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शहरी जल प्रशासन (Urban Water Governance)

01 Mar 2026
1 min

In Summary

  • इंदौर में दूषित नल के पानी का संकट शहरी जल प्रशासन की कमजोरियों को उजागर करता है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग (एनएचआरसी) ने पाइपलाइन संबंधी समस्याओं और रोगाणुओं की उपस्थिति का उल्लेख किया है।
  • शहरी जल प्रशासन को मांग-आपूर्ति के अंतर, खंडित संस्थाओं, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे, जलवायु प्रभावों और अपशिष्ट जल उपचार संबंधी मुद्दों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • जल जीवन मिशन (शहरी) और अमृत 2.0 जैसी पहलों का उद्देश्य एकीकृत योजना और बुनियादी ढांचे के उन्नयन के लिए नीतिगत सिफारिशों के साथ-साथ शहरी जल प्रबंधन में सुधार करना है।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में इंदौर में नगर निगम के नल से दूषित जल के कारण उत्पन्न स्वास्थ्य संकट ने शहरी शासन व्यवस्था, विशेषकर शहरी जल प्रबंधन प्रणाली की संवेदनशीलता और कमजोरियों को उजागर किया है।

अन्य संबंधित तथ्य

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इंदौर की इस घटना का स्वतः संज्ञान लिया है।
    • NHRC ने उल्लेख किया कि जिस मुख्य पाइपलाइन से पेयजल की आपूर्ति की जा रही थी, वह एक 'सार्वजनिक शौचालय' के नीचे से गुजर रही थी, जिसके कारण जल की गुणवत्ता प्रभावित हुई।
  • दूषित नल जल में अनेक हानिकारक रोगजनक पाए गए हैं, जिनमें ई-कोलाई, साल्मोनेला तथा विब्रियो कोलेरी जैसे जीवाणु के साथ ही विषाणु, कवक और प्रोटोजोआ शामिल थे। जिससे रोगियों के शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया और सेप्सिस की स्थिति उत्पन्न हो गई।

शहरी जल प्रशासन के बारे में

  • जल आपूर्ति संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य सूची का विषय है।
    • जल आपूर्ति प्रणाली की योजना, परिकल्पना, वित्तपोषण, क्रियान्वयन, संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारी राज्य सरकार/शहरी स्थानीय निकायों की होती है।
    • 74वें संविधान संशोधन अधिनियम ने नगरपालिकाओं को व्यापक दायित्व प्रदान किए, जिनमें भूमि विनियमन, जलापूर्ति, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण शामिल हैं।
  • राष्ट्रीय स्तर पर, केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय अमृत और अमृत 2.0 जैसी योजनाओं के माध्यम से शहरी जल अवसंरचना की देखरेख करता है।
  • भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने भारत में पेयजल गुणवत्ता हेतु मानक निर्धारित किए हैं, जिन्हें IS-10500:2012 के अंतर्गत विनिर्दिष्ट किया गया है।
    • IS-10500 में पेयजल में विभिन्न तत्वों की स्वीकार्य सीमा निर्धारित की गई है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं -
      • भारी धातुएं (जैसे आर्सेनिक),
      • जल का pH मान,
      • मैलापन (Turbidity),
      • कुल घुलित ठोस (TDS) तथा 
      • रंग और गंध।
    • BIS के अनुसार जल को पेय योग्य नहीं माना जाएगा यदि—
      • वह जीवाणुजन्य रूप से दूषित हो (विशेषकर संकेतक जीवाणु जैसे ई-कोलाई, विषाणु आदि की उपस्थिति हो), अथवा
      • रासायनिक संदूषण अधिकतम स्वीकार्य सीमा से अधिक हो: (उदाहरण के लिए अतिरिक्त फ्लोराइड [>1.5 mg/l],  TDS [>2,000 mg/l], लौह तत्व [>0.3 mg/l],  मैंगनीज [>0.3 mg/l],  आर्सेनिक [>0.05 mg/l], नाइट्रेट्स [>45 mg/l] आदि।)

