भारत में खाद्य क्षेत्र में सुधार (Food Sector Reforms in India) | Current Affairs | Vision IAS

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भारत में खाद्य क्षेत्र में सुधार (Food Sector Reforms in India)

30 Apr 2026
1 min

In Summary

  • स्वास्थ्य मंत्रालय ने 1 अप्रैल, 2026 से भारत के खाद्य क्षेत्र के लिए सुधारों को मंजूरी दे दी है, जिसमें स्थायी एफएसएसएआई लाइसेंस और संशोधित कारोबार सीमाएं शामिल हैं।
  • कारोबार की सीमा में संशोधन किया गया: पंजीकरण 1.5 करोड़ रुपये तक, राज्य लाइसेंस 1.5-50 करोड़ रुपये, केंद्रीय लाइसेंस 50 करोड़ रुपये से अधिक।
  • नगरपालिकाओं के साथ पंजीकृत स्ट्रीट वेंडर्स का पंजीकरण स्वतः ही FSSAI के साथ हो जाएगा, जिससे डुप्लिकेट पंजीकरण कम हो जाएंगे।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 1 अप्रैल, 2026 से भारत में खाद्य क्षेत्र में बड़े विनियामक और प्रक्रियात्मक सुधारों को मंजूरी दी है।

कौन से सुधार किए गए हैं?

  • सरकार ने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत जारी खाद्य सुरक्षा और मानक (खाद्य कारोबार का अनुज्ञापन और रजिस्‍ट्रीकरण) विनियम, 2011 के अनुसार लाइसेंसिंग आवश्यकताओं में बदलाव करने के लिए आदेश जारी किए हैं।
    • यह सुधार गैर-वित्तीय विनियामक सुधारों पर नीति आयोग की उच्च-स्तरीय समिति की सिफारिशों के अनुरूप है।
  • सुधारों में शामिल हैं:
    • FSSAI लाइसेंस की आवश्यकता: FSSAI पंजीकरण और लाइसेंस के लिए स्थायी वैधता लागू की गई है, जिससे बार-बार नवीनीकरण की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी।
    • व्यवसायों के लिए नए टर्नओवर मानदंड:
      • पंजीकरण: जिन व्यवसायों का वार्षिक टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये तक है (पहले यह सीमा 12 लाख रुपये थी)।
      • राज्य लाइसेंस: जिन व्यवसायों का टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये से 50 करोड़ रुपये के बीच है।
      • केंद्रीय लाइसेंस: जिन व्यवसायों का टर्नओवर 50 करोड़ रुपये से अधिक है।
  • स्ट्रीट वेंडर लाइसेंसिंग: ऐसे स्ट्रीट फूड विक्रेता जो पहले से ही नगर निगम या टाउन वेंडिंग कमेटी के तहत स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम, 2014 में पंजीकृत हैं, उन्हें अब स्वतः FSSAI के तहत पंजीकृत माना जाएगा। इससे दोहराव समाप्त होगा। 
  • महत्व: इन सुधारों का उद्देश्य सूक्ष्म और लघु व्यवसायों के लिए अनुपालन लागत, कागजी कार्यवाही और लाइसेंसिंग प्राधिकरणों के साथ बार-बार होने वाले संपर्क को कम करना है। 

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI)

  • परिचय: भारत के खाद्य क्षेत्र को मुख्य रूप से FSSAI द्वारा विनियमित किया जाता है। यह 'खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006' के तहत स्थापित एक स्वतंत्र वैधानिक प्राधिकरण है।
    • इस अधिनियम ने आठ बहु-विभागीय अधिनियमों और आदेशों जैसे- खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954; फल उत्पाद आदेश, 1955; और मांस खाद्य उत्पाद आदेश, 1973 आदि को प्रतिस्थापित किया है। 
      • इससे भारत में खाद्य सुरक्षा से जुड़े सभी मामलों के लिए एक एकीकृत नियंत्रण प्रणाली स्थापित हुई है।
    • प्रशासनिक मंत्रालय: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय।
  • FSSAI के प्रमुख दायित्व और कार्य
    • लाइसेंसिंग और पंजीकरण: खाद्य व्यवसाय संचालकों (FBOs) को 'खाद्य सुरक्षा और मानक (खाद्य कारोबार का अनुज्ञापन और रजिस्‍ट्रीकरण) विनियम, 2011' के तहत FSSAI पंजीकरण या लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है।
    • मानक निर्धारण: विज्ञान पर आधारित खाद्य सामग्री, योजक (additives) और संदूषकों (contaminants) के लिए विनियम स्थापित करना।
    • गुणवत्ता नियंत्रण: आपूर्ति श्रृंखला के साथ-साथ सुरक्षा की निगरानी करना और पैकेजिंग तथा लेबलिंग के लिए मानक निर्धारित करना।
      • 2011 के विनियमों के अनुसार, भारत में पहले से पैक किए गए (pre-packaged) खाद्य पदार्थों के निर्माताओं के लिए उत्पादों पर निम्नलिखित जानकारी देना अनिवार्य है: सामग्री की सूची (जिसमें योजक भी शामिल हों), पोषण संबंधी जानकारी, शाकाहारी/मांसाहारी प्रतीक, शुद्ध मात्रा आदि
    • आयात विनियमन: 'खाद्य सुरक्षा और मानक (आयात) विनियम, 2017' यह अनिवार्य करता है कि सभी आयातित खाद्य पदार्थ भारतीय मानकों के अनुरूप हों।
      • सीमा शुल्क विभाग तब तक किसी भी खाद्य पदार्थ को मंजूरी नहीं देगा, जब तक कि उसकी 'उपयोग अवधि' का कम-से-कम 60% हिस्सा शेष न बचा हो, या उसकी समाप्ति तिथि (expiry) में न्यूनतम तीन महीने का समय बाकी न हो—इन दोनों में से जो भी अवधि कम हो, उसे ही आधार माना जाएगा।
    • अनुपालन और निरीक्षण: नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए खाद्य उत्पादों और विनिर्माण इकाइयों का नियमित रूप से निरीक्षण और ऑडिट किया जाता है।
    • प्रमुख पहलें: FSSAI 'ईट राइट इंडिया' आंदोलन का भी नेतृत्व कर रहा है, जिसका उद्देश्य सुरक्षित और संतुलित खान-पान को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही, यह 'अल्ट्रा-प्रोसेस्ड' (अत्यधिक प्रसंस्कृत) खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत पर अंकुश लगाने के लिए 'फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग' (FOPL) विकसित करने पर भी कार्य कर रहा है।

