कैग (CAG) की एक रिपोर्ट के अनुसार जम्मू और कश्मीर में झीलें तेजी से विलुप्त हो रही हैं | Current Affairs | Vision IAS

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  • एक रिपोर्ट से पता चलता है कि 1967 से अब तक 518 झीलें (74%) सिकुड़ गई हैं या गायब हो गई हैं, जिनमें से 315 पूरी तरह से लुप्त हो गई हैं, जिससे वुलर और डल झील जैसे महत्वपूर्ण जल निकायों पर असर पड़ा है।
  • प्रदूषण, अतिक्रमण, गाद जमाव, शासन व्यवस्था में खामियां और मानवजनित दबाव जैसे कारणों से पारिस्थितिक क्षति, आजीविका के लिए खतरा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होते हैं।
  • एनडब्ल्यूसीपी, एनएलसीपी, एनपीसीए, वेटलैंड्स रूल्स 2017, वाटर एक्ट 1974, ईपीए 1986 और रामसर कन्वेंशन जैसी पहलों का उद्देश्य झीलों और आर्द्रभूमि का संरक्षण करना है।

In Summary

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 1967 के बाद से 518 झीलें (कुल का 74%) या तो पूरी तरह से विलुप्त हो गई हैं या काफी छोटी हो गई हैं। इनमें से 315 झीलें पूरी तरह अपना अस्तित्व खो चुकी हैं

  • जम्मू-कश्मीर की निम्नलिखित प्रमुख झीलें खतरे का सामना कर रही हैं:
    • वुलर झील: भारत में ताजे जल की सबसे बड़ी झील।
    • डल झील: श्रीनगर की प्रसिद्ध झील, जो पर्यटन का केंद्र है।
    • मानसबल झील: कश्मीर की सबसे गहरी झील।
    • होकरसर झील, सुरिनसर झील और मानसर झील

झीलों के समक्ष संकट के कारण: 

  • प्रदूषण और सुपोषण (Eutrophication): अनुपचारित सीवेज (गंदा पानी), अपशिष्ट और खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक पानी में मिल जाते हैं। इससे पानी में शैवाल (algae) बहुत तेजी से बढ़ते हैं, जिससे ऑक्सीजन कम हो जाती है और जलीय जीवों को नुकसान होता है।
  • अतिक्रमण और भूमि उपयोग में परिवर्तन: तीव्र शहरीकरण और झीलों की जमीन पर निर्माण होने से जल क्षेत्र कम हो रहा है।
  • जलग्रहण क्षेत्र का क्षरण और तलछट जमना (Siltation): वनों की कटाई और मृदा अपरदन से झीलों में तलछट बढ़ जाती है, जिससे झील की गहराई और जलग्रहण क्षमता कम हो जाती है।
  • संस्थाओं और प्रशासन की उदासीनता: झीलों के संरक्षण की जिम्मेदारियां अलग-अलग विभागों में बंटी हुई हैं, इसके लिए कोई एक केंद्रीय प्राधिकरण नहीं है, और निगरानी व्यवस्था कमजोर है।
  • इंसानी गतिविधियों का दबाव: अवैध खनन, अनियंत्रित पर्यटन और कुछ सांस्कृतिक प्रथाएं जैसी गतिविधियां पारिस्थितिकी पर दबाव बढ़ा रही हैं।

सामाजिक-पारिस्थितिक प्रभाव

  • पारिस्थितिकी पर प्रभाव: जैव विविधता का ह्रास हो रहा है। जैसे वुलर झील में स्किज़ोथोरैक्स रिचर्डसोनी और बैंगाना डिप्लोस्टोमा जैसी देशज (नेटिव) मछलियां विलुप्त हो गई हैं।
  • आजीविका पर प्रभाव: झीलों के निम्नीकृत होने और प्रदूषण से मछुआरों की आजीविका प्रभावित होती है। कमल ककड़ी (लोटस स्टेम) और सिंघाड़ा (Water Chestnut) जैसे जलीय पौधों पर निर्भर लोगों को भी नुकसान होता है, और पर्यटन (जैसे हाउसबोट चलाने वाले) पर भी बुरा असर पड़ता है।
  • लोक स्वास्थ्य पर प्रभाव: मछलियों में भारी धातुओं (मैंगनीज, तांबा, सीसा) के जमा होने से इनका सेवन करने वालों के मस्तिष्क, यकृत और गुर्दे को नुकसान पहुँचने का जोखिम बढ़ जाता है।

भारत में झीलों के संरक्षण के लिए उठाए गए कदम

  • राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम (NWCP): वर्ष 1985-86 में प्रारंभ इस कार्यक्रम के तहत राज्यों को आर्द्रभूमियों (झीलों सहित) के निम्नीकृत होने से बचाने हेतु वित्तीय सहायता दी जाती है।
  • राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम (NLCP): वर्ष 2001 में प्रारंभ इस कार्यक्रम का उद्देश्य  शहरी और अर्ध-शहरी झीलों की पारिस्थितिकी और जल गुणवत्ता में सुधार करना है।
    • राष्ट्रीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण कार्यक्रम (NPCA): वर्ष 2013 में NLCP और NWCP (उपर्युक्त दोनों कार्यक्रमों) को मिलाकर बेहतर समन्वय के लिए यह कार्यक्रम प्रारंभ किया गया।
  • आर्द्रभूमि नियमावली, 2017: 
    • इसके नियम “विवेकपूर्ण उपयोग (Wise Use)” के सिद्धांत पर आधारित हैं। 
    • ये नियम आर्द्रभूमियों के संरक्षण और संधारणीय उपयोग के लिए विनियामक ढांचा प्रदान करते हैं। 
    • साथ ही, ये नियम आर्द्रभूमियों के प्रबंधन और निगरानी के लिए राज्य स्तर पर प्राधिकरण के गठन का प्रावधान करते हैं।
  • अन्य कानून:
    • जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974: यह जल निकायों में सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के प्रवाह को नियंत्रित करता है।
    • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: यह मुख्य कानून है, जिसके आधार पर आर्द्रभूमि नियमावली और पर्यावरण संरक्षण मानक बनाए गए हैं।
    • रामसर कन्वेंशन, 1971: इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों का संरक्षण है।
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देशज (Native)

किसी प्रजाति या जीव के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द जो स्वाभाविक रूप से किसी विशेष क्षेत्र या पारिस्थितिकी तंत्र में पाया जाता है, न कि किसी बाहरी स्रोत से लाया गया हो।

रामसर कन्वेंशन, 1971

यह आर्द्रभूमियों के संरक्षण और संधारणीय उपयोग से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय संधि है। यह उन आर्द्रभूमियों को सूचीबद्ध करता है जो अंतरराष्ट्रीय महत्व की हैं और उनके संरक्षण के लिए राष्ट्रीय कार्रवाई को प्रोत्साहित करती है।

राष्ट्रीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण कार्यक्रम (NPCA)

यह 2013 में शुरू किया गया एक एकीकृत कार्यक्रम है जिसने राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम (NWCP) और राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम (NLCP) को समाहित किया है। इसका उद्देश्य जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में बेहतर समन्वय स्थापित करना है।

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