भारत ने स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration: CoA) के गठन को कभी भी मान्यता नहीं दी। साथ ही, भारत ने सिंधु जल संधि को फिलहाल निलंबित कर रखा है।
स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (CoA) के बारे में
- यह पांच सदस्यीय मध्यस्थता कार्यदल है। इसका गठन 2023 में पाकिस्तान के अनुरोध पर किया गया था। इसमें पाकिस्तान ने भारत की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन को चुनौती दी थी।
- भारत का पक्ष: भारत ने इसकी कार्यवाही में भाग लेने से इनकार कर दिया, और यह तर्क दिया कि यह विवाद विश्व बैंक द्वारा नियुक्त 'तटस्थ विशेषज्ञ' के अधिकार क्षेत्र में आता है।
सिंधु जल संधि (IWT) के बारे में
- परिचय: यह संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित हुई थी। विश्व बैंक (हस्ताक्षरकर्ता) ने इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के जल वितरण को निर्धारित करना था।
- संधि का दायरा: यह संधि सिंधु बेसिन की मुख्य नदियों पर लागू होती हैं। ये नदियां हैं; सतलुज, ब्यास, रावी (पूर्वी नदियां) तथा झेलम, चिनाब और सिंधु (पश्चिमी नदियां)।
- संधि के अनुसार पूर्वी नदियों का समस्त जल भारत को बिना किसी प्रतिबंध के उपयोग हेतु आवंटित किया गया। वहीं, भारत पर यह दायित्व है कि वह पश्चिमी नदियों के जल को बहने दे, केवल घरेलू उपयोग, गैर-उपभोग्य उपयोग तथा संधि में अनुमत अन्य उपयोगों को छोड़कर।
सिंधु जल संधि (IWT) के तहत विवाद समाधान प्रणाली
- चरण 1- स्थायी सिंधु आयोग (PIC): इसमें प्रत्येक देश का एक आयुक्त होता है। इसकी बैठक प्रतिवर्ष बारी-बारी से दोनों देशों में आयोजित होती है।
- चरण 2-तटस्थ विशेषज्ञ: यह विश्व बैंक द्वारा नियुक्त किया जाता है। इनके निर्णय बाध्यकारी प्रकृति के होते हैं।
- चरण 3-मध्यस्थता न्यायालय (CoA): संधि के पक्षकारों के बीच सहमति होने पर या किसी भी पक्ष के अनुरोध पर इसका गठन किया जाता है।