भारत का अद्यतित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (India’s Updated Nationally Determined Contribution: NDC) | Current Affairs | Vision IAS

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भारत का अद्यतित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (India’s Updated Nationally Determined Contribution: NDC)

30 Apr 2026
1 min

In Summary

  • भारत ने 2031-35 के लिए अपने राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों (एनडीसी) को अपडेट किया है, जिसमें उत्सर्जन तीव्रता में कमी, गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता और कार्बन सिंक के लक्ष्यों को बढ़ाया गया है।
  • इन उपायों में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना के माध्यम से औद्योगिक उत्सर्जन में कमी लाना और जलवायु अनुकूलन तथा कार्बन सिंक को बढ़ाना शामिल है।
  • महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने में वित्तीय बाधाएं, ग्रिड एकीकरण, कोयले पर निर्भरता और भूमि/पर्यावरणीय बाधाएं जैसी चुनौतियां शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

भारत ने हाल ही में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) के तहत 2031–35 अवधि के लिए अपने अद्यतित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को जारी किया है। यह कदम पेरिस समझौते के तहत निर्धारित प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) के बारे में

  • ये पेरिस समझौते के तहत प्रत्येक देश द्वारा स्वेच्छा से बनाई गई जलवायु कार्य-योजनाएं हैं। इनका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन को बढ़ावा देना है।  
  • NDCs प्रत्येक पांच वर्ष में UNFCCC-सचिवालय को प्रस्तुत किए जाते हैं।
    • भारत ने अपना पहला NDC वर्ष 2015 में प्रस्तुत किया था और इसे 2022 में अद्यतन किया।
  • ये लक्ष्य समय के साथ अधिक महत्वाकांक्षी बनाए जाते हैं। ये भारत के 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने के दीर्घकालिक लक्ष्य तथा 2047 तक जलवायु-समुत्थानशील (क्लाइमेट रेजिलिएंट) 'विकसित भारत' बनाने के दृष्टिकोण के अनुरूप हैं।

भारत की NDC प्रतिबद्धताओं के बारे में 

प्रतिबद्धता के क्षेत्र

 

2030 के लिए प्रारंभिक NDC लक्ष्य

2030 के लिए अद्यतित NDC लक्ष्य 

नए NDC लक्ष्य 2035

वर्तमान स्थिति/प्रगति 

GDP के सापेक्ष उत्सर्जन तीव्रता में कमी (2005 स्तर से)

33-35%

45%

47%

2020 तक 36% कमी प्राप्त की 

कुल विद्युत स्थापित क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी

40%

50%

60%

फरवरी 2026 तक 52.57% की हिस्सेदारी की प्राप्ति

वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से अतिरिक्त कार्बन सिंक (2005 के स्तर से)

2.5–3 अरब टन CO₂ समतुल्य

2.5–3 अरब टन CO₂ समतुल्य

3.5–4 अरब टन CO₂ समतुल्य

2021 तक 2.29 अरब टन समतुल्य

NDC के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पहलें

  • स्वच्छ ऊर्जा उपयोग को बढ़ावा देना:  राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन; पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना; पीएम-कुसुम (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान) योजना; उच्च दक्षता वाले सोलर पीवी मॉड्यूल के लिए उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) जैसी योजनाओं के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी बढ़ाना: अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA); आपदा-रोधी अवसंरचना के लिए गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure: CDRI); ग्लोबल बायो-फ्यूल एलायंस (GBA) और उद्योग संक्रमण के लिए नेतृत्व समूह (Leadership Group for Industry Transitio: Lead-IT) जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक सहयोग बढ़ाया जा रहा है।
  • औद्योगिक उत्सर्जन में कमी: ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के तहत 2023 में अधिसूचित कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) ने भारतीय कार्बन बाजार (ICM) की नींव रखी है।
    • इसके तहत ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य नियम बनाए गए हैं, जो अधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रकों के लिए उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य निर्धारित करते हैं।
    • इन बाध्यकारी क्षेत्रकों में पेट्रोलियम रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल, वस्त्र, एल्युमिनियम, सीमेंट, क्लोर-एल्कली और कागज उद्योग शामिल हैं।
  • जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देना: जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) और जलवायु परिवर्तन पर राज्य स्तरीय योजनाओं (SAPCC) के माध्यम से अनुकूलन ढांचा लागू किया जा रहा है।
    • इसके अंतर्गत संधारणीय कृषि मिशन, जल जीवन मिशन और "मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटेट्स एंड टैगेबल इनकम्स" (मिष्ठी/MISHTI) योजना जैसी पहलें शामिल हैं।
  • कार्बन सिंक का विस्तार: हरित भारत मिशन, नगर वन योजना, प्रतिपूर्ति वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority: CAMPA) और वित्त आयोग के मानदंडों (जो राज्यों को उनके वन आवरण के आधार पर केंद्रीय निधियों के हस्तांतरण को जोड़ता है) के माध्यम से वनों का विस्तार और संरक्षण किया जा रहा है।
  • ऊर्जा दक्षता: उजाला (सभी के लिए किफायती LED द्वारा उन्नत ज्योति - UJALA) योजना, राष्ट्रीय स्ट्रीट लाइटिंग कार्यक्रम (SLNP), BEE की स्टार लेबलिंग योजना, व्यावसायिक भवनों के लिए ऊर्जा संरक्षण सतत भवन कोड (ECSBC) और आवासीय भवनों के लिए इको निवास संहिता जैसी पहलों के माध्यम से ऊर्जा बचत को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • अन्य उपाय: कार्बन प्रग्रहण, उपयोग और भंडारण (CCUS) तथा परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देना; मिशन लाइफ (LiFE) तथा PAT योजना जैसे अन्य कदम भी उठाए जा रहे हैं।

