सुर्ख़ियों में क्यों?
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 1 अप्रैल, 2026 से भारत में खाद्य क्षेत्र में बड़े विनियामक और प्रक्रियात्मक सुधारों को मंजूरी दी है।
कौन से सुधार किए गए हैं?
- सरकार ने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत जारी खाद्य सुरक्षा और मानक (खाद्य कारोबार का अनुज्ञापन और रजिस्ट्रीकरण) विनियम, 2011 के अनुसार लाइसेंसिंग आवश्यकताओं में बदलाव करने के लिए आदेश जारी किए हैं।
- यह सुधार गैर-वित्तीय विनियामक सुधारों पर नीति आयोग की उच्च-स्तरीय समिति की सिफारिशों के अनुरूप है।
- सुधारों में शामिल हैं:
- FSSAI लाइसेंस की आवश्यकता: FSSAI पंजीकरण और लाइसेंस के लिए स्थायी वैधता लागू की गई है, जिससे बार-बार नवीनीकरण की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी।
- व्यवसायों के लिए नए टर्नओवर मानदंड:
- पंजीकरण: जिन व्यवसायों का वार्षिक टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये तक है (पहले यह सीमा 12 लाख रुपये थी)।
- राज्य लाइसेंस: जिन व्यवसायों का टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये से 50 करोड़ रुपये के बीच है।
- केंद्रीय लाइसेंस: जिन व्यवसायों का टर्नओवर 50 करोड़ रुपये से अधिक है।
- स्ट्रीट वेंडर लाइसेंसिंग: ऐसे स्ट्रीट फूड विक्रेता जो पहले से ही नगर निगम या टाउन वेंडिंग कमेटी के तहत स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम, 2014 में पंजीकृत हैं, उन्हें अब स्वतः FSSAI के तहत पंजीकृत माना जाएगा। इससे दोहराव समाप्त होगा।
- महत्व: इन सुधारों का उद्देश्य सूक्ष्म और लघु व्यवसायों के लिए अनुपालन लागत, कागजी कार्यवाही और लाइसेंसिंग प्राधिकरणों के साथ बार-बार होने वाले संपर्क को कम करना है।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI)
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भारत के खाद्य क्षेत्र की मुख्य समस्याएं
- मिलावट और संदूषण: खाद्य पदार्थों में मिलावट अभी भी जन-स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बनी हुई है। दूध, मसाले, खाद्य तेल और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों जैसी दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुओं में अक्सर रासायनिक रंगों और कृत्रिम रूप से पकाने वाले एजेंटों की मिलावट की जाती है।
- हाल ही में, राजस्थान सहकारी डेयरी महासंघ ने दूध के 7299 नमूने एकत्र किए, जिनमें से 48.24% नमूनों में पानी की मिलावट पाई गई और 1.41% में रासायनिक संदूषण मिला।
- जांच से जुड़ी समस्याएं: स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में 266 प्रयोगशालाएं हैं। इनमें से अनेक में भारी धातु, कीटनाशक और जीवाणु संदूषण जैसे अनिवार्य मापदंडों की जांच करने की सुविधाएं मौजूद नहीं हैं।
- निगरानी से जुड़ी समस्या: संसदीय समिति ने पाया कि हाल के वर्षों में किए गए निरीक्षणों में से केवल 2% में ही नियमों का पालन न होने की बात सामने आई। मिलावट के व्यापक प्रमाणों को देखते हुए यह आंकड़ा अवास्तविक प्रतीत होता है। यह कमजोर निगरानी प्रणाली को दर्शाता है।
- तालमेल का अभाव: FSSAI और अन्य विभागों (जैसे रसायन और पेट्रो रसायन विभाग) के बीच तालमेल की कमी के कारण पैकेजिंग संबंधी नियमों को लागू करने में बाधा होती है।
- विशाल असंगठित क्षेत्र: भारत में खाद्य उत्पादन और वितरण का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनियमित अनौपचारिक है। इसमें सड़क किनारे ठेले लगाने वाले और छोटे पैमाने के व्यवसाय आदि शामिल हैं। इसके कारण गुणवत्ता की निगरानी करना और सुरक्षा मानकों को लागू करना अत्यधिक कठिन हो जाता है।
- विनियामकीय उदासीनता: एक कानूनी ढांचा मौजूद होने के बावजूद, FSSAI को गंभीर ढांचागत विफलताओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की भारी कमी भी शामिल है।
- भ्रामक मार्केटिंग: स्वास्थ्य सप्लीमेंट और न्यूट्रास्यूटिकल बाजार में कई कंपनियां वैज्ञानिक प्रमाण के बिना भ्रामक दावे करती हैं।
- उदाहरण के लिए, उपभोक्ताओं को गुमराह करने के लिए "चिकित्सकीय रूप से परीक्षित" (clinically tested), "आयुर्वेदिक", या "कद बढ़ाने वाला" जैसे दावे किए जाते हैं।
निष्कर्ष
भारत के खाद्य क्षेत्र में सुधारों को ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस और प्रभावी विनियमन के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए। इसके लिए प्रवर्तन को मजबूत करना, संस्थागत क्षमता बढ़ाना और असंगठित क्षेत्र को औपचारिक बनाना आवश्यक है। बेहतर मानकों, ट्रेसबिलिटी और उपभोक्ता जागरूकता के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, साथ ही अस्वास्थ्यकर आहार और भ्रामक विज्ञापनों से उत्पन्न स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का समाधान भी जरूरी है।
इसके साथ ही, 'खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना' (PLISFPI) जैसी विकास-उन्मुख पहलें निवेश, नवाचार और संपूर्ण क्षेत्र के सर्वांगीण विकास को बढ़ावा दे सकती हैं। PLISFPI के लिए ₹10,900 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है।