सरकार ने MSME की सहायता के लिए म्यूच्यूअल क्रेडिट गारंटी योजना में संशोधन किया है।
MSMEs के लिए म्यूच्यूअल क्रेडिट गारंटी योजना (2025) के बारे में
- यह केंद्रीय क्षेत्रक योजना है।
- उद्देश्य: यह मशीनरी या उपकरण की खरीद के लिए MSMEs को ₹100 करोड़ तक के ऋण प्रदान करती है। यह नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी लिमिटेड (NCGTC) के माध्यम से सदस्य ऋण संस्थानों (MLIs) को 60% क्रेडिट गारंटी उपलब्ध कराती है।
प्रमुख संशोधन
- पात्रता का विस्तार: सेवा क्षेत्रक के MSMEs अब इस योजना के पात्र हैं।
- उपकरण लागत सीमा: इसे कुल परियोजना लागत के पिछले 75% की आवश्यकता से घटाकर अब 60% कर दिया गया है।
- गारंटी अवधि: क्रेडिट गारंटी कवर 10 वर्षों के बाद समाप्त हो जाएगा।
- इस योजना में निर्यातकों के लिए विशेष प्रावधान शामिल किए गए हैं। उदाहरण के लिए, ₹20 करोड़ की गारंटीकृत ऋण राशि आदि।
भारत सरकार ने ₹20,000 करोड़ की निधि के साथ CGSMFI-2.0 शुरू की है।
CGSMFI-2.0 के बारे में
- उद्देश्य: पात्र सदस्य ऋणदाता संस्थानों (MLIs) के ऋण को गारंटी कवरेज प्रदान करना, ताकि वे गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी सूक्ष्म-वित्त संस्था (NBFC-MFI) और सूक्ष्म-वित्त संस्थाओं (MFIs) को ऋण दे सकें। ये संस्थाएं आगे पुराने या नए ग्राहकों को ‘लघु राशि’ का ऋण प्रदान करेंगी।

- NBFC-MFI जमा स्वीकार नहीं करने वाली NBFC होती हैं, जिनकी कुल परिसंपत्तियों का कम से कम 75% “सूक्ष्म वित्त ऋण” में निवेशित होता है।
- सूक्ष्म वित्त ऋण वास्तव में ऐसे परिवारों को बिना कुछ गिरवी रखे (कोलेटरल-फ्री) ऋण देना है जिनकी वार्षिक आय 3,00,000 रुपये तक होती है।
- प्रबंधन एवं संचालन: इसका संचालन नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (NCGTC) द्वारा किया जाता है। यह कंपनी केंद्रीय वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के पूर्ण स्वामित्व में है।
- योजना अवधि: जून 2026 तक या ₹20,000 करोड़ की गारंटी जारी होने तक।
सूक्ष्म-वित्त (माइक्रोफाइनेंस) के बारे में
- इसका आशय लघु स्तर की वित्तीय सेवाओं (जैसे-ऋण, बचत और बीमा) से हैं, जो उन व्यक्तियों और लघु व्यवसायों को प्रदान की जाती हैं जिनकी पारंपरिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच नहीं होती।

- भारत में सूक्ष्म-वित्त का महत्व
- वित्तीय समावेशन एवं निर्धनता उन्मूलन: ये संस्थाएं उन निम्न-आय वर्गों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ती हैं जिन तक पारंपरिक बैंक नहीं पहुंच पाते हैं।
- MSMEs और उद्यमिता को सहायता: ये संस्थाएं गिरवी रखने की अनिवार्यता के बिना आवश्यकता के अनुरूप ऋण प्रदान करती हैं।
- महिला सशक्तिकरण: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार सूक्ष्म-वित्त संस्थाओं से ऋण वालों में 95% महिलाएं हैं।
Article Sources
1 sourceसांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने वार्षिक एवं त्रैमासिक राष्ट्रीय लेखा अनुमानों (GDP सहित) की नई श्रृंखला जारी की है।
नई GDP श्रृंखला में प्रमुख बदलाव
- नया आधार वर्ष: अब आधार वर्ष 2022-23 है। इससे पहले 2011-12 था।
- 2019-2021 के कोविड-19 व्यवधानों के बाद वित्त वर्ष 2022-23 को सबसे हालिया "सामान्य" अवधि के रूप में चुना गया है।
- नवीन डेटा स्रोत: अब इसमें वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह, ई-वाहन पोर्टल और सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) सहित उच्च-आवृत्ति एवं प्रशासनिक डेटा को एकीकृत किया गया है।
