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श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन (WORKERS PROTESTS)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • कारखाने के श्रमिकों द्वारा हाल ही में किए गए विरोध प्रदर्शनों ने अनियंत्रित संविदाकरण, अनौपचारिकता और श्रम कानूनों में नियामक विफलताओं जैसे मुद्दों को उजागर किया है।
  • सरकारी सुधारों में कानूनों को चार संहिताओं में समेकित करना, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार करना और निश्चित अवधि के रोजगार की शुरुआत करना शामिल है।
  • वेतन वृद्धि को लागू करने में चुनौतियां बनी हुई हैं, प्रावधानों के संचालन में देरी हो रही है और श्रम संहिताओं के लिए राज्य स्तर पर असमान अधिसूचनाएं जारी की जा रही हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, भारत के बरौनी (बिहार), सूरत (गुजरात), मानेसर (हरियाणा) तथा नोएडा (उत्तर प्रदेश) जैसे प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में फैक्ट्री श्रमिकों द्वारा हुए स्वतःस्फूर्त तथा कुछ मामलों में हिंसात्मक प्रदर्शनों ने गंभीर चिंताएं उत्पन्न की हैं।

भारत में श्रमिक प्रदर्शनों के प्रमुख कारण

  • अनियंत्रित संविदाकरण: वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के अनुसार, संचालन लागत को कम करने के उद्देश्य से नियोक्ताओं ने थर्ड-पार्टी श्रम व्यवस्था को व्यापक रूप से अपनाया है। इसके परिणामस्वरूप विनिर्माण क्षेत्र में संविदा श्रमिकों की हिस्सेदारी 2023–24 में बढ़कर 42 प्रतिशत हो गई है।
  • अनौपचारिक क्षेत्रक का व्यापक विस्तार: भारत में 90 प्रतिशत से अधिक श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्रक में कार्यरत हैं। इनमें अधिकांश लघु, अपंजीकृत उद्यमों में कार्य करते हैं, जहां सामाजिक सुरक्षा का लगभग अभाव है।
    • ई-श्रम सर्वेक्षण के अनुसार, केवल अनौपचारिक गैर-कृषि क्षेत्र में ही 15 करोड़ से अधिक श्रमिक कार्यरत हैं, और महामारी के पश्चात यह क्षेत्र निरंतर विस्तृत हो रहा है।
  • श्रम कानूनों से संबंधित समस्याएं: वेतन संहिता राष्ट्रीय आधार वेतन तथा राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की व्यवस्था तो करती है, किंतु इनके निर्धारण हेतु कोई स्पष्ट कार्यप्रणाली प्रदान नहीं करती।
  • नियामकीय विफलता: 2023–24 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 64 प्रतिशत श्रमिक विधिक रूप से निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम आय प्राप्त करते हैं।
  • ट्रेड यूनियनों से संबंधित समस्याएं: एक ही उद्योग में अनेक ट्रेड यूनियनों का अस्तित्व उनके बीच प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करता है। इससे श्रमिक हितों का प्रभावी प्रतिनिधित्व बाधित होता है।

श्रमिक कल्याण हेतु सरकार द्वारा किए गए प्रमुख सुधार

  • श्रम कानूनों का सरलीकरण: सरकार ने 29 श्रम कानूनों को समेकित कर चार व्यापक श्रम संहिताओं में परिवर्तित किया है।
  • सामाजिक सुरक्षा: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अंतर्गत गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों को शामिल किया गया है। इससे एग्रीगेटर कंपनियों को अपने वार्षिक कारोबार का 1–2 प्रतिशत योगदान देना अनिवार्य किया गया है (जो ऐसे श्रमिकों को किए गए भुगतान के 5 प्रतिशत तक सीमित है)।
  • रोजगार की शर्तें: औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 अत्यधिक संविदाकरण को कम करने के उद्देश्य से निश्चित अवधि रोजगार की व्यवस्था प्रदान करती है तथा 51 प्रतिशत सदस्यता वाली ट्रेड यूनियन को वार्ता यूनियन के रूप में मान्यता देती है।
  • श्रमिक अधिकार एवं सुरक्षित कार्य परिस्थितियां : व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियां संहिता, 2020 असंगठित श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस की व्यवस्था प्रदान करती है तथा कार्यस्थल पर चोट अथवा मृत्यु की स्थिति में पीड़ित को क्षतिपूर्ति का प्रावधान करती है।
  • सार्वभौमिक न्यूनतम वेतन: वेतन संहिता, 2019 संगठित एवं असंगठित दोनों क्षेत्रों के श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन को वैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित करती है।
    • इससे पूर्व, न्यूनतम वेतन अधिनियम केवल अनुसूचित रोजगारों पर लागू होता था। इसके अंतर्गत लगभग 30 प्रतिशत श्रमिक ही आते थे।
  • ई-श्रम पोर्टल: यह एक केंद्रीकृत डेटाबेस है, जो असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के पंजीकरण तथा उन्हें विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच प्रदान करने में सहायक है।
  • "वन नेशन वन राशन कार्ड" (ONORC) योजना: यह योजना प्रवासी श्रमिकों एवं उनके परिवार के सदस्यों को देश के किसी भी उचित मूल्य की दुकान से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के लाभ प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करती है, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
  • मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017: इस अधिनियम के माध्यम से भारत में कार्यरत माताओं के लिए सवेतन मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया गया है, बशर्ते उनके दो तक जीवित बच्चे हों।
  • शी-बॉक्स पोर्टल: यह कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के पंजीकरण एवं निगरानी हेतु एक केंद्रीकृत मंच है।

