मैकिन्से ने जनसांख्यिकीय परिवर्तन और जनसंख्या में कमी पर एक रिपोर्ट जारी की | Current Affairs | Vision IAS
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मैकिन्से की रिपोर्ट 'निर्भरता और जनसंख्या में कमी? एक नई जनसांख्यिकी वास्तविकता के परिणामों से सामना' शीर्षक से जारी की गई है। 

  • इस रिपोर्ट में जनसांख्यिकी बदलाव की पहली लहर (First wave) और जनसांख्यिकी बदलाव की बाद की लहर (Later wave) की गतिशीलता का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। 
    • जनसांख्यिकी बदलाव की पहली लहर विकसित देशों में देखी जा रही है, जबकि बाद की लहर विकासशील देशों में देखी जाएगी।

जनसांख्यिकी बदलाव (Demographic Transition) पर एक नजर

  • जनसंख्या में कमी (Depopulation): विश्व की दो-तिहाई आबादी ऐसे देशों में रहती है, जहां प्रजनन दर प्रतिस्थापन दर (Replacement rate) से कम है। प्रति परिवार औसतन 2.1 बच्चों को प्रजनन की प्रतिस्थापन दर माना जाता है।  
    • आबादी समूह में वृद्ध लोगों की संख्या बढ़ने और युवाओं की संख्या घटने के कारण आयु संरचना पिरामिड से ओबिलिस्क (संकरा स्तंभ) आकार में बदल रही है।
  • संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार 2100 तक, कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में जनसंख्या 20%-50% तक कम हो जाएगी। 
  • समर्थन अनुपात (Support Ratios) में गिरावट: रिपोर्ट के अनुसार ‘समर्थन अनुपात में गिरावट आ रही है। इसके वर्तमान में 6.5 से कम होकर 2050 तक 3.9 हो जाने का अनुमान है।
  • समर्थन अनुपात से तात्पर्य 65 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या की तुलना में 15-64 वर्ष (कामकाजी आयु) आयु वर्ग के लोगों की संख्या के अनुपात से है।
  • विकसित अर्थव्यवस्थाओं और चीन में, वरिष्ठ नागरिकों द्वारा कुल उपभोग एवं उनकी आय के बीच का अंतर 1.5 गुना बढ़ने का अनुमान है। इस वजह से इन देशों में श्रम आय का 50% सेवानिवृत्ति योजनाओं के लिए आवंटित करना पड़ सकता है।  
  • भारत का घटता जनसांख्यिकीय लाभांश
    • भारत के समक्ष जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग करने के लिए 33 वर्ष ही बचे हैं। इसका अर्थ है कि 2050 तक ही वह इसका लाभ उठा सकता है, क्योंकि इसके बाद भारत विकसित देशों के ‘समर्थन अनुपात’ स्तर तक पहुंच जाएगा।
    • जनसांख्यिकीय लाभांश ने भारत की प्रति व्यक्ति सकल-घरेलू उत्पाद संवृद्धि में प्रति वर्ष 0.7 प्रतिशत अंक जोड़े हैं। हालांकि, 2050 तक यह योगदान घटकर प्रति वर्ष केवल 0.2% अंक रह जाएगा। 
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