- परिष्कृत अपस्फीति तकनीक (Deflation Techniques): विनिर्माण और कृषि में अब 'दोहरी अपस्फीति' (निर्गत मूल्य के साथ-साथ आगत मूल्य पर भी छूट देना) लागू की गई है, जबकि 'एकल अपस्फीति' का उपयोग बंद कर दिया गया है।
- आपूर्ति और उपयोग तालिका (SUT) का एकीकरण: उत्पादन और व्यय-आधारित जीडीपी अनुमानों के बीच विसंगतियों को कम करने के लिए SUT फ्रेमवर्क को राष्ट्रीय लेखाओं के साथ जोड़ा गया है।
- निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) का बेहतर अनुमान: उत्पादन, प्रशासनिक डेटा और जिंस प्रवाह दृष्टिकोण से प्रत्यक्ष अनुमान को PFCE में एकीकृत करके इसे सुधारा गया है।
- सामान्य सरकारी समायोजन: सरकारी अनुमानों में अब पुरानी पेंशन योजना (OPS) के साथ-साथ राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के कार्यान्वयन को भी शामिल किया गया है।

- अन्य समावेशन:
- संशोधित जीडीपी श्रृंखला में डिजिटल, प्लेटफॉर्म और गिग इकोनॉमी गतिविधियों को शामिल करते हुए नियोजित किए गए घरेलू कामगारों को भी समेकित किया गया है।
- घरेलू और अनौपचारिक क्षेत्रकों को बेहतर रीति से मापने के लिए अनिगमित क्षेत्रक उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE) और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) का उपयोग किया जाएगा।
Article Sources
1 sourceकेंद्र सरकार ने ‘लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT)’ ढांचा के तहत 2026-2031 के लिए मुद्रास्फीति लक्ष्य अधिसूचित किया
- वर्ष 2016 में, भारत में ‘लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ( Flexible Inflation Targeting: FIT)’ के कार्यान्वयन के लिए वैधानिक आधार प्रदान करने हेतु भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन किया गया था।
- FIT फ्रेमवर्क की सिफारिश डॉ. उर्जित पटेल की अध्यक्षता वाली एक विशेषज्ञ समिति द्वारा की गई थी।
FIT फ्रेमवर्क के बारे में
- भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZA के अनुसार, केंद्र सरकार RBI के परामर्श से प्रत्येक पांच वर्ष में एक बार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के संदर्भ में मुद्रास्फीति का लक्ष्य निर्धारित करेगी।
- लक्ष्य: केंद्र सरकार ने 2016-2021 की अवधि के लिए 4% का मुद्रास्फीति लक्ष्य अधिसूचित किया था। इसमें 6% की ऊपरी सह्य सीमा (upper tolerance band) और 2% की निचली सह्य सीमा (lower tolerance band) निर्धारित की गई थी। अर्थात, मुद्रास्फीति को 2% से 6% के बीच नियंत्रित रखना था।
- इस लक्ष्य को 2021-2026 के लिए बरकरार रखा गया था और अब इसे 2026-2031 के लिए भी जारी रखा गया है।
- लक्ष्य प्राप्ति के लिए MPC का गठन : आरबीआई अधिनियम मुद्रास्फीति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक नीतिगत दरें निर्धारित करने हेतु एक मौद्रिक नीति समिति (MPC) के गठन का प्रावधान करता है।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) की संरचना: यह छह सदस्यीय निकाय है जिसमें शामिल हैं:
- आरबीआई के गवर्नर (पदेन अध्यक्ष)
- आरबीआई के डिप्टी गवर्नर (मौद्रिक नीति के प्रभारी)
- आरबीआई का एक अधिकारी-आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित
- केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त तीन बाहरी सदस्य: अर्थशास्त्र, बैंकिंग, वित्त या मौद्रिक नीति में विशेषज्ञता रखने वाले।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) की संरचना: यह छह सदस्यीय निकाय है जिसमें शामिल हैं:
