उच्चतम न्यायालय ने ‘शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम’ के तहत छात्रों के अनिवार्य प्रवेश (एडमिशन) संबंधी प्रावधान को उचित ठहराया | Current Affairs | Vision IAS

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  • सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि पड़ोस के स्कूलों को आरटीई अधिनियम, 2009 के तहत पात्र छात्रों को प्रवेश देना होगा, और 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए अनुच्छेद 21ए को लागू करना होगा।
  • आरटीई अधिनियम के तहत निजी स्कूलों में ईडब्ल्यूएस छात्रों के लिए 25% आरक्षण अनिवार्य है, हालांकि इसके कार्यान्वयन में स्कूलों के प्रतिरोध और छिपी हुई लागत जैसी चुनौतियां सामने आती हैं।
  • यह निर्णय वास्तविक समानता, सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देता है और अनुच्छेद 51ए(के) और अनुच्छेद 45 के अनुरूप कॉमन स्कूल सिस्टम को सुदृढ़ करता है।

In Summary

उच्चतम न्यायालय ने 'लखनऊ पब्लिक स्कूल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य' मामले में यह निर्णय दिया कि नेबरहुड स्कूल RTE अधिनियम, 2009 के तहत पात्र छात्रों को तत्काल प्रवेश (एडमिशन) देने के लिए बाध्य हैं।

निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के बारे में

  • संवैधानिक आधार: इसे संविधान के अनुच्छेद 21A को प्रभावी बनाने के लिए लागू किया गया।
  • अनुच्छेद 21A: इसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान में जोड़ा गया। यह अनुच्छेद सभी बालकों (6-14 वर्ष) को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है।
  • प्रमुख प्रावधान: RTE अधिनियम प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक नेबरहुड स्कूल में प्रत्येक बच्चे (6-14 वर्ष) को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।
    • स्कूल स्थापित करना, तथा अवसंरचना विकास, शिक्षक और सीखने की सुविधाएं प्रदान करना समुचित सरकार और स्थानीय प्राधिकारों (अथॉरिटी) का कर्तव्य है।
  • 25% आरक्षण का प्रावधान: समावेशी और समतापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए 25% आरक्षण अनिवार्य है।
    • इसके बदले स्कूलों को प्रति छात्र व्यय की प्रतिपूर्ति राज्य द्वारा की जाती है।

कार्यान्वयन में चुनौतियां

  • स्कूल-स्तर पर विरोध: निजी स्कूल ईडब्ल्यूएस (EWS) छात्रों को प्रवेश देने का विरोध करते रहते हैं।
  • छिपी हुई लागत का बोझ: यूनिफॉर्म, किताबें और अन्य सामग्री का खर्च गरीब परिवारों को उठाना पड़ता है।
  • अन्य मुद्दे: 
    • निगरानी व्यवस्था कमजोर है, 
    • जवाबदेही सीमित है, 
    • राज्यों के बीच क्रियान्वयन और परिणामों में अंतर देखने को मिलता है, 
    • शिकायत निवारण तंत्र पर्याप्त नहीं है, और 
    • अंतिम स्तर (last mile) तक सेवाएँ पहुँचाने में भी कठिनाइयाँ आती हैं।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय का महत्व

  • समानता: यह निर्णय बचपन से ही वास्तविक समानता और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देता है।
  • बंधुत्व: यह निर्णय एक मुख्य संवैधानिक सिद्धांत के रूप में ‘बंधुत्व’ को प्रवर्तनीय और व्यावहारिक अर्थ प्रदान करता है।
  • कोठारी आयोग: यह निर्णय कोठारी आयोग (1964-66) द्वारा परिकल्पित ‘कॉमन स्कूल सिस्टम’ के सपने को साकार करता है।

शिक्षा के अधिकार से संबंधित अन्य संवैधानिक प्रावधान:

  • मूल कर्तव्य: अनुच्छेद 51A(k) माता-पिता का यह कर्तव्य निर्धारित करता है कि वे 6-14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करें
  • राज्य की नीति के निदेशक तत्व (DPSP): अनुच्छेद 45 राज्य को 6 वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का उपबंध करने का निर्देश देता है।
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राज्य की नीति के निदेशक तत्व (DPSP)

संविधान का भाग IV, जिसमें वे सिद्धांत शामिल हैं जिनका पालन राज्य को कानून बनाते समय करना चाहिए। अनुच्छेद 45 राज्य को 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) प्रदान करने का निर्देश देता है।

अनुच्छेद 51A(k)

यह भारतीय संविधान का मूल कर्तव्य है, जो माता-पिता या अभिभावकों का यह कर्तव्य निर्धारित करता है कि वे अपने 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे को शिक्षा के अवसर प्रदान करें।

कॉमन स्कूल सिस्टम

कोठारी आयोग (1964-66) द्वारा प्रस्तावित 'कॉमन स्कूल सिस्टम' एक ऐसी प्रणाली है जिसका उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के बच्चों को एक ही प्रकार की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है, जिससे सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को कम किया जा सके।

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