शहरी जल प्रशासन से संबंधित चुनौतियां

  • मांग-आपूर्ति अंतराल : तेजी से बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण उपलब्ध जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, जिससे शहरी जल प्रशासन और उसकी स्थिरता पर गंभीर संकट उत्पन्न हो रहा है।
    • नीति आयोग के संयुक्त जल प्रबंधन सूचकांक (2018) के अनुसार, दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई सहित 21 प्रमुख शहरों के वर्ष 2020 तक भूजल समाप्त होने की आशंका व्यक्त की गई थी, जिससे लगभग 10 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते थे।
  • खंडित संस्थागत तंत्र : अनेक एजेंसियों की भागीदारी, अधिकार क्षेत्र का अतिव्यापन तथा समन्वय की कमी, शहरों में समेकित जल प्रशासन को बाधित करती है।
    • उदाहरण: गुरुग्राम में लोक निर्माण विभाग (PWD), नगर निगम, गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण आदि विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत सेवाएं प्रदान करते हैं।
  • अपर्याप्त अवसंरचना: पुरानी पाइपलाइनें, रिसाव और गैर-राजस्व जल (NRW) की उच्च मात्रा (प्रायः 30–50%) प्रभावी आपूर्ति को कम करती है तथा परिचालन लागत में वृद्धि करती है।
    • यह अनुमान है कि भारत की लगभग 38% जल आपूर्ति गैर-राजस्व जल के कारण नष्ट हो जाती है।
    • गैर-राजस्व जल से आशय उस उपचारित जल से है जो वितरण प्रणाली में भेजा जाता है, परंतु उपभोक्ता तक पहुंचने से पूर्व ही नष्ट हो जाता है। यह भौतिक हानियों (रिसाव, वितरण हानि) या प्रत्यक्ष हानियों (चोरी, बिना मीटर उपयोग, या त्रुटिपूर्ण बिलिंग) के माध्यम से हो सकता है।
  • जलवायु समुत्थानशीलता: शहरी जल प्रशासन प्रायः जलवायु प्रभावों (जैसे अनियमित वर्षा और सूखा) को एकीकृत करने से विफल रहता है, जिससे जल प्रणालियां कमजोर हो जाती हैं, बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है तथा वे विशेषकर अल्प वर्षा काल में दबाव सहन करने में असमर्थ रहती हैं।
    • उदाहरण: 2019 का चेन्नई जल संकट, जहां सभी चार मुख्य जलाशय सूख गए थे, और 2024 का बेंगलुरु जल संकट।
  • अपशिष्ट जल उपचार: शहरी भारत में अधिकांश अपशिष्ट जल बिना उपचार के ही छोड़ा जाता है, जिससे प्रदूषण का स्तर बढ़ता है और सुरक्षित जल की उपलब्धता घटती है। उदाहरण: नई दिल्ली में यमुना नदी में उच्च स्तर का प्रदूषण।
  • भूजल पर अत्यधिक निर्भरतापर्याप्त और नियमित पाइपलाइन जल आपूर्ति के अभाव में भारतीय शहर तेजी से अत्यधिक दोहन किए गए भूजल पर निर्भर होते जा रहे हैं। इससे भूजल स्तर में कमी आ रही है तथा परिवारों को टैंकर और बोरवेल जैसे स्रोतों पर निर्भर होना पड़ रहा है। परिणामस्वरूप शहरी क्षेत्रों में जल असुरक्षा बढ़ रही है और जल तक असमान पहुंच की समस्या और गंभीर हो रही है।

शहरी जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए की गई पहलें 

  • जल जीवन मिशन (शहरी): यह मिशन सतत विकास लक्ष्य-6 (SDG-6) के अनुरूप देश के सभी 4,378 वैधानिक नगरों में प्रत्येक परिवार को कार्यात्मक नल कनेक्शन के माध्यम से सार्वभौमिक जल आपूर्ति सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखता है।
  • अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT) 2.0 : इसमें वर्षा जल संचयन के लिए स्टॉर्म-वाटर ड्रेन के माध्यम से जल निकायों में जल पहुंचाने और 'जलभृत प्रबंधन योजना' के माध्यम से भूजल पुनर्भरण की रणनीतियां शामिल हैं।
    • इसके तहत, जल की गुणवत्ता, मात्रा और कवरेज पर शहरों का मूल्यांकन करने के लिए एक प्रतिस्पर्धी मूल्यांकन के रूप में 'पेय जल सर्वेक्षण' शुरू किया गया था।
  • जल शक्ति अभियान: कैच द रेन (JSA: CTR) अभियान : वर्ष 2019 में जनभागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु प्रारंभ किया गया।
  • राष्ट्रीय जल नीति (2012): यह वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण तथा वर्षा जल के प्रत्यक्ष उपयोग द्वारा जल उपलब्धता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल देती है।
  • नमामि गंगे कार्यक्रम: यह प्रदूषण के प्रभावी उन्मूलन, संरक्षण और राष्ट्रीय नदी गंगा के कायाकल्प के दोहरे उद्देश्यों वाला एकीकृत संरक्षण मिशन है। 

