प्रधान मंत्री की राजकीय यात्रा के दौरान नीदरलैंड ने 11वीं सदी के चोल ताम्रपत्र भारत को वापस किए | Current Affairs | Vision IAS

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  • लीडेन में रखे तांबे के शिलालेख, जो तमिल और संस्कृत में हैं, चोल प्रशासन, भूमि अनुदान और दक्षिण पूर्व एशियाई संबंधों का विस्तृत विवरण देते हैं।
  • तांबे की प्लेटों पर उत्कीर्ण शिलालेख, उत्कीर्ण तांबे की चादरों पर अंकित आधिकारिक अभिलेख होते हैं, जिनमें अक्सर भूमि अनुदान और शाही वंशों का विवरण होता है।
  • शाही चोल (850-1279 ईस्वी) एक प्रमुख तमिल राजवंश था जो प्रशासन, सांस्कृतिक संरक्षण और मंदिर वास्तुकला के लिए जाना जाता था।

In Summary

ये कलाकृतियाँ लीडेन विश्वविद्यालय के पास थीं और ये 'लीडेन ताम्रपत्र' (Leiden copper plates) के नाम से लोकप्रिय हैं।

  • प्रधान मंत्री की इस यात्रा के दौरान भारत और नीदरलैंड ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को 'रणनीतिक साझेदारी' का दर्जा प्रदान किए।

लीडेन ताम्रपत्र के बारे में 

  • इनमें 21 बड़ी और 3 लघु ताम्रपत्र शामिल हैं। ये कांस्य की एक अंगूठी से बंधी हुई हैं, जिस पर चोल राजा राजेंद्र चोल प्रथम की मुहर लगी है। दूसरे सेट पर कुलोत्तुंग चोल प्रथम की मुहर है।
  • ताम्रपत्र की भाषा: तमिल और संस्कृत।
  • इन ताम्रपत्रों को 1712 में डच ईस्ट इंडीज कंपनी से जुड़े एक डच मिशनरी फ्लोरेंटियस कैंपर द्वारा नागपट्टिनम से नीदरलैंड ले जाया गया था।
  • महत्व: ये ताम्रपत्र चोल साम्राज्य के प्रशासन, कर-प्रणाली, भूमि सुधार, सिंचाई प्रणाली और व्यापार संबंधों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं।
  • इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया के श्रीविजय शासकों द्वारा निर्मित बौद्ध विहार को अनाइमंगलम गांव दान में दिए जाने का रिकॉर्ड दर्ज है। यह धार्मिक सद्भाव और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संबंधों को दर्शाता है।

ताम्रपत्र अभिलेख के बारे में  

  • ताम्रपत्र अभिलेख वास्तव में तांबे की पट्टिकाओं पर उत्कीर्ण शासकीय आदेश होते हैं। ये पट्टिकाएं प्रायः राजकीय मुहर वाली एक अंगूठी के साथ आपस में बंधी होती हैं।
  • ताम्रपत्र अभिलेख आमतौर पर भू-अनुदान, राजकीय मुहर के साथ राजकीय वंशावली की सूची, धार्मिक अनुदान और दान आदि को दर्ज करते थे।
  • सबसे पहला ज्ञात ताम्रपत्र अभिलेख मौर्य काल का 'सोहगौरा ताम्रपत्र' है, जिसमें अकाल राहत प्रयासों का उल्लेख है। यह प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है।
  • अधिकतर ताम्रपत्र अभिलेख दक्षिणी राज्यों में प्राप्त हुए हैं। 

साम्राज्यवादी चोलों के बारे में (850 - 1279 ईस्वी) 

  • संगम साहित्य में इन्हें 'मुवेन्दर' (Muvendhar) कहा गया है। यह तीन प्रमुख तमिल साम्राज्यों में से एक था। अन्य दो तमिल साम्राज्य; चेर और पांड्य थे। 
  • प्रमुख शासक: 
    • विजयालय: चोल वंश का संस्थापक, 
    • परान्तक चोलमदुरैकोंड की उपाधि धारण की, 
    • राजराज चोल प्रथम: उत्तरी श्रीलंका और मालदीव पर विजय प्राप्त की, 
    • राजेंद्र चोल प्रथम: श्रीविजय साम्राज्य पर विजय प्राप्त की, गंगैकोंडचोलपुरम की स्थापना की।
  • संस्कृति का संरक्षण: तमिल साहित्य का विकास हुआ और महाकाव्य "कलिंगत्तुप्परणी" तथा नयनारों द्वारा भक्ति संगीत "तीवरम" जैसी रचनाओं का संकलन हुआ।
  • स्थापत्य कला में योगदान: तंजावुर में बृहदेश्वर मंदिर, दारासुरम में ऐरावतेश्वर मंदिर और गंगैकोंडचोलपुरम के मंदिर चोल स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
  • धातु मूर्तिकला: पंच-धातुओं (ताँबा, चाँदी, सोना, टिन और सीसा) के मिश्रण (मिश्र धातु) का उपयोग करके लॉस्ट-वैक्स पद्धति के माध्यम से धातु की ठोस मूर्तियों का निर्माण किया गया।
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