भारत के खाद्य क्षेत्र की मुख्य समस्याएं

  • मिलावट और संदूषण: खाद्य पदार्थों में मिलावट अभी भी जन-स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बनी हुई है। दूध, मसाले, खाद्य तेल और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों जैसी दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुओं में अक्सर रासायनिक रंगों और कृत्रिम रूप से पकाने वाले एजेंटों की मिलावट की जाती है।
    • हाल ही में, राजस्थान सहकारी डेयरी महासंघ ने दूध के 7299 नमूने एकत्र किए, जिनमें से 48.24% नमूनों में पानी की मिलावट पाई गई और 1.41% में रासायनिक संदूषण मिला।
  • जांच से जुड़ी समस्याएं: स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में 266 प्रयोगशालाएं हैं। इनमें से अनेक में भारी धातु, कीटनाशक और जीवाणु संदूषण जैसे अनिवार्य मापदंडों की जांच करने की सुविधाएं मौजूद नहीं हैं
  • निगरानी से जुड़ी समस्या: संसदीय समिति ने पाया कि हाल के वर्षों में किए गए निरीक्षणों में से केवल 2% में ही नियमों का पालन न होने की बात सामने आई। मिलावट के व्यापक प्रमाणों को देखते हुए यह आंकड़ा अवास्तविक प्रतीत होता है। यह कमजोर निगरानी प्रणाली को दर्शाता है।
  • तालमेल का अभाव: FSSAI और अन्य विभागों (जैसे रसायन और पेट्रो रसायन विभाग) के बीच तालमेल की कमी के कारण पैकेजिंग संबंधी नियमों को लागू करने में बाधा होती है।
  • विशाल असंगठित क्षेत्र: भारत में खाद्य उत्पादन और वितरण का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनियमित अनौपचारिक है। इसमें सड़क किनारे ठेले लगाने वाले और छोटे पैमाने के व्यवसाय आदि शामिल हैं। इसके कारण गुणवत्ता की निगरानी करना और सुरक्षा मानकों को लागू करना अत्यधिक कठिन हो जाता है।
  • विनियामकीय उदासीनता: एक कानूनी ढांचा मौजूद होने के बावजूद, FSSAI को गंभीर ढांचागत विफलताओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की भारी कमी भी शामिल है।
  • भ्रामक मार्केटिंग: स्वास्थ्य सप्लीमेंट और न्यूट्रास्यूटिकल बाजार में कई कंपनियां वैज्ञानिक प्रमाण के बिना भ्रामक दावे करती हैं। 
    • उदाहरण के लिए, उपभोक्ताओं को गुमराह करने के लिए "चिकित्सकीय रूप से परीक्षित" (clinically tested), "आयुर्वेदिक", या "कद बढ़ाने वाला" जैसे दावे किए जाते हैं।

निष्कर्ष

भारत के खाद्य क्षेत्र में सुधारों को ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस और प्रभावी विनियमन के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए। इसके लिए प्रवर्तन को मजबूत करना, संस्थागत क्षमता बढ़ाना और असंगठित क्षेत्र को औपचारिक बनाना आवश्यक है। बेहतर मानकों, ट्रेसबिलिटी और उपभोक्ता जागरूकता के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, साथ ही अस्वास्थ्यकर आहार और भ्रामक विज्ञापनों से उत्पन्न स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का समाधान भी जरूरी है।

इसके साथ ही, 'खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना' (PLISFPI) जैसी विकास-उन्मुख पहलें निवेश, नवाचार और संपूर्ण क्षेत्र के सर्वांगीण विकास को बढ़ावा दे सकती हैं। PLISFPI के लिए ₹10,900 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है।

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उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना (PLISFPI)

यह खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एक योजना है, जिसका उद्देश्य निवेश, नवाचार और निर्यात को प्रोत्साहित करना है।

न्यूट्रास्यूटिकल (Nutraceutical)

ये ऐसे खाद्य पदार्थ या उनके भाग होते हैं जिनमें स्वास्थ्य लाभ या चिकित्सा लाभ प्रदान करने की क्षमता होती है, जो सामान्य पोषण से परे होते हैं।

खाद्य सुरक्षा और मानक (आयात) विनियम, 2017

यह विनियम सुनिश्चित करता है कि भारत में आयातित सभी खाद्य पदार्थ भारतीय मानकों के अनुरूप हों और उनकी उपयोग अवधि का पर्याप्त हिस्सा शेष हो।

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