- नीतिगत विफलता: यदि मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों तक सह्य सीमा (2% से 6% के बीच) से बाहर रहती है, तो इसे मौद्रिक नीति फ्रेमवर्क की विफलता माना जाता है।
फरवरी में वार्षिक आधार पर संयुक्त ICI की वृद्धि धीमी होकर 2.3% रही, जबकि जनवरी में यह 4.7% थी।
मुख्य उद्योगों का सूचकांक (ICI) के बारे में:
- इसमें आठ मुख्य उद्योग शामिल हैं: कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, उर्वरक, इस्पात, सीमेंट और बिजली।
- ये औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में शामिल वस्तुओं के 40.27% भारांश का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- जारीकर्ता: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) के तहत आर्थिक सलाहकार कार्यालय।
Article Sources
1 sourceजनवरी-दिसंबर 2025 की अवधि के लिए असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE) 2025 के परिणाम जारी किए गए हैं।
ASUSE के बारे में:
- संचालन: केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा।
- उद्देश्य: GDP अनुमान और राष्ट्रीय लेखा के लिए इनपुट प्रदान करना।
- कवरेज: असंगठित गैर-कृषि क्षेत्रक; विनिर्माण, व्यापार और सेवाएं।
- संकेतक: रोजगार, सकल मूल्य वर्धित (GVA), मजदूरी, डिजिटल उपयोग आदि।
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1 sourceकेंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA), 1955 के तहत शक्तियों का उपयोग करते हुए प्राकृतिक गैस (आपूर्ति विनियमन) आदेश, 2026 जारी किया है।
- यह कदम पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण उठाया गया है। इससे होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाली तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की शिपमेंट गंभीर रूप से बाधित हो गई है।
आदेश के मुख्य प्रावधान
- चार-स्तरीय प्राथमिकता आवंटन फ्रेमवर्क: सीमित आपूर्ति के प्रबंधन के लिए, आवंटन फ्रेमवर्क पिछले छह महीनों में उपभोक्ताओं के औसत गैस उपयोग पर आधारित है।
- गैस पुनर्वितरण: विद्युत संयंत्रों और पेट्रोकेमिकल सुविधाओं सहित गैर-प्राथमिकता वाले उद्योगों के लिए गैस आपूर्ति में आंशिक या पूर्ण कटौती की जाएगी।
- गैस पूलिंग तंत्र: गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रकों से प्राथमिकता वाले क्षेत्रकों में भेजी गई गैस को एक नए निर्धारित 'पूल मूल्य' पर बेचा जाएगा।
आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA), 1955 के बारे में
- उद्देश्य: यह सरकार को जमाखोरी, कालाबाजारी और कमी को रोकने के लिए आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति एवं कीमतों को विनियमित करने की अनुमति देता है।
- धारा 3: ECA की धारा 3 केंद्र सरकार को पेट्रोलियम और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति एवं वितरण को विनियमित करने का अधिकार देती है, ताकि उनका समान वितरण सुनिश्चित किया जा सके।

अन्य उठाए गए कदम
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1 sourceभारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों की वर्तमान क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) है।
- पूरी क्षमता पर होने पर, यह भंडार भारत में कच्चे तेल की आपूर्ति के लगभग 9.5 दिनों के लिए पर्याप्त है।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) क्या है?
