सुर्ख़ियों में क्यों?
उच्चतम न्यायालय ने हरीश राणा बनाम भारत संघ एवं अन्य (2026) वाद के ऐतिहासिक निर्णय में पहली बार एक ऐसे व्यक्ति के लिए जीवन-रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति दी, जो पिछले 13 वर्षों से अचेतन जीवित अवस्था (Vegetative State) में था।
SC के निर्णय के मुख्य अंश
- उच्चतम न्यायालय ने सामान्य 30 दिनों की विचार अवधि को समाप्त कर दिया, क्योंकि रोगी के माता-पिता और मेडिकल बोर्ड सर्वसम्मति से इस बात पर सहमत थे कि रोगी में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है।
- यह निर्णय रोगी के सर्वोत्तम हित के सिद्धांत द्वारा निर्देशित है।
- न्यायालय ने फैसला सुनाया कि चिकित्सकीय सहायता प्राप्त पोषण और जलयोजन (CANH) एक चिकित्सा उपचार है। यदि इसका कोई उपचारात्मक उद्देश्य न हो और यह केवल अचेतन जीवित अवस्था को लंबा खींचता हो, तो इसे विधिक रूप से हटाया जा सकता है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बारे में
- इच्छामृत्यु (Euthanasia) का तात्पर्य किसी मरीज को अत्यधिक पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए उसकी मृत्यु की प्रक्रिया को शीघ्र करने से है। इसे व्यापक रूप से दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है: सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु।
- सक्रिय इच्छामृत्यु पीड़ा को समाप्त करने के लिए रोगी की मृत्यु का कारण बनने वाला एक जानबूझकर किया गया प्रत्यक्ष कृत्य है। यह कृत्य सामान्यतः जानलेवा दवा देकर किया जाता है।
- यह भारत में अवैध है लेकिन नीदरलैंड, बेल्जियम, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में वैध है।
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है जीवन-रक्षक उपचार जैसे कि कार्डियो-पल्मोनरी रिससिटेशन (CPR), वेंटिलेटर सपोर्ट, विशेष पोषण आदि को हटाकर व्यक्ति को प्राकृतिक रूप से मरने देना।
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु को आगे स्वैच्छिक और गैर-स्वैच्छिक के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- स्वैच्छिक इच्छामृत्यु वह है जहां रोगी से सहमति ली जाती है।
- गैर-स्वैच्छिक इच्छामृत्यु में, रोगी की स्थिति के कारण सहमति नहीं ली जाती है (जैसे: हरीश राणा वाद, 2026)।
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु को आगे स्वैच्छिक और गैर-स्वैच्छिक के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- सक्रिय इच्छामृत्यु पीड़ा को समाप्त करने के लिए रोगी की मृत्यु का कारण बनने वाला एक जानबूझकर किया गया प्रत्यक्ष कृत्य है। यह कृत्य सामान्यतः जानलेवा दवा देकर किया जाता है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु की कानूनी स्थिति
- मारुति श्रीपति दुबल बनाम महाराष्ट्र राज्य (1987): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि मृत्यु का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है और IPC की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) को असंवैधानिक घोषित किया।
- ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996) वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा इस निर्णय को बदल दिया गया था।
- इस वाद में उच्चतम न्यायालय (SC) ने निर्णय दिया था कि IPC की धारा 309 संवैधानिक है और जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है, लेकिन समय से पहले मरने का अधिकार नहीं।
- ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996) वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा इस निर्णय को बदल दिया गया था।
- अरुणा रामचंद्र शानबाग वाद (2011): उच्चतम न्यायालय ने इच्छामृत्यु की याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, असाध्य और अपरिवर्तनीय रोगियों के लिए सख्त शर्तों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी।
- कॉमन कॉज निर्णय (2018): उच्चतम न्यायालय ने इसे मान्यता दी और माना कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार, अनुच्छेद 21 के तहत एक मूल अधिकार है।
- इस वाद में, न्यायालय ने इसके लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए और 'लिविंग विल' की अवधारणा को मान्यता दी, जिसमें जिला मजिस्ट्रेटों (DMs), न्यायिक अधिकारियों और चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी शामिल है।
- लिविंग विल यह एक लिखित दस्तावेज है जिसमें व्यक्ति भविष्य के लिए स्पष्ट निर्देश देता है कि यदि वह अपनी सहमति व्यक्त करने में अक्षम हो जाता है, तो उसे कौन सा चिकित्सा उपचार दिया जाना चाहिए या नहीं।
- इस वाद में, न्यायालय ने इसके लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए और 'लिविंग विल' की अवधारणा को मान्यता दी, जिसमें जिला मजिस्ट्रेटों (DMs), न्यायिक अधिकारियों और चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी शामिल है।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु के पक्ष में तर्क