आगे की राह

  • मांग-आपूर्ति अंतराल को पाटना : 'एकीकृत शहरी जल प्रबंधन' को अपनाएं, जिसमें मांग प्रबंधन (मीटर लगाना, तर्कसंगत मूल्य निर्धारण) और आपूर्ति के लिए वर्षा जल संचयन, उपचारित अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग तथा स्थानीय जल निकायों का कायाकल्प शामिल हो, ताकि सीमित ताजे जल के स्रोतों पर दबाव कम हो सके।
  • संस्थागत तंत्र शहर स्तर पर एक एकल जल प्राधिकरण का गठन किया जाए, जिसमें जलापूर्ति, सीवरेज तथा स्टॉर्म-वॉटर प्रबंधन के लिए स्पष्ट दायित्व निर्धारित हों, ताकि विभिन्न अधिकार क्षेत्रों में बेहतर समन्वय, जवाबदेही और एकीकृत योजना सुनिश्चित हो सके।
  • अवसंरचना सुधार : पुरानी पाइपलाइनों का आधुनिकीकरण, रिसाव पता लगाने वाली तकनीकों (दाब परीक्षण, ध्वनिक रिसाव पहचान, भू-भेदी रडार आदि) का उपयोग तथा नियमित जल लेखा-अंकेक्षण के माध्यम से गैर-राजस्व जल को कम किया जाए और दक्षता एवं वित्तीय स्थिरता बढ़ाई जाए।
  • जलवायु समुत्थानशीलता प्रणाली: शहरी जल योजना में जलवायु जोखिमों को समाहित किया जाए तथा झीलों की बहाली, बाढ़-मैदान संरक्षण और विकेंद्रीकृत जल भंडारण जैसे प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ावा देकर सूखा एवं बाढ़ के प्रति समुत्थानशीलता विकसित की जाए।
  • अपशिष्ट जल उपचार और पुन: उपयोग: सीवेज उपचार क्षमता का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना और शहरी जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए गैर-पेय उद्देश्यों हेतु उपचारित अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग को अनिवार्य बनाना।
  • भूजल पर अत्यधिक निर्भरता में कमी: भूजल दोहन को विनियमित किया जाए, पुनर्भरण और भंडारण को प्रोत्साहित किया जाए तथा विश्वसनीय पाइपलाइन जल आपूर्ति सुनिश्चित कर बोरवेल और टैंकर पर निर्भरता कम की जाए।
  • 3Ps {नीति (Policy), लोग (People), स्थान (Place)} ढांचे को मजबूत करना: विभिन्न क्षेत्रों में नीतियों को समन्वित करके, लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करके तथा शहरों और उनके आसपास के जल स्रोत क्षेत्रों के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर संधारणीय और न्यायसंगत जल प्रबंधन सुनिश्चित किया जाए।

निष्कर्ष 

लोक स्वास्थ्य, पर्यावरणीय संधारणीयता और समावेशी शहरी विकास के लिए शहरी जल प्रशासन को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है। संस्थागत सुधारों, अवसंरचना आधुनिकीकरण और सामुदायिक सहभागिता के समन्वय से भारत अपने शहरी जल तंत्र को एक कमजोर सेवा प्रदाता से बदलकर एक सशक्त, संधारणीय और न्यायसंगत शहरी जीवन के आधार में परिवर्तित कर सकता है।

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3Ps {नीति (Policy), लोग (People), स्थान (Place)} ढांचा

यह शहरी जल प्रबंधन के लिए एक सहयोगी ढांचा है जो प्रभावी नीतियों के निर्माण, सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने और स्थानीय जल स्रोतों एवं भौगोलिक विशेषताओं को ध्यान में रखने पर जोर देता है।

प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions)

पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने के लिए प्रकृति की शक्ति का उपयोग करने वाले दृष्टिकोण, जैसे कि वनीकरण, आर्द्रभूमि बहाली, और स्थायी कृषि। ये कार्बन को अवशोषित करने में मदद करते हैं।

जल लेखा-अंकेक्षण (Water Audit)

यह किसी जल वितरण प्रणाली में जल की मात्रा का व्यवस्थित रूप से मूल्यांकन करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य जल की हानियों, विशेषकर गैर-राजस्व जल का पता लगाना और उन्हें कम करना है।

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