- परिचय: ये कच्चे तेल के भंडार हैं। इन्हें आपूर्ति में व्यवधान के दौरान ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा बनाए रखा जाता है।
- ये तेल कंपनियों के पास सुरक्षित वाणिज्यिक भंडार के अतिरिक्त होते हैं।
- कार्यान्वयन एजेंसी: इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) नामक विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) के अंतर्गत। ISPRL की स्थापना 2004 में हुई थी।
- मंत्रालय: केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय।
- भंडारण तकनीक: कच्चे तेल को भूमिगत चट्टानी गुफाओं में भंडारित किया जाता है। ये गुफाएं जमीन के काफी नीचे, आमतौर पर तटीय क्षेत्रों के पास स्थित होती हैं।
- अवस्थिति (मानचित्र देखिए):
- चरण-I में स्थापित SPRs (5.33 MMT): वर्तमान में तीन स्थानों पर संचालित;
- विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश),
- मंगलुरु (कर्नाटक), और
- पादुर (कर्नाटक)
- चरण-II (2021 में स्वीकृत, अतिरिक्त 6.5 MMT क्षमता के साथ): भविष्य में विस्तार की योजना:
- चरण-I में स्थापित SPRs (5.33 MMT): वर्तमान में तीन स्थानों पर संचालित;

- चंडीखोल (ओडिशा)
- पादुर चरण-II
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का महत्व
- ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से: युद्ध, आपूर्ति में व्यवधान, समुद्री मार्ग के बाधित होने की दशा में देश में उपभोक्ताओं को तेल की आपूर्ति होती रहती है।
- आर्थिक स्थिरता की दृष्टि से: यह बाजार में तेल के मूल्य को स्थिर बनाए रखता है, जिससे अचानक मुद्रास्फीति के झटकों से बचने में मदद मिलती है।
- रणनीतिक स्वायत्तता की दृष्टि से: विदेशी भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भरता कम करता है।
भारत के समक्ष चुनौतियां
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Article Sources
1 sourceयह आदेश आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत अधिसूचित किया गया है। इसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं:

- पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) नेटवर्क के विस्तार को सुगम बनाना,
- स्वच्छ ईंधनों के उपभोग को बढ़ावा देना,
- ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना, और
- भारत की प्राकृतिक गैस-आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में बढ़ने का समर्थन करना।
मुख्य सुधार: समयबद्ध मंजूरियां, एकल समन्वित ढांचा, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) नेटवर्क का विस्तार, आदि।
गैस-आधारित अर्थव्यवस्था के बारे में
- लक्ष्य: भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक अपनी ऊर्जा मिश्रण यानी ऊर्जा की मांग में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को बढ़ाकर 15% तक करना है।
- वर्ष 2025 में इसकी हिस्सेदारी केवल 6.2% थी।
- गौरतलब है कि प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन है लेकिन मुख्यतः मीथेन (CH₄) से बनी होती है।
- मांग का अनुमान: प्राकृतिक गैस की खपत वित्त-वर्ष 25 की 52 मिलियन टन प्रतिवर्ष (MTPA) से बढ़कर वित्त-वर्ष 40 तक 112 MTPA से अधिक होने का अनुमान है।
- मुख्य महत्व
- डिकार्बोनाइजेशन में योगदान: प्राकृतिक गैस, पेट्रोल की तुलना में 15–20% तक उत्सर्जन कम करती है तथा कणीय पदार्थ (PM), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और सल्फर ऑक्साइड (SOx) उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी करती है।
