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अर्धचालक/सेमीकंडक्टर (SEMICONDUCTOR)

30 Apr 2026
1 min

In Summary

  • प्रधानमंत्री ने माइक्रोन टेक्नोलॉजी द्वारा गुजरात के सानंद में स्थापित भारत की पहली सेमीकंडक्टर असेंबली, टेस्ट, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP) सुविधा का उद्घाटन किया।
  • भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2024-25 में 52 बिलियन डॉलर का था, जिसके 2030 तक 100-110 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि वर्तमान में घरेलू मांग का केवल 10% ही पूरा हो पा रहा है।
  • प्रमुख पहलों में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम), सेमीकॉन इंडिया, डीएलआई योजना, सी2एस कार्यक्रम और आईसीईटी जैसे वैश्विक सहयोग शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

प्रधानमंत्री ने गुजरात के साणंद में भारत की पहली सेमीकंडक्टर चिप्स की असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP) सुविधा का उद्घाटन किया।

अन्य संबंधित तथ्य

  • माइक्रोन टेक्नोलॉजी द्वारा स्थापित इस संयंत्र ने भारत में पहली वाणिज्यिक सेमीकंडक्टर चिप उत्पादन की शुरुआत की है। 
  • यह एक विश्वसनीय, लचीले और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर पारितंत्र के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 
    • इससे वैश्विक सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में भारत की भागीदारी भी बढ़ेगी।

भारत में सेमीकंडक्टर पारितंत्र की स्थिति

  • भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2024-25 में 52 बिलियन डॉलर का है।
  • इस बाजार के 2030 तक 100–110 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। 
  • भारत वर्तमान में अपनी सेमीकंडक्टर मांग का केवल लगभग 10% ही घरेलू स्तर पर पूरा करता है।
  • विकास के प्रमुख कारक: इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण (उदाहरण के लिए, भारत विश्व में दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन निर्माता है), इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग, आदि।

सेमीकंडक्टर विनिर्माण में स्वदेशी क्षमता निर्माण की आवश्यकता

  • आयात पर निर्भरता कम करना: भारत ने रक्षा आवश्यकताओं के लिए प्रति वर्ष 1 बिलियन डॉलर मूल्य के सेमीकंडक्टर आयात किये (2024)।
  • यह दूरसंचार (5G/6G), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अंतरिक्ष और डिजिटल अवसंरचना के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
  • केंद्रीकृत आपूर्ति श्रृंखलाओं की भेद्यता: वैश्विक सेमीकंडक्टर विनिर्माण में ताइवान की हिस्सेदारी 60% से अधिक है (शेष दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं)। साथ ही, सबसे उन्नत चिप्स में से लगभग 90% का उत्पादन ताइवान में होता है। 
    • कोविड-19 महामारी और यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद दुनिया ने चिप्स की भारी कमी का सामना किया। 
  • निर्यात क्षमता: इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देता है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करता है। इससे भारत को 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर के सेमीकंडक्टर बाजार में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी।
  • इससे उच्च मूल्य वाले विनिर्माण रोजगार सृजित होंगे और उपकरण, सामग्री तथा टूल्स जैसे अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों को प्रोत्साहन मिलेगा। 

सेमीकंडक्टर पारितंत्र को समर्थन देने के लिए उठाए गए प्रमुख कदम

  • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) एवं सेमिकॉन इंडिया: ISM देश के दीर्घकालिक सेमीकंडक्टर क्षेत्र को संचालित करने वाली नोडल एजेंसी है। केंद्रीय बजट 2026-27 में ISM 2.0 की घोषणा की गई है। ISM में चार प्राथमिक योजनाएं शामिल हैं:
    • सेमीकंडक्टर फैब्स योजना
    • डिस्प्ले फैब्स योजना
    • कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स एवं ATMP/OSAT योजना 
    • डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना
  • प्रतिभा और कौशल विकास: इसमें चिप्स टू स्टार्ट-अप (C2S) कार्यक्रम, AICTE पाठ्यक्रम अद्यतन (विशेष इंजीनियरिंग कार्यक्रमों की शुरुआत), आदि शामिल हैं।
  • स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर और कोर टेक्नोलॉजीज: माइक्रोप्रोसेसर डेवलपमेंट प्रोग्राम (MDP) और डिजिटल इंडिया RISC-V (DIR-V) कार्यक्रम के कारण SHAKTI, VIKRAM जैसे स्वदेशी ओपन-सोर्स प्रोसेसर का निर्माण हुआ है।
  • हाल ही में C-DAC द्वारा विकसित पूर्णतः स्वदेशी 64-बिट माइक्रोप्रोसेसर DHRUV64 का लॉन्च एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो 5G, IoT और औद्योगिक स्वचालन में उपयोगी है।
  • वैश्विक सहयोग: उदाहरण के लिए, भारत-अमेरिका क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी पहल (iCET), अमेरिका के नेतृत्व वाली पैक्स सिलिका पहल, आदि।
  • अन्य:इलेक्ट्रॉनिक घटकों और सेमीकंडक्टर के निर्माण को बढ़ावा देने की योजना (SPECS),  इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स एंड मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) आदि। 

आगे की राह

  • संस्थान निर्माण: भारत को ताइवान के इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट (ITRI) की सफलता का अनुकरण करना चाहिए। साथ ही, इसी के समान प्रस्तावित इंडिया सेमीकंडक्टर रिसर्च सेंटर (ISRC) जैसे एक समर्पित संस्थान की स्थापना की जानी चाहिए।
  • प्रतिभाओं की एक विशाल श्रृंखला का निर्माण: इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) के निर्माण हेतु AICTE के नए पाठ्यक्रम जैसे मानकीकृत सेमीकंडक्टर कार्यक्रमों को मुख्यधारा की इंजीनियरिंग में एकीकृत करना चाहिए।
  • स्टार्टअप्स का विस्तार और स्वदेशी R&D: अब केवल असेंबली तक सीमित न रहकर, मुख्य नवाचार की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
  • अगली पीढ़ी की सामग्रियों की ओर संक्रमण: उद्योग को पारंपरिक सिलिकॉन से सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) सेमीकंडक्टर और 3D ग्लास पैकेजिंग की ओर बदलाव का भी समर्थन करना चाहिए।
    • ये उच्च तापमान और उच्च वोल्टेज वाले अनुप्रयोगों (जैसे की रक्षा क्षेत्र) के लिए आवश्यक हैं।
  • राज्य स्तरीय समन्वय और अवसंरचना को सुदृढ़ करना: गुजरात, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे राज्य सुव्यवस्थित नियम, समन्वित विद्युत व्यवस्था आदि प्रदान करके मिसाल कायम कर रहे हैं।
  • रणनीतिक वैश्विक साझेदारियों का निर्माण: वैश्विक सहयोग में सक्रिय रूप से भाग लेना और सेमीकॉन इंडिया जैसे मंचों की मेजबानी करना आवश्यक है। साथ ही, भारत को अमेरिका, जापान जैसे उन्नत सेमीकंडक्टर क्षमता वाले देशों की आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ एकीकृत होना चाहिए।

निष्कर्ष

भारत द्वारा सेमीकंडक्टर क्षेत्रक में किया गया प्रयास आयात पर निर्भरता से तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर एक निर्णायक परिवर्तन को दर्शाता है, जो आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा को मजबूत करता है। निरंतर नीतिगत समर्थन, निवेश और वैश्विक साझेदारियों के साथ, भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में एक प्रमुख अभिकर्ता के रूप में उभरने के लिए तैयार है।

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