शोधकर्ताओं ने 2015 के बाद से अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ के बड़े पैमाने पर पिघलने के कारकों की पहचान की | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • 2015 से दक्षिणी महासागर में अस्थिरता के कारण अंटार्कटिका ने लगभग 12,800 वर्ग किलोमीटर जमी हुई बर्फ (1996-2025) खो दी।
  • अस्थिरता पैदा करने वाले कारकों में गहरे समुद्र की गर्मी, मजबूत पश्चिमी हवाएं और समुद्री बर्फ के पिघलने का एक स्व-पुनर्बलनकारी प्रतिक्रिया चक्र शामिल हैं।
  • अंटार्कटिका जलवायु नियामक, मीठे पानी के भंडार के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, महासागरीय परिसंचरण और जैव विविधता का समर्थन करता है, और कार्बन/ऊष्मा को अवशोषित करने का काम करता है।

In Summary

कुल मिलाकर, अंटार्कटिका ने 1996 से 2025 के बीच लगभग 12,800 वर्ग किमी स्थिर (grounded) बर्फ खो दी। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि 2015 के बाद बर्फ के विस्तार में आई आकस्मिक गिरावट का एक प्रमुख कारण अंटार्कटिका के चारों ओर स्थित दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) की अस्थिरता है।

  • यह अस्थिरता गहरे महासागरीय तापतेज पवनों और प्रभावी फीडबैक लूप के संयुक्त प्रभाव के कारण उत्पन्न हुई।
    • गहरे महासागरीय ताप: दक्षिणी महासागर में परतदार संरचना थी, जहाँ ऊपर ठंडा एवं ताजा जल और नीचे गर्म एवं अधिक खारा जल मौजूद था। यह परत ऊष्मा को जल सतह तक पहुँचने से रोकती थी। वर्ष 2015 तक यह अवरोध कमजोर पड़ गया।
    • तेज पवनें:  ओजोन छिद्र और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण पश्चिमी पवनें (पछुवा) अधिक प्रबल हो गईं। इन पवनों ने पंप की तरह कार्य करते हुए गर्म और खारे गहरे समुद्री जल को धीरे-धीरे जल सतह के करीब यानी ऊपर ला दिया।
    • प्रभावी फीडबैक लूप: ऊपर उठता हुआ गहरा जल समुद्री सतह पर गर्मी और लवण लेकर आता है।
      • ऊष्मा समुद्री बर्फ को पिघलाती है, जबकि अतिरिक्त लवण सतही जल को अधिक सघन बनाता है। इससे ऊपर के समुद्री जल का नीचे के गर्म जल के साथ मिश्रण आसान हो जाता है। इससे और अधिक ऊष्मा ऊपर आने लगती है, और नई समुद्री बर्फ का निर्माण कठिन हो जाता है। इस तरह यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।  

अंटार्कटिका की भूमिका और महत्व 

  • जलवायु नियंत्रण में: अंटार्कटिका सौर विकिरण को परावर्तित करता है और पृथ्वी की जलवायु एवं तापमान को संतुलित रखने में मदद करता है।
  • ताजे जल का भंडार: अंटार्कटिका अपनी बर्फ की चादरों (ice sheets) में विश्व के लगभग 70% ताजे जल को संचित रखता है।
  • महासागरीय धाराओं के परिसंचरण में योगदान: अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current) विश्व की सबसे शक्तिशाली महासागरीय धारा है। यह वैश्विक महासागरीय कन्वेयर बेल्ट का हिस्सा है, जो प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागरों को जोड़ती है तथा विश्व भर में जल, ऊष्मा और पोषक तत्वों का वितरण करती है।
  • जैव विविधता को बढ़ावा: यह विशिष्ट पारितंत्रों तथा क्रिल, पेंगुइन, सील एवं व्हेल जैसी प्रजातियों को आश्रय प्रदान करता है।
  • कार्बन और हीट सिंक: दक्षिणी महासागर वायुमंडल से अतिरिक्त ऊष्मा और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है।
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कार्बन और हीट सिंक (Carbon and Heat Sink)

यह एक ऐसा क्षेत्र है जो वायुमंडल से अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड और ऊष्मा को अवशोषित करता है। दक्षिणी महासागर इस भूमिका को निभाता है, जिससे पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

वैश्विक महासागरीय कन्वेयर बेल्ट (Global Ocean Conveyor Belt)

यह एक सतत, विशाल समुद्री जल प्रवाह प्रणाली है जो विभिन्न महासागरों के जल को जोड़ती है। यह महासागरीय धाराओं, तापमान और लवणता के अंतर से संचालित होती है और वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current)

यह विश्व की सबसे शक्तिशाली महासागरीय धारा है जो अंटार्कटिका के चारों ओर बहती है। यह वैश्विक महासागरीय कन्वेयर बेल्ट का हिस्सा है और जल, ऊष्मा व पोषक तत्वों के वैश्विक वितरण में योगदान करती है।

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