- ऊर्जा सुरक्षा में योगदान: ऊर्जा वितरण नेटवर्क के स्रोतों में विविधता लाती है, जिससे आयातित कच्चे तेल जैसे एकल जीवाश्म ईंधन स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता कम होती है।
- आर्थिक रूप से उपयोगी: LNG लंबी दूरी के भारी-भरकम ट्रकों के लिए डीजल की तुलना में 'टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' (TCO) के मामले में व्यावसायिक रूप से लाभकारी विकल्प प्रदान करता है
- 'टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' (TCO) एक वित्तीय अनुमान है, जिसका उद्देश्य खरीदारों और मालिकों को किसी उत्पाद या प्रणाली की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागतों का निर्धारण करने में सहायता करना है।
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1 sourceबायोगैस का उत्पादन तब होता है जब जैविक यानी आर्गेनिक पदार्थ (पौधों और पशुओं के उत्पाद) को बैक्टीरिया द्वारा ऑक्सीजन-रहित वातावरण में खंडित किया जाता है। इस प्रक्रिया को अवायवीय अपघटन (Anaerobic Digestion) कहा जाता है।
बायोगैस के बारे में
- संघटक: मीथेन (CH4) 55-60%, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) 35-40%, तथा आंशिक मात्रा में अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S) और नमी।
- उत्पादन में शामिल मुख्य प्रौद्योगिकियां:
- बायोडाइजेस्टर्स: इस प्रौद्योगिकी में वायुरोधी प्रणालियों (जैसे कंटेनर या टैंक) में पानी में घुले जैविक पदार्थों को प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों द्वारा तोड़ा जाता है।
- लैंडफिल गैस पुनर्प्राप्ति प्रणाली: इसमें लैंडफिल स्थलों पर नगर ठोस अपशिष्ट (MSW) का अवायवीय (एनेरोबिक) परिस्थितियों में अपघटन किया जाता है।
- अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र: ये संयंत्र सीवेज स्लज से जैविक पदार्थ, ठोस और पोषक तत्वों को पुनः प्राप्त कर सकते हैं, जिन्हें बायोगैस उत्पादन के लिए इनपुट के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
रसोई ईंधन (कुकिंग फ्यूल) के विकल्प के रूप में बायोगैस की प्रासंगिकता
- ऊर्जा के अन्य स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाना: आयातित ईंधनों पर अधिक निर्भर होने से वैश्विक संकटों के समय इनकी आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसलिए ऊर्जा के अन्य स्रोतों पर विचार करना आवश्यक है।
- रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी : बायोगैस उत्पादन से बायो-स्लरी भी प्राप्त होती है, जो पोषक तत्वों से समृद्ध उप-उत्पाद (बाय-प्रोडक्ट) है। इसका इस्तेमाल जैविक उर्वरक के रूप में किया जा सकता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों के लिए लाभ की स्थिति: बायोगैस का इस्तेमाल बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ेगी और अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार होगा। साथ ही, यह जीवाश्म ईंधनों की तुलना में स्वच्छ ऊर्जा विकल्प है।
भारत में बायोगैस के उपयोग को बढ़ावा देने हेतु प्रमुख पहलें
- गैलवनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन (गोवर्धन/GOBARdhan) योजना: यह 2018 में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत शुरू की गई। इसका उद्देश्य जैविक अपशिष्ट को बायोगैस में परिवर्तित करना है।

- राष्ट्रीय बायो-एनर्जी कार्यक्रम (NBP): इसमें बायोगैस से संबंधित उप-योजनाएं शामिल हैं; जैसे कि:
