वृद्धि हुई है। वहीं कृत्रिम प्रकाश के विनियमन के तहत यूरोप में जानबूझकर रोशनी कम की गई है।
- अमेरिका, चीन, भारत, कनाडा और ब्राजील में कृत्रिम प्रकाश की वजह से रात्रिकालीन आकाश सर्वाधिक प्रकाशमय दिखता है।
- रिबाउंड प्रभाव: ऊर्जा-दक्ष प्रकाश प्रणाली (जैसे LED) अपनाने के बाद भी कुल रोशनी बढ़ गई है, क्योंकि सस्ती और कम बिजली खपत वाली लाइट मिलने से लोग अब अधिक मात्रा में लाइट का उपयोग करने लगे हैं।
प्रकाश प्रदूषण के बारे में
- परिभाषा: कृत्रिम आउटडोर रोशनी का अत्यधिक, गलत दिशा में या अनावश्यक रूप से उपयोग होना प्रकाश प्रदूषण है।
- मुख्य चिंताएं:
- स्वास्थ्य पर प्रभाव: यह इंसान की जैविक घड़ी यानी सर्कैडियन रिदम और मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को बाधित करता है, जिससे नींद नहीं आने से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
- पारिस्थितिकी तंत्र में व्यवधान: यह प्रवासी पक्षियों को भ्रमित करता है, समुद्री कछुओं की संतति के लिए खतरा बनता है, और रात में सक्रिय जीवों के आहार व प्रजनन चक्र को प्रभावित करता है।
- अन्य चिंताएं:
- आसमान में कृत्रिम चमक (sky glow) के कारण रात्रि आकाश साफ दिखाई नहीं देता, जिससे खगोलीय अध्ययन में बाधा आती है।
- ऊर्जा की बर्बादी से आर्थिक नुकसान होता है।
- कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जिससे पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ता है।
प्रमुख पहलें: हानले डार्क स्काई रिजर्व
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