डिजिटल लत (Digital Addiction) को कंप्यूटर और ऑनलाइन कंटेंट के निरंतर, अत्यधिक या जुनूनी उपयोग के रूप में परिभाषित किया गया है, जो मनोवैज्ञानिक तनाव एवं कार्यक्षमता में गिरावट का कारण बनता है।
डिजिटल लत का प्रभाव
- मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट: सोशल मीडिया की लत कम आत्मसम्मान और साइबर बुलिंग के तनाव से जुड़ी हुई है। वहीं गेमिंग विकार आक्रामकता और सामाजिक अलगाव का कारण बनते हैं।
- संज्ञानात्मक और शैक्षणिक गिरावट: डिजिटल लत के कारण "नींद की कमी", व्याकुलता व एकाग्रता में कमी आती है। इससे शैक्षणिक प्रदर्शन और उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- सामाजिक पूंजी का क्षरण: अत्यधिक ऑनलाइन व्यस्तता से साथियों के साथ संपर्क व संवाद कमजोर होता है, सामुदायिक भागीदारी कम होती है और व्यावहारिक (ऑफलाइन) कौशल में गिरावट आती है।
- शारीरिक और वित्तीय नुकसान: उदाहरण के लिए- साइबर धोखाधड़ी व जुए जैसे जोखिम भरे ऑनलाइन व्यवहार से वित्तीय हानि होती है। साथ ही, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं।

आगे की राह
- स्कूल और शिक्षा: स्कूलों को एक "डिजिटल कल्याण पाठ्यक्रम” शुरू करना चाहिए। इसमें साइबर सुरक्षा और स्क्रीन-टाइम साक्षरता शामिल होनी चाहिए। साथ ही, ऑनलाइन शिक्षण उपकरणों पर निर्भरता कम करनी चाहिए।
- माता-पिता और परिवार की भूमिका: परिवारों को "डिजिटल डाइट" अपनाने, डिवाइस-मुक्त घंटे निर्धारित करने तथा पेरेंटल कंट्रोल टूल्स का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- डिजिटल डाइट बेहतर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए तकनीक के उपयोग को प्रबंधित करने का एक सचेत दृष्टिकोण है।
- प्लेटफॉर्म की जवाबदेही: तकनीकी प्लेटफॉर्म्स को आयु सत्यापन और उम्र के अनुरूप डिफॉल्ट सेटिंग्स को लागू करना चाहिए। उन्हें कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के लिए 'ऑटो-प्ले' और 'लक्षित विज्ञापन' जैसे फीचर्स पर रोक लगानी चाहिए।
- डेटा और मेट्रिक्स: मनोरंजन के लिए स्क्रीन टाइम, नींद की गुणवत्ता और साइबर बुलिंग के जोखिम को ट्रैक करने हेतु प्रमुख संकेतक विकसित किए जाने चाहिए।
- सामुदायिक समर्थन: कार्यस्थलों एवं महाविद्यालयों में ऑफलाइन यूथ हब और "तकनीक - मुक्त क्षेत्र" स्थापित करने चाहिए। इससे वास्तविक दुनिया के सामाजिक संबंधों को पुनर्स्थापित करने में मदद मिल सकती है।