सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, भारत ने अपना अद्यतन भूकंपीय क्षेत्रीकरण मानचित्र जारी किया है। यह भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा जारी संशोधित भूकंपीय डिजाइन संहिता के अनुरूप है।
भारत के अद्यतन भूकंपीय क्षेत्रीकरण मानचित्र की मुख्य विशेषताएं

- नई भूकंपीय जोखिम श्रेणी (भूकंपीय ज़ोन VI): इसमें संपूर्ण हिमालयी चाप को इसकी उच्च विवर्तनिक गतिविधि और जोखिम के कारण उच्चतम जोखिम श्रेणी में रखा गया है।
- संशोधित जोन मानचित्र संभाव्यता भूकंपीय जोखिम आकलन (Probabilistic Earthquake Hazard Assessment: PEHA) पर आधारित है।
- पहले के मानचित्र में भारत को चार भूकंपीय प्रवण क्षेत्रों (जोन) में वर्गीकृत किया गया था: ज़ोन V (सबसे अधिक सक्रिय भूकंप जोन-कुल का लगभग 11% क्षेत्र); ज़ोन IV (~18% क्षेत्र); ज़ोन III (~30%) और ज़ोन II (सबसे कम भूकंप प्रवण क्षेत्र, शेष क्षेत्र)।
- भूकंप प्रवणता: भारत के 61% (पहले 59%) भू-क्षेत्र को मध्यम से उच्च खतरे वाली भूकंप प्रवण श्रेणियों के अंतर्गत रखा गया है।
- भारत की 75% आबादी भूकंप-सक्रिय क्षेत्रों में रहती है।
- निरंतरता: किसी भी दो भूकंप-प्रवण क्षेत्रों को अलग करने वाली सीमा पर स्थित शहरों को स्वतः ही उच्च जोखिम वाले क्षेत्र (जोन) में शामिल कर दिया जाएगा।
- यह निर्णय प्रशासनिक सीमाओं की बजाय भौगोलिक अवस्थिति के आधार पर क्षेत्रों के भूकंप-जोखिम श्रेणीकरण के अनुरूप है।
- लंबे समय से बिना-दरार वाले भ्रंश खंडों का विवरण: इसमें मध्य हिमालय जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जहां लगभग दो सदियों से सतह में दरार उत्पन्न करने वाला कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है।
- जोखिम कारक: इसमें जनसंख्या घनत्व, अवसंरचना की सघनता और सामाजिक-आर्थिक संकटों को ध्यान में रखा गया है। इसके लिए संभाव्य जोखिम और बहु-आपदा आकलन (PEMA) पद्धति का उपयोग किया गया है, जो केवल भौतिक खतरे ही नहीं बल्कि समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी दर्शाती है।
- गैर-संरचनात्मक हिस्सों के लिए सुरक्षा आवश्यकताएं: यह प्रावधान करता है कि भवन के कुल भार का 1% से अधिक वजन रखने वाले सभी भारी गैर-संरचनात्मक हिस्से (जैसे पैरापेट, ओवरहेड टैंक, विद्युत लाइनें आदि) को मज़बूती से सुरक्षित की जाए।
भूकंप के बारे में

- अर्थ: सामान्य भाषा में भूकंप का अर्थ है पृथ्वी का कंपन। यह एक प्राकृतिक घटना है, जिसमें किसी भ्रंश (fault) से ऊर्जा के निकलने के कारण तरंगें उत्पन्न होती हैं जो सभी दिशाओं में फैलकर भूकंप लाती है।
- भूपर्पटी की शैलों में गहन दरारें ही भ्रंश होती हैं। भ्रंश के दोनों तरफ शैलें विपरीत दिशा में गति करती हैं। जहाँ ऊपर के शैलखंड दबाव डालते हैं, उनके आपस का घर्षण उन्हें परस्पर बाँधे रहता है। फिर भी, अलग होने की प्रवृत्ति के कारण एक समय पर घर्षण का प्रभाव कम हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप शैलखंड विकृत होकर अचानक एक दूसरे के विपरीत दिशा में सरक जाते हैं।
- उद्गम केंद्र और अधिकेंद्र: वह स्थान जहाँ से ऊर्जा निकलती है, भूकंप का उद्गम केन्द्र (Focus) कहलाता है।
- भूतल पर वह बिंदु जो उद्गम केंद्र के समीपतम होता है, अधिकेंद्र (Epicentre) कहलाता है। अधिकेंद्र पर ही सबसे पहले तरंगों को महसूस किया जाता है। अधिकेंद्र उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (90॰ के कोण पर) होता है।
