सुर्ख़ियों में क्यों?
इसरो (ISRO) के एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि उत्तराखंड में 2025 में धराली गांव में आई आकस्मिक बाढ़ का कारण श्रीकंठ हिमनद के नीवेशन क्षेत्र में एक खुले हिम-खंड का अचानक ढहना था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह बाढ़ बादल फटने या हिमनदीय झील के प्रस्फोट जनित बाढ़ (Glacial Lake Outburst Flood: GLOF) की वजह से नहीं आई थी।
अन्य संबंधित तथ्य
- "हिमखंड ढहने और हिमालयी बाढ़ से प्रारंभिक चेतावनी के निहितार्थ: विहिमनदन के कारण उभरे क्रायो-हाइड्रोलॉजिकल खतरे" शीर्षक वाले अध्ययन से पता चलता है कि धराली गांव के ऊपर हिमनद पर एक हिमखंड का ढहना हिमालय में विहिमनदन (Deglaciation) से जुड़ा हुआ है।
- ये निष्कर्ष हिमालय में पहचाने गए हिमनद-जनित खतरों के दायरे का विस्तार करते हैं और खुले हिमखंडों को हिमनद पिघलने से उत्पन्न होने वाले एक अल्प-मान्यता प्राप्त जोखिम के रूप में चिह्नित करते हैं।
- हिम-अपरदन या निवेशन (Nivation): यह बर्फ के नीचे और आसपास की भूमि का क्रमिक अपरदन है, जो मुख्यतः 'फ्रीज-थॉ' (बार-बार जमने और पिघलने की प्रक्रिया) चक्रों के कारण होता है।
हिमनदों के पिघलने में सहायक कारक
- वैश्विक तापन और जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के कारण क्षेत्रीय और वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि हिमनदों के निवर्तन, पतले होने और द्रव्यमान हानि का मुख्य कारण है।
- ब्लैक कार्बन और सतही मलबा: बर्फ की सतह पर हिमनद के भीतर या उसके ऊपर मलबे और ब्लैक कार्बन का जमाव ऊष्मा को अवशोषित करता है। साथ ही, यह हिमनद के पिघलने की गति को भी तीव्र करता है।
- ऊंचाई-आधारित तापन: उच्च तुंगता वाले क्षेत्र (4,500-6,000 मीटर) निचले क्षेत्रों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहे हैं, जिससे अधिकांश हिमनद क्षेत्र गहन एवं तीव्र तापमान वृद्धि की चपेट में आ रहे हैं।
- ऊष्मा रोधी हिम आवरण की हानि: मौसमी हिम और 'फिर्न' (firn) की मात्रा में कमी प्राकृतिक ऊष्मा रोधन को कमजोर करती है। इसकी वजह से नीचे की बर्फ विखंडन और तेजी से पिघलने के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है।
- अनियमित मौसम प्रणालियां: पश्चिमी विक्षोभ में तीव्र अनियमितता जैसे बदलते जलवायु पैटर्न सर्दियों में होने वाले हिमपात को कम कर रहे हैं और वर्षण की मौसमी स्थिति को बदल रहे हैं।
- खड़ी स्थलाकृति: तीव्र अनुदैर्ध्य ढाल (35°-40° से अधिक) और संकीर्ण घाटियों का संकुचन उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती हैं। ये ऊपरी प्रवाह क्षेत्रों में होने वाले मामूली हिमस्खलन को उच्च-वेग, अत्यधिक विनाशकारी मलबे के तीव्र प्रवाह में परिवर्तित कर देते हैं।
हिमालय में विहिमनदन (Deglaciation) के प्रभाव
- हिमनदीय झील प्रस्फोट जनित बाढ़ (GLOFs): निवर्तित हिमनद अपने पीछे पिघला हुआ जल छोड़ जाते हैं जो अस्थिर हिमोढ़ (मलबे और बर्फ) द्वारा अवरुद्ध झीलों का निर्माण करते हैं।
- हिमस्खलन, भूकंप या शैल पतन के कारण ये बांध टूट सकते हैं, जिससे लाखों घन मीटर जल और मलबा विनाशकारी रूप से निर्मुक्त होता है।
- श्रृंखलाबद्ध आपदाएं: विहिमनदन से तापीय और जल विज्ञान प्रणालियां अस्थिर हो जाती हैं। इससे स्थायी तुषार-भूमियों का पिघलना, भूस्खलन, मलबे का प्रवाह और चट्टान-हिमस्खलन जैसे परस्पर जुड़े खतरे उत्पन्न होते हैं।
- उदाहरण के लिए, चमोली 2021, सिक्किम 2023, धराली 2025।
ICIMOD रिपोर्ट (हिंदूकुश हिमालय की हिमनद का पिघलना) {ICIMOD Report (Hindu Kush Himalayan Glacier Melting)}
