मध्य वर्ग की सुभेद्यता में वृद्धि (Rise in Middle-Class Vulnerability) | Current Affairs | Vision IAS

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मध्य वर्ग की सुभेद्यता में वृद्धि (Rise in Middle-Class Vulnerability)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • रोजगार की कमी, स्थिर वेतन और बढ़ती लागत के कारण भारत मध्यम वर्ग के संकट का सामना कर रहा है, जिससे मांग और स्थिरता प्रभावित हो रही है।
  • भू-राजनीतिक कारक, कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रहना, लैंगिक असमानताएं और कॉरपोरेट एकाधिकार मध्यम वर्ग की भेद्यता को और बढ़ा देते हैं।
  • करों में छूट, आवास योजनाएं और कौशल विकास जैसी सरकारी पहलों का उद्देश्य इन आर्थिक दबावों को कम करना है।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

प्रबल GDP संवृद्धि के बावजूद, मध्य वर्ग का संकट भारत की मांग, स्थिरता और जनांकिकीय लाभांश के लिए खतरा पैदा कर रहा है। इसके अतिरिक्त, बढ़ती भू-आर्थिक अनिश्चितता ने भारत के मध्य वर्ग की सुभेद्यता को और गहरा कर दिया है।

मध्य वर्ग का आर्थिक संकट

  • रोजगार सृजन का अभाव: औपचारिक रोजगार बाजार प्रत्येक वर्ष कार्यबल में शामिल होने वाले 80 लाख नए स्नातकों को अवशोषित करने में विफल रहा है।
    • स्नातकों के लिए बेरोजगारी दर 29.1% है। यह उन लोगों की तुलना में 9 गुना अधिक है जो कभी स्कूल नहीं गए।
  • पारंपरिक रोजगार का क्षरण: स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को तेजी से अपनाने के कारण प्रौद्योगिकीय विस्थापन हो रहा है। इसके चलते लिपिक कार्य और आईटी सेवाओं जैसे नियमित संज्ञानात्मक रोजगार समाप्त हो रहे हैं।
  • स्थिर या गिरती वास्तविक मजदूरी: पिछले दशक (2012-13 से 2023-24) के दौरान, मध्य-आय वाले परिवारों की आय में केवल 0.4% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) देखी गई।
  • जीवन यापन की बढ़ती लागत: आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल जैसे आवश्यक खर्चों में वार्षिक मुद्रास्फीति दहाई अंकों में देखी जा रही है। लगभग 30% भारतीय परिवारों पर कर्ज का बोझ है।
  • आधारभूत संरचना की कमी: बिजली की बार-बार कटौती, अनियमित जल आपूर्ति और अपर्याप्त डिजिटल कनेक्टिविटी के कारण जीवन जीने की छिपी हुई लागत बढ़ जाती है। इसके कारण महंगे निजी बैकअप विकल्पों की आवश्यकता पड़ती है।
    • खराब सड़क अवसंरचना, सार्वजनिक परिवहन की सीमाओं और यातायात जाम के परिणामस्वरूप उत्पादक घंटों का नुकसान होता है।

मध्य वर्ग की बढ़ती सुभेद्यता के अन्य कारण

  • भू-राजनीतिक प्रभाव: पश्चिम एशिया में युद्ध और यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण ऊर्जा एवं उर्वरकों की बढ़ती कमी और खाद्य कीमतों में वृद्धि एक बड़ी आबादी और उनकी आजीविका को बाधित कर सकती है।
  • कल्याणकारी लाभों से बहिष्करण: जहाँ निम्न-आय वर्ग सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से ऊर्ध्व गतिशीलता का अनुभव कर रहा है, वहीं मध्य वर्ग इन सुरक्षा कवचों के लिए अपात्र बना हुआ है। उल्लेखनीय है कि कुल आयकर रिटर्न में मध्य वर्ग का योगदान 53% है।
  • पितृसत्ता और लैंगिक असमानता: लैंगिक वेतन अंतराल और कार्यस्थल पर भेदभाव के साथ-साथ महिला कार्यबल का कम उपयोग परिवारों को एकल-आय के झटकों के प्रति अत्यधिक सुभेद्य बना देता है।
    • विश्व बैंक के अनुसार, वर्ष 2025 के लिए भारत में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 32.4% है, जबकि पुरुषों के लिए यह 77.6% है
  • स्थायी जाति-आधारित आर्थिक स्तरीकरण: यह अवसरों को प्रभावित करना जारी रखता है, जिससे मध्य वर्ग के भीतर भी धन का असमान वितरण होता है।
    • कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, केंद्र सरकार में नियोजित 'समूह C' के 66% से अधिक सफाई कर्मचारी SC, ST या OBC पृष्ठभूमि से आते हैं।
  • कॉर्पोरेट संकेंद्रण: अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने बाजार की शक्ति को कुछ बड़े निगमों के हाथों में संकेंद्रित कर दिया है। इसका प्रभाव पारंपरिक मध्य-वर्गीय उद्यमियों और छोटे व्यवसायियों पर पड़ा है।

मध्यम आय वर्ग

  • परिभाषा
    • यद्यपि मध्यम आय वर्ग की कोई विशिष्ट परिभाषा नहीं है, फिर भी इसे परिभाषित करने के लिए विभिन्न दृष्टिकोण अपनाए गए हैं:
      • आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) क्रय शक्ति समता (PPP) के संदर्भ में उन लोगों को मध्यम आय वर्ग मानता है जिनकी कमाई 10 अमेरिकी डॉलर से 100 अमेरिकी डॉलर प्रति दिन के बीच है।
      • पीपल रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी (PRICE) मध्यम आय वाले परिवार को 5 लाख रुपये से 30 लाख रुपये की वार्षिक आय (2020-21 की कीमतों पर) वाले परिवार के रूप में परिभाषित करता है।
    • अतः, उन्हें ऐसे सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों के रूप में माना जा सकता है जो आर्थिक रूप से सुरक्षित हैं और जिनके गरीबी या सुभेद्यता में गिरने की संभावना बहुत कम होती है।
  • विश्व बैंक की निम्न मध्यम आय वाली गरीबी रेखा: इसके नीचे रहने वाले भारतीयों की हिस्सेदारी एक दशक पहले के 50% से घटकर हालिया अनुमानों में लगभग 30% रह गई है।
    • अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा को चरम गरीबी रेखा भी कहा जाता है। इस रेखा को 2.15 डॉलर से संशोधित कर 3.00 डॉलर कर दिया गया है। वहीं निम्न-मध्यम और उच्च-मध्यम आय वाले देशों के लिए लागू दो अन्य गरीबी रेखाओं को संशोधित करके क्रमशः 3.65 डॉलर से 4.20 डॉलर और 6.85 डॉलर से 8.30 डॉलर कर दिया गया है।

मध्य वर्ग की सुभेद्यता के निहितार्थ

  • आर्थिक परिणाम
    • विकास पर प्रभाव: यह भारत की व्यापक व्यापक-आर्थिक स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरा है, क्योंकि घरेलू उपभोग का लगभग 60% हिस्सा मध्य वर्ग से आता है।
    • बचत और पूंजी में कमी: भारत की शुद्ध घरेलू वित्तीय बचत गिरकर GDP के लगभग 5% के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गई है। इसका मुख्य कारण बढ़ता खुदरा कर्ज और मुद्रास्फीति है, जो अर्थव्यवस्था में पूंजी की आपूर्ति को प्रभावित कर रही है।
    • बढ़ती धन असमानता: मध्य वर्ग का सिकुड़ना अमीर और बाकी आबादी के बीच की खाई को बढ़ा रहा है। शीर्ष 1% आबादी राष्ट्रीय आय के 22% से अधिक हिस्से पर कब्जा रखती है। (वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब)
  • सामाजिक-राजनीतिक परिणाम
    • सामाजिक प्रभाव: चिंता और अवसाद की दवाओं की बिक्री में भारी वृद्धि देखी जा रही है। वित्तीय तनाव का संबंध शहरी पेशेवरों और छात्रों के बीच बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं से काफी हद तक जुड़ रहा है।
      • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय तनाव के कारण आत्महत्याएं 2018 के 4,970 से बढ़कर 2022 में 7,000 से अधिक हो गईं।
    • अवरुद्ध गतिशीलता: वित्तीय बाधाएं बढ़ने पर मध्य-वर्गीय परिवार कठिन समझौते करने को मजबूर हैं, जैसे निवारक स्वास्थ्य देखभाल में देरी करना या निम्न-गुणवत्ता वाली शिक्षा चुनना। यह अगली पीढ़ी के मानव पूंजी विकास के लिए गंभीर खतरा है।
    • प्रतिभा पलायन: सुरक्षित, अच्छी आय वाली नौकरियों की कमी और जीवन की गिरती गुणवत्ता कुशल पेशेवरों को बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश प्रवास के लिए प्रेरित कर रही है। इससे घरेलू अर्थव्यवस्था मूल्यवान प्रतिभाओं से वंचित हो रही है।

