इस फोरम में रेखांकित किया गया कि कैसे भू-स्थानिक प्रणालियां (Geospatial Systems) 'फ्यूचर रेडी गवर्नेंस' की कुंजी बन गई हैं।
- इसमें UN-GGIM (वैश्विक भू-स्थानिक सूचना प्रबंधन पर विशेषज्ञों की संयुक्त राष्ट्र समिति) के तहत वैश्विक ढांचे के महत्व पर भी जोर दिया गया।
- UN-GGIM संस्था भू-स्थानिक नीति निर्धारण के लिए शीर्ष निकाय के रूप में कार्य करती है। यह संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (UN-ECOSOC) के तहत विशेषज्ञों की एक समिति के रूप में संचालित होती है।
भू-स्थानिक प्रणालियों के बारे में
- ये ऐसे उपकरण हैं जो स्थान/अवस्थिति से जुड़े आंकड़ों (Spatial Data) को एकत्र करने, विश्लेषण करने और प्रदर्शित करने के लिए बनाए गए हैं।
- इनमें सैटेलाइट इमेजरी और रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS), ड्रोन और LiDAR जैसी विभिन्न भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियों का समावेश होता है।
शासन-प्रशासन में भू-स्थानिक प्रणालियों की भूमिका
- डेटा-आधारित शहरी नियोजन में: 3D शहर मॉडल की मदद से विकास परियोजनाओं को पहले से देखकर समझा जा सकता है। साथ ही, जलापूर्ति की रियल-टाइम निगरानी, संपत्तियों का प्रबंधन और बेहतर योजना बनाना आसान हो जाता है।
- अवसंरचना विकास में: उदाहरण के लिए, ड्रोन आधारित भू-स्थानिक सर्वेक्षण से तमिलनाडु के त्रिची हवाई अड्डे का आधुनिकीकरण किया गया।
- संपत्तियों की निगरानी में: उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के तहत सृजित परिसंपत्तियों को भुवन (BHUVAN) प्लेटफॉर्म का उपयोग करके जियोटैग किया जाता है।
- आपदा प्रबंधन में: भू-स्थानिक डेटा की मदद से बाढ़ और चक्रवात जैसी आपदाओं का पहले से अनुमान लगाया जा सकता है। ड्रोन-आधारित बाढ़ जलभराव (flood inundation) मॉडलिंग से नुकसान का सही आकलन करना आसान हो जाता है।
- आंतरिक सुरक्षा में: सैटेलाइट इमेजरी की मदद से सीमाओं की सटीक मैपिंग की जा सकती है। GIS तकनीक के जरिए अपराधियों के ठिकानों का पता लगाने में सहायता मिलती है।
भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी की दिशा में प्रमुख सरकारी पहलें
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