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- जल असुरक्षा: सिकुड़ते हिमनद पिघले हुए जल की निरंतर आपूर्ति को बाधित करते हैं, जिससे नदी के प्रवाह में कमी, जल विज्ञान में परिवर्तन और दीर्घकालिक जल संकट पैदा होता है। इसकी वजह से, हिमालयी नदियों पर निर्भर लाखों लोग प्रभावित होते हैं।
- कृषि और पारिस्थितिकी व्यवधान: कोष्ण सर्दियां फसलों (जैसे सेब और चेरी) की अत्यावश्यक शीतलन आवश्यकताओं को पूरा नहीं होने दे रही हैं। इसके परिणामस्वरूप, फसलों की कम पैदावार, कीटों का समय पूर्व प्रकोप और स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र में व्यवधान उत्पन्न हो रहा है।
- सामाजिक-आर्थिक और अवसंरचनात्मक क्षति: आकस्मिक बाढ़ और मलबे का प्रवाह बस्तियों, कृषि भूमि, सड़कों, पुलों, पर्यटन और जलविद्युत अवसंरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचाते हैं।
आपदा प्रबंधन
- संस्थागत ढांचा और सरकारी पहल
- नोडल एजेंसियां: जल शक्ति मंत्रालय (MoJS) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) हिमनद अध्ययन और GLOF संबंधी खतरों के प्रबंधन के लिए नोडल निकायों के रूप में कार्य करते हैं।
- राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम (NGRMP): यह एक समर्पित NDMA पहल है (चरण-1: 2023-2026), जो उच्च जोखिम वाले राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों अर्थात हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लक्षित करती है।
- आपदा संबंधी तत्परता और न्यूनीकरण रणनीतियां
- उपग्रह-आधारित पूर्व चेतावनी: मल्टी-टेम्पोरल अर्थ ऑब्जर्वेशन इमेजरी (जैसे सेंटिनल-2) का उपयोग करके खुले हिम-खंडों का पता लगाने को परिचालनात्मक पूर्व चेतावनी प्रणालियों में एकीकृत किया जाना चाहिए।
- बहु-जोखिम आकलन: GIS-आधारित बहु-खतरा जोखिम मानचित्र तैयार करने के लिए भेद्यता मूल्यांकन (जनसंख्या, अवसंरचना, जल विज्ञान) के साथ आपदा मॉडलों को एकीकृत किया जा सकता है।
- समुदाय-केंद्रित निगरानी: स्थानीय समुदायों, पोर्टरों और चरवाहों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इससे उन्हें मोबाइल-आधारित 'नागरिक विज्ञान प्लेटफार्मों' का उपयोग करके नदी के जल की आविलता (गंदलापन) या दरारों जैसे पूर्व चेतावनी संकेतों की रिपोर्ट करने में मदद मिल सकेगी।
- जैव-पुनर्स्थापना (Bio-Restoration): हिम के पिघलने को कम करने के लिए काई/शैवाल के विकास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। साथ ही, हिमोढ़ को स्थिर करने एवं अपरदन को रोकने के लिए वनस्पति लगाए जाने चाहिए।
- संरचनात्मक न्यूनीकरण उपाय (जियो-इंजीनियरिंग): नियंत्रित जल निकासी, सायफनिंग या टनलिंग के माध्यम से हिमनद झील के जोखिमों को कम किया जाना चाहिए।
- सुदृढ़ जल संभर प्रबंधन: भूजल पुनर्भरण को बढ़ाने के लिए चेक डैम, परकोलेशन टैंक और कृषि तालाबों के निर्माण हेतु प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY-WDC) जैसी पहलों का विस्तार किया जाना चाहिए।
- एकीकृत तत्परता नीतियां: अल्पकालिक आकस्मिक योजनाओं और दीर्घकालिक जलवायु रणनीतियों, दोनों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
"तृतीय ध्रुव" (Third Pole) का तीव्र निवर्तन कोई दूर की चेतावनी नहीं बल्कि एक तात्कालिक वास्तविकता है जो अरबों लोगों की जल, भोजन और ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल रही है। इसके समाधान के लिए सीमा-पारीय सहयोग, विकास में आपदा जोखिम न्यूनीकरण को मुख्यधारा में लाने और स्थानीय संस्थानों को सशक्त बनाने की आवश्यकता है। भारत को बढ़ते क्रायो-हाइड्रोलॉजिकल जोखिमों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए उन्नत भू-स्थानिक निगरानी को समुदाय-आधारित अनुकूलन रणनीतियों के साथ एकीकृत करना चाहिए।