हालिया श्रम सुधारों से संबंधित प्रमुख समस्याएं

  • वेतन वृद्धि के वादों को पूरा करने में विफलता: यद्यपि वेतन संहिता का उद्देश्य राष्ट्रीय आधार वेतन के माध्यम से वेतन असमानता को कम करना है, किंतु न्यूनतम वेतन में अपेक्षित वृद्धि व्यवहारिक स्तर पर अभी तक प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाई है।
  • प्रावधानों के क्रियान्वयन में विलंब: विशेष रूप से गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों से संबंधित प्रावधानों, जैसे, सक्रिय सामाजिक सुरक्षा कोष की स्थापना, अंशदान दरों की अधिसूचना तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अंतर्गत ठोस लाभकारी योजनाओं के निर्माण में विलंब देखा गया है।
  • छंटनी की उच्च सीमा: छंटनी अथवा सेवा-समापन से पूर्व सरकारी स्वीकृति की सीमा 100 श्रमिकों से बढ़ाकर 300 श्रमिक कर दी गई है। इससे कंपनियों के लिए कर्मचारियों को हटाना अपेक्षाकृत आसान हो गया है।
  • हड़ताल संबंधी कठोर शर्तें: नई व्यवस्था के अंतर्गत वैध हड़ताल आयोजित करना अत्यंत कठिन बना दिया गया है, क्योंकि सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों में हड़ताल से पूर्व 14 दिनों का नोटिस देना अनिवार्य कर दिया गया है।
  • राज्य स्तर पर असमान अधिसूचना: चूंकि श्रम समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए श्रम संहिताओं के पूर्ण प्रभावी क्रियान्वयन हेतु केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारों द्वारा अपने-अपने नियमों की अधिसूचना आवश्यक है। विभिन्न राज्यों में इस प्रक्रिया की असमान प्रगति के कारण श्रम सुधारों का कार्यान्वयन प्रभावित हो रहा है।

आगे की राह

  • सुदृढ़ तृतीय पक्ष संवाद की पुनर्स्थापना: 1976 में अपनाए गए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के त्रिपक्षीय परामर्श अभिसमय (No. 144) की तर्ज पर भारतीय श्रम सम्मेलन को पुनर्जीवित एवं संस्थागत रूप प्रदान किया जाना चाहिए। इस सम्मेलन की नियमित बैठकें लंबे समय से नहीं हुई हैं (अंतिम बैठक 2015 में हुई थी) ताकि केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, नियोक्ताओं तथा सरकार के बीच संवाद को प्रोत्साहित कर सकता है।
  • वेतन नीति का संतुलित निर्धारण: वास्तविक मजदूरी में हो रही कमी का समाधान करने के लिए, सरकार को ऐसा बाध्यकारी किंतु व्यावहारिक राष्ट्रीय आधार वेतन निर्धारित करना चाहिए। इसे जीवन-यापन की क्षेत्रीय लागत तथा विभिन्न क्षेत्रों की उत्पादकता में अंतर के अनुकूल होना चाहिए।
    • वर्ष 2018 की अनूप सतपथी समिति द्वारा राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन संबंधी अनुशंसित कार्यप्रणाली को मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए आवश्यक संशोधनों सहित लागू किया जा सकता है।
  • शासन व्यवस्था में श्रमिकों की भागीदारी: कॉरपोरेट प्रशासन में श्रमिकों की संस्थागत भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जर्मनी के सह-निर्णय एवं वर्क्स काउंसिल मॉडल को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
  • प्रभावी आंकड़ा संग्रहण व्यवस्था: एकीकृत राष्ट्रीय श्रम डेटाबेस का विकास, रियल टाइम अनुपालन निगरानी तथा कार्यस्थल सुरक्षा संबंधी आंकड़ों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने से जवाबदेही बढ़ेगी और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • सुदृढ़ प्रवर्तन एवं डिजिटल एकीकरण: सरकार को डिजिटल अनुपालन प्रणालियों में व्यापक निवेश करना चाहिए। इसमें अनिवार्य डिजिटल वेतन भुगतान तथा इलेक्ट्रॉनिक रोजगार रिकार्ड्स की व्यवस्था शामिल हो।
  • श्रमिकों की कार्य परिस्थितियों में सुधार: 8 घंटे के कार्यदिवस का कठोर पालन, ओवरटाइम हेतु दोगुना वेतन, समान कार्य के लिए समान वेतन तथा बेहतर कार्य परिस्थितियों को प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिए।
  • बढ़ते संविदाकरण