- रोगी की स्वायत्तता: यह अपने स्वयं के जीवन और मृत्यु के बारे में निर्णय लेने के रोगी के अधिकार को बनाए रखता है और गरिमा के साथ मरने के अधिकार का समर्थन करता है, जैसा कि कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) वाद में उच्चतम न्यायालय (SC) द्वारा प्रतिपादित किया गया था।
- गरिमापूर्ण मृत्यु सुनिश्चित करना: यह जीवन-रक्षक उपचार के माध्यम से अचेतन जीवित अवस्था या गंभीर स्थिति में लंबे समय तक कृत्रिम रूप से जीवित रखने पर रोक लगाता है। यह मानवीय मूल्यों के अनुरूप है।
- पीड़ा को कम करना: यह लाइलाज बीमारियों जैसे अंतिम चरण के कैंसर में कीमोथेरेपी जैसे उपचार के कारण होने वाले अनावश्यक पीड़ा से बचा सकता है। इसे परोपकार के नैतिक सिद्धांत (रोगी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना) द्वारा समर्थन प्राप्त है।
- बोझ में कमी: यह वेंटिलेटर, आईसीयू आदि जैसे लंबे समय तक चलने वाले जीवन-रक्षक उपचारों के भावनात्मक और वित्तीय बोझ को कम करता है।
- कानूनी स्पष्टता: निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर स्पष्ट दिशानिर्देशों के साथ न्यायिक मान्यता एक व्यवस्थित ढांचा (मेडिकल बोर्ड, सहमति प्रक्रिया) प्रदान करती है। इससे डॉक्टरों और परिवारजनों के लिए अस्पष्टता कम हो जाती है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु के विरुद्ध तर्क
- दुरुपयोग और अनुचित दबाव: इस बात का जोखिम बना रहता है कि परिवार के सदस्य उत्तराधिकार, वित्तीय राहत, या देखभाल की जिम्मेदारियों को कम करने के लिए निर्णयों को अनुचित रूप से प्रभावित कर सकते हैं। इससे सुभेद्य समूह (बुजुर्ग, दिव्यांग आदि) शोषण का शिकार हो सकते हैं।
- जीवन की पवित्रता बनाम स्वायत्तता: कई नैतिक और धार्मिक परंपराएं जीवन को पवित्र मानती हैं और मृत्यु को निकट लाने की किसी भी कृत्य का विरोध करती हैं। यह व्यक्तिगत अधिकारों और सामाजिक नैतिक मूल्यों के बीच तनाव पैदा कर सकता है।
- कमजोर संस्थागत रक्षोपाय: कार्यान्वयन की चुनौतियां जैसे लिविंग विल के बारे में जागरूकता की कमी, सीमित सदाचार समितियां आदि प्रक्रियागत खामियों के जोखिम को जन्म दे सकती हैं।
- नैदानिक और रोग-पूर्वानुमान संबंधी अनिश्चितता: चिकित्सा विज्ञान अचूक नहीं है, और अप्रत्याशित सुधार के मामले मौजूद हैं। एक गलत रोग पूर्वानुमान के परिणामस्वरूप किसी रोगी की समय से पूर्व मृत्यु हो सकती है, भले ही रोगी के ठीक होने की संभावना हो।
- अहानिकरता (Non-maleficence): अहानिकरता का सिद्धांत (क्षति न पहुंचाना) इस बात पर जोर देता है कि चिकित्सा पेशेवरों को रोगियों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। यह सिद्धांत हिप्पोक्रेटिक ओथ के अनुरूप है।
आगे की राह
- बहु-स्तरीय चिकित्सा निर्णय ढांचा: रोगी की स्थिति का स्वतंत्र, विशेषज्ञ-संचालित और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिक एवं माध्यमिक मेडिकल बोर्ड्स को संस्थागत बनाया जाना चाहिए।
- 'रोगी का सर्वोत्तम हित' सिद्धांत का अनुप्रयोग: नैतिक रूप से सही परिणाम सुनिश्चित करने के लिए निर्णयों में चिकित्सा कारकों (अपरिवर्तनीयता, उपचार की व्यर्थता) के साथ-साथ गैर-चिकित्सा पहलुओं (गरिमा, पीड़ा, देखभाल करने वालों की इच्छा) का समग्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
- राज्य और प्रशासनिक मशीनरी की परिभाषित भूमिका: सरकारों को कॉमन कॉज दिशा-निर्देशों के कार्यान्वयन को निम्नलिखित माध्यमों से अधिक प्रभावी ढंग से सुविधाजनक बनाना चाहिए:
- स्थानीय सरकार के अधिकारियों को लिविंग विल के संरक्षक के रूप में नामित करना।
- अस्पतालों को मेडिकल बोर्ड के गठन के लिए स्पष्ट निर्देश देना।
- मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMOs) को सक्षम चिकित्सकों को मनोनीत करने के लिए सशक्त बनाना।
- निगरानी और समीक्षा तंत्र: दुरुपयोग को रोकने और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पुनर्विचार अवधि, पर्यवेक्षी न्यायिक हस्तक्षेप (असहमति के मामले में), और संस्थागत चेकपॉइंट्स का प्रावधान किया जाना चाहिए।
- प्रशामक देखभाल को बढ़ावा: उपचार वापस लेने का अर्थ परित्याग नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पर्यवेक्षित प्रशामक और जीवन के अंतिम चरण (EOL) की देखभाल की ओर एक बदलाव होना चाहिए। यह बदलाव पीड़ा को कम करने वाला, लक्षणों का प्रबंधित करने वाला और न्यूनतम पीड़ा के साथ मानवीय गरिमा को अनुरक्षित करने वाला होना चाहिए।
- विधायी समर्थन: उच्चतम न्यायालय (SC) ने केंद्र सरकार से जीवन के अंतिम चरण (EOL) की देखभाल और निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर एक व्यापक कानून बनाने पर विचार करने का आग्रह किया था, जिस पर विचार किया जा सकता है।