ये कलाकृतियाँ लीडेन विश्वविद्यालय के पास थीं और ये 'लीडेन ताम्रपत्र' (Leiden copper plates) के नाम से लोकप्रिय हैं।
- प्रधान मंत्री की इस यात्रा के दौरान भारत और नीदरलैंड ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को 'रणनीतिक साझेदारी' का दर्जा प्रदान किए।
लीडेन ताम्रपत्र के बारे में
- इनमें 21 बड़ी और 3 लघु ताम्रपत्र शामिल हैं। ये कांस्य की एक अंगूठी से बंधी हुई हैं, जिस पर चोल राजा राजेंद्र चोल प्रथम की मुहर लगी है। दूसरे सेट पर कुलोत्तुंग चोल प्रथम की मुहर है।
- ताम्रपत्र की भाषा: तमिल और संस्कृत।
- इन ताम्रपत्रों को 1712 में डच ईस्ट इंडीज कंपनी से जुड़े एक डच मिशनरी फ्लोरेंटियस कैंपर द्वारा नागपट्टिनम से नीदरलैंड ले जाया गया था।
- महत्व: ये ताम्रपत्र चोल साम्राज्य के प्रशासन, कर-प्रणाली, भूमि सुधार, सिंचाई प्रणाली और व्यापार संबंधों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं।
- इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया के श्रीविजय शासकों द्वारा निर्मित बौद्ध विहार को अनाइमंगलम गांव दान में दिए जाने का रिकॉर्ड दर्ज है। यह धार्मिक सद्भाव और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संबंधों को दर्शाता है।
ताम्रपत्र अभिलेख के बारे में
- ताम्रपत्र अभिलेख वास्तव में तांबे की पट्टिकाओं पर उत्कीर्ण शासकीय आदेश होते हैं। ये पट्टिकाएं प्रायः राजकीय मुहर वाली एक अंगूठी के साथ आपस में बंधी होती हैं।
- ताम्रपत्र अभिलेख आमतौर पर भू-अनुदान, राजकीय मुहर के साथ राजकीय वंशावली की सूची, धार्मिक अनुदान और दान आदि को दर्ज करते थे।
- सबसे पहला ज्ञात ताम्रपत्र अभिलेख मौर्य काल का 'सोहगौरा ताम्रपत्र' है, जिसमें अकाल राहत प्रयासों का उल्लेख है। यह प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है।
- अधिकतर ताम्रपत्र अभिलेख दक्षिणी राज्यों में प्राप्त हुए हैं।
साम्राज्यवादी चोलों के बारे में (850 - 1279 ईस्वी)
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