- अपशिष्ट से ऊर्जा कार्यक्रम: शहरी, औद्योगिक, कृषि अपशिष्ट और नगर ठोस अपशिष्ट से बायोगैस/बायो-CNG आदि के रूप में ऊर्जा उत्पादन।
- इसमें भस्मीकरण (Incineration), गैसीकरण (Gasification), या तापीय अपघटन (Pyrolysis) जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
- अपशिष्ट से ऊर्जा कार्यक्रम: शहरी, औद्योगिक, कृषि अपशिष्ट और नगर ठोस अपशिष्ट से बायोगैस/बायो-CNG आदि के रूप में ऊर्जा उत्पादन।
- बायोगैस कार्यक्रम (2021-22 से 2025-26): इसका उद्देश्य खाना पकाने का स्वच्छ ईंधन, प्रकाश आदि के लिए बायोगैस संयंत्रों की स्थापना है।
केंद्र सरकार ने निर्यात संवर्धन मिशन (EPM) के तहत "RELIEF” पहल को मंजूरी दी। यहां RELIEF से आशय है; निर्यात सुगमीकरण हेतु लचीलापन एवं लॉजिस्टिक्स हस्तक्षेप (रेजिलिएंस एंड लॉजिस्टिक्स इंटरवेंशन फॉर एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन)।
- RELIEF पहल का उद्देश्य खाड़ी और व्यापक पश्चिम एशिया समुद्री गलियारे में व्यवधानों के कारण माल ढुलाई दरों में असामान्य वृद्धि, बढ़े हुए बीमा प्रीमियम और युद्ध-संबंधी निर्यात जोखिमों से प्रभावित भारतीय निर्यातकों को सहायता प्रदान करना है।
RELIEF के बारे में
- उद्देश्य: लॉजिस्टिक्स से संबंधित व्यवधानों के तात्कालिक प्रभाव को कम करना, निर्यातकों के विश्वास को बनाए रखना, ऑर्डर रद्द होने से रोकना और निर्यात पर निर्भर क्षेत्रकों में रोजगार को सुरक्षित रखना।
- नोडल और कार्यान्वयन एजेंसी: ECGC लिमिटेड, जो केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की पूर्ण स्वामित्व वाली संस्था है। ECGC को पहले ‘भारतीय निर्यात ऋण गारंटी निगम लिमिटेड’ कहा जाता था।
- ECGC की स्थापना 1957 में हुई थी। इसकी स्थापना 'क्रेडिट रिस्क इंश्योरेंस' प्रदान करके देश से निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी।
- घटक: इस पहल के तीन घटक हैं। ये घटक डिलीवरी या ट्रांसशिपमेंट हेतु उन खेपों को कवर करते हैं जो संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, इजरायल, कतर, ओमान, बहरीन, इराक, ईरान और यमन जैसे पश्चिम एशियाई देशों के लिए हैं। ये तीन घटक निम्नलिखित हैं:
- उन निर्यातकों के लिए 100% तक जोखिम कवरेज, जिन्होंने पहले से ECGC क्रेडिट बीमा कवर प्राप्त किया है,
- आगामी तीन महीनों में शिपमेंट की योजना बनाने वाले निर्यातकों को ECGC कवर लेने के लिए प्रोत्साहन, जिसमें सरकार द्वारा 95% तक जोखिम कवरेज सहायता,
- पात्र गैर-ECGC बीमित MSME निर्यातकों के लिए आंशिक प्रतिपूर्ति (50% तक) की व्यवस्था।

Article Sources
1 sourceभारत सरकार ने सभी पात्र निर्यात उत्पादों के लिए RoDTEP योजना के तहत दरों और मूल्य सीमाओं को बहाल करने का निर्णय लिया है।
RoDTEP योजना के बारे में

- इसे विदेश व्यापार नीति 2015-20 में संशोधन करके 2021 में शुरू किया गया था।
- इस योजना ने 'मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम' (MEIS) का स्थान लिया है। WTO द्वारा MEIS को अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रथाओं के असंगत घोषित किए जाने के बाद यह बदलाव किया गया था।
- उद्देश्य: यह निर्यातित वस्तुओं के निर्माण और वितरण के दौरान लगने वाले करों और शुल्कों का रिफंड प्रदान करता है। यह उन लेवी पर लागू होता है जिनकी प्रतिपूर्ति किसी अन्य तंत्र के तहत नहीं की जाती है।
- इसे केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तहत राजस्व विभाग द्वारा प्रशासित किया जाता है।
Article Sources
1 sourceहाल ही में, केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री ने भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) में पिछले एक दशक में हुए क्रांतिकारी परिवर्तनों पर प्रकाश डाला।
भारतीय मानक ब्यूरो (मुख्यालय: नई दिल्ली, भारत)
- उत्पत्ति: इसकी स्थापना वर्ष 1947 में भारतीय मानक संस्थान (ISI) के रूप में हुई थी। तत्पश्चात, भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 1986 के माध्यम से 1987 में BIS को एक वैधानिक निकाय के रूप में स्थापित किया गया।
- उद्देश्य: यह भारत का राष्ट्रीय मानक निकाय है। इसका मुख्य उत्तरदायित्व वस्तुओं के मानकीकरण, अंकन और गुणवत्ता प्रमाणन की गतिविधियों का सामंजस्यपूर्ण विकास करना है।
- वैधानिक ढांचा: भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 ने इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार किया। यह अधिनियम अनिवार्य प्रमाणन, हॉलमार्किंग और उपभोक्ता संरक्षण उपायों के साथ-साथ विभिन्न प्रमाणन योजनाओं को लागू करने की शक्ति प्रदान करता है।
- क्षेत्रीय नेटवर्क: इसके 5 क्षेत्रीय कार्यालय कोलकाता, चेन्नई, मुंबई, चंडीगढ़ और दिल्ली में स्थित हैं।
- प्रमुख कार्य:
- मानकों का निर्धारण: वर्तमान में 23,300 से अधिक भारतीय मानक प्रभावी हैं। इनमें नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और संधारणीयता जैसे उभरते क्षेत्र शामिल हैं।
- उत्पाद प्रमाणन: प्रमाणित उत्पादों की संख्या वर्ष 2025 में बढ़कर 1,437+ हो गई है। हाल ही में इसमें 'करेंसी नोट सॉर्टिंग मशीन' जैसे नवाचारों को भी जोड़ा गया है।
- हॉलमार्किंग: यह योजना के माध्यम से सोने और चांदी के आभूषणों की शुद्धता का प्रमाणन सुनिश्चित करती है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: BIS सक्रिय रूप से वैश्विक मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है, जैसे अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रोटेक्निकल कमीशन (IEC) की सामान्य बैठक की मेजबानी करना।
- अन्य सेवाएँ:
- प्रयोगशाला और परीक्षण सेवाएँ।
- राष्ट्रीय मानकीकरण प्रशिक्षण संस्थान (NITS) के माध्यम से प्रशिक्षण।
- उपभोक्ता जागरूकता पहल: BIS Care App और राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय।
- उपलब्धियाँ: लगभग 94% भारतीय मानकों को अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) और अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रोटेक्निकल कमीशन (IEC) के वैश्विक मानकों के साथ सामंजस्यपूर्ण बनाया गया है।
Article Sources
1 sourceकेंद्रीय बजट 2026-27 में 'नारियल प्रोत्साहन योजना' की घोषणा की गई। इसका उद्देश्य पुराने, गैर-उत्पादक नारियल के बगीचों का कायाकल्प करना और तटीय क्षेत्रों में नारियल की खेती का विस्तार करना है।
नारियल उत्पादन के बारे में:
- भारत नारियल का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है। यह वैश्विक नारियल उत्पादन में लगभग 30% का योगदान देता है।
- खेती के लिए आदर्श स्थितियां:
- अक्षांश: उष्णकटिबंधीय जलवायु में भूमध्य रेखा के 23 डिग्री उत्तर और दक्षिण के बीच।
- ऊंचाई: समुद्र तल से 600 मीटर तक।
- तापमान: 20° से 32°C के बीच होना चाहिए।
- वर्षा: वार्षिक 1000–2500 मिमी।
- मृदा: अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट, लैटेराइट और तटीय जलोढ़ मृदा।
- प्रमुख उत्पादक: केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक।