भारत के लिए NDCs प्राप्त करने में चुनौतियां 

  • वित्तीय और तकनीकी बाधाएं: NDC लक्ष्यों को प्राप्त करने में कम लागत पर अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्तपोषण की कमी और विकसित देशों से अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों का बिना बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) लागत के प्राप्त न होना बड़ी बाधाएं हैं।
    • नीति आयोग की भारत ऊर्जा सुरक्षा परिदृश्य (IESS) 2047 रिपोर्ट के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के लिए 2047 तक प्रत्येक वर्ष लगभग 250 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश आवश्यक है।
  • स्थापित क्षमता और वास्तविक उत्पादन में अंतर: भारत की कुल स्थापित विद्युत क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन का हिस्सा 50% से अधिक है, लेकिन वास्तविक विद्युत उत्पादन में इनका योगदान 30% से भी कम है।
  • भंडारण और ग्रिड से जुड़ी चुनौतियां: नवीकरणीय ऊर्जा को राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ने में बड़ी बैटरी भंडारण की उच्च लागत और लिथियम जैसे आयातित खनिजों पर निर्भरता बाधा बनती हैं।
  • कोयले पर अधिक निर्भरता: भारत की लगभग 55% विद्युत अभी भी कोयले से उत्पादित होती है, जिससे कोयला-पर निर्भर क्षेत्रों के लिए स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में न्यायसंगत परिवर्तन आवश्यक हो जाता है।
  • भूमि और पर्यावरण संबंधी चुनौतियां: स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि की कमी, तीव्र शहरीकरण और बड़े स्तर पर वनीकरण को लंबे समय तक बनाए रखने की कठिनाइयों के कारण कार्बन सिंक बढ़ाने के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है।
    • उदाहरण के लिए, सौर ऊर्जा परियोजनाओं को परमाणु ऊर्जा की तुलना में लगभग 300 गुना अधिक भूमि की आवश्यकता होती है, जबकि बायोमास को 8000 गुना से भी अधिक भूमि चाहिए।
  • पर्यावरणीय चिंताएं: उदाहरण के लिए, सौर बैटरियों के लिए आवश्यक सामग्री के उत्पादन में अधिक जल की आवश्यकता होती है और इससे कार्बन उत्सर्जन भी होता है।

आगे की राह

  • जलवायु वित्त-पोषण जुटाना: "समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व" (Common but Differentiated Responsibilities: CBDR-RC) सिद्धांत के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्त-पोषण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की मांग की जाए। साथ ही ग्रीन बॉण्ड, ब्लेंडेड फाइनेंस जैसे वित्तीय श्रोताओं का प्रभावी उपयोग किया जाए।
  • नवीकरणीय ऊर्जा तंत्र को सुदृढ़ करना: ग्रिड अवसंरचना, ऊर्जा भंडारण तकनीक और हरित हाइड्रोजन के विकास में निवेश बढ़ाया जाए।
  • स्थापित क्षमता और वास्तविक उत्पादन के अंतर को कम करना: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण को जोड़कर हाइब्रिड सिस्टम को बढ़ावा दिया जाए, ताकि नवीकरणीय ऊर्जा की दक्षता बढ़ाई जा सके और इनसे निरंतर आपूर्ति हो सके।
  • कार्बन सिंक बढ़ाना: कृषि वानिकी, शहरी वानिकी और स्थानीय समुदायों द्वारा संचालित संरक्षण परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाए।

निष्कर्ष

भारत का NDC 2031–35 सीमित संसाधनों के बावजूद विश्व को राह दिखाने का उदाहरण प्रस्तुत करता है। भारत ने समय से पूर्व कुल स्थापित विद्युत क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों के 52% योगदान का लक्ष्य प्राप्त कर उल्लेखनीय प्रगति की है और साथ ही जलवायु न्याय का समर्थन किया है। नवीकरणीय ऊर्जा, कार्बन सिंक और अनुकूलन में निवेश के माध्यम से 2047 तक एक समृद्ध और जलवायु-समुत्थानशील 'विकसित भारत' का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

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