मध्य वर्ग की सुभेद्यता कम करने के लिए प्रारंभ की गई सरकारी पहलें

  • प्रत्यक्ष आयकर राहत: केंद्रीय बजट 2025-26 के तहत संशोधित आयकर संरचना के अनुसार, 12 लाख रुपये प्रति वर्ष तक कमाने वाले व्यक्तियों को प्रभावी रूप से आयकर देनदारी से छूट दी गई है।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (PMAY-U 2.0): शहरी गरीब और मध्य-वर्गीय परिवारों के लिए किफायती आवास के निर्माण, खरीद या किराये के लिए इसे शुरू किया गया है।
  • आयुष्मान भारत (AB-PMJAY) का विस्तार: 5 लाख रुपये तक के स्वास्थ्य बीमा का विस्तार अब 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए कर दिया गया है, चाहे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।
  • स्किल इंडिया और पीएम कौशल विकास योजना (PMKVY): यह औद्योगिक मांगों के साथ युवाओं की दक्षताओं को जोड़ने पर केंद्रित है, जिसमें तकनीक और स्वचालन आदि में त्वरित प्रमाणन प्रदान किया जाता है।
  • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY): इसे गैर-कॉर्पोरेट, गैर-कृषि लघु और सूक्ष्म उद्यमियों को आय-सृजन गतिविधियों के लिए आसान, संपार्श्विक-मुक्त सूक्ष्म ऋण प्रदान करने के लिए अभिकल्पित किया गया है।
  • नियामक उपभोक्ता संरक्षण: रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) का प्रवर्तन और स्वामी (SWAMIH) फंड जैसे विशेष निवेश माध्यमों के जरिए रुकी पड़ी आवास परियोजनाओं का समाधान किया जाता है।

आगे की राह

विश्व बैंक के नीति पत्र के सुझाव के अनुसार, एक अधिक समावेशी विकास दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसमें कल्याणकारी विश्लेषण को केवल गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की गिनती करने के बजाय, इस बात को मापने की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए कि लोग जीवन के एक उचित स्तर से कितनी दूर हैं। इसके लिए कल्याण को एक स्पेक्ट्रम के रूप में देखा जाना चाहिए और जो सबसे पीछे हैं उन्हें अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। बहुआयामी सुभेद्यता सूचकांक (Multi-Dimensional Vulnerability Index) जैसे उपकरणों को अपनाकर नीति निर्माता उन लोगों की पहचान कर सकते हैं जो सर्वाधिक जोखिम में हैं और उनके लिए लक्षित हस्तक्षेप तैयार किए जा सकते हैं।

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बहुआयामी सुभेद्यता सूचकांक (Multi-Dimensional Vulnerability Index)

यह एक उपकरण है जो केवल आय या गरीबी रेखा से नीचे होने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, किसी व्यक्ति या समुदाय की विभिन्न आयामों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवन स्तर) में सुभेद्यता का एक व्यापक मूल्यांकन प्रदान करता है, ताकि लक्षित हस्तक्षेपों की पहचान की जा सके।

स्वामी (SWAMIH) फंड

यह 'Special Window for Affordable and Mid-Income Housing' का संक्षिप्त रूप है। यह भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया एक विशेष फंड है जो अटकी हुई या रुकी हुई किफायती और मध्य-आय वाली आवास परियोजनाओं को पूरा करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA)

यह भारत में रियल एस्टेट क्षेत्र को विनियमित करने के लिए स्थापित एक निकाय है, जिसका उद्देश्य खरीदारों के हितों की रक्षा करना, पारदर्शिता बढ़ाना और रियल एस्टेट लेनदेन में जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

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