- प्रभाव: अवसंरचना (इमारतों, पुलों, बांधों, संपत्ति आदि) को नुकसान; जानमाल की हानि; अन्य आपदाओं को सक्रिय करना जैसे बाढ़, भूस्खलन, सुनामी (उदाहरण के लिए, हिंद महासागर सुनामी, 2004); मृदा द्रवीकरण (Soil Liquefaction), भूमि का हिलना (Ground lurching) आदि।
- भूकंप का मापन: भूकंप की घटनाओं को झटके की तीव्रता (magnitude) या गहनता (intensity) के आधार पर मापा जाता है।
- रिक्टर स्केल: यह तीव्रता आधारित पैमाना है, जो निर्मुक्त हुई ऊर्जा को मापता है, इसे 0-10 की संख्या में व्यक्त किया जाता है।
- मर्कली स्केल: यह गहनता आधारित मापन है। इसमें 1-12 तक के दृश्य नुकसान (visible damage) का आकलन किया जाता है।
- प्रमुख भूकंपीय घटनाएं: भुज, गुजरात (2001, तीव्रता-7.9); दिल्ली (2025, तीव्रता 4.0); कामचटका प्रायद्वीप, रूस (2025, तीव्रता 8.8); नेपाल (2015, तीव्रता-7.8), आदि।
भूकंप के खतरों से निपटने के लिए उठाए गए कदम
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA): इसका गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। राज्य स्तर पर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया है।
- NDMA का भूकंप जोखिम अनुक्रमण (Earthquake Risk Indexing: ERI) भारतीय शहरों में भूकंप के जोखिमों, प्रवणता और जोखिम का आकलन करके शमन उपायों का मार्गदर्शन करता है।
- राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF): प्राकृतिक और मानव जनित आपदाओं के लिए विशेष कदम उठाने के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत गठित।
- राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS): यह देश भर में भूकंपीय गतिविधियों की निगरानी करता है और भूकंप पूर्व-चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर अनुसंधान करता है।
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM): इसका कार्य मानव संसाधन विकास, प्रशिक्षण, अनुसंधान और आपदा प्रबंधन से संबंधित नीतियों को बढ़ावा देना है।
- अन्य उपाय: भूकंपीय वेधशालाओं की संख्या बढ़ाकर 168 के गई (फरवरी 2025); वास्तविक समय में भूकंप अपडेट के लिए 'भूकंप' (BhooKamp) ऐप, आदि।
भूकंपीय खतरे के प्रभावी प्रबंधन के लिए आगे की राह
- भूकंप-रोधी निर्माण: इमारतों के निर्माण के लिए मानक डिजाइनों में भूकंप-रोधी विशेषताओं को शामिल करना।
- इसके अलावा, किसी भौगोलिक क्षेत्र में स्थित भवनों की भूकंप-रोधी क्षमता को मापा और आँका जा सकता है, विशेषकर प्राथमिकता वाले और जीवनरेखा वाली अवसंरचनाओं (जैसे अस्पताल आदि) के मामले में।
- प्रभावी नियम और इन्हें लागू करना: भवन नक्शा में ऐसी किसी भी छूट की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए जो भूकंप-सुरक्षा मानदंडों का उल्लंघन करे।
- जागरूकता का प्रसार करना: भूकंपीय जोखिम और प्रवणता पर जोर देने के साथ-साथ सभी हितधारकों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों का निर्धारण करने के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।
- प्रतिरोधकता आधारित शहरी विकास: मौजूदा अवसंरचना को मजबूत बनाना (रेट्रोफिटिंग) और नरम तलछट या सक्रिय भ्रंशों पर नए निर्माण को रोकना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत के भूकंपीय जोखिम आकलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देते हुए, यह संशोधित मानचित्र भवनों के डिजाइन और सुरक्षा मानकों में प्रभावी परिवर्तन लाएगा। विशेष रूप से हिमालयी राज्यों में यह बदलाव अधिक सुरक्षित निर्माण को बढ़ावा देगा और SDG-9 (उद्योग, नवाचार और अवसंरचना) तथा SDG-11 (सतत शहर और समुदाय) की प्राप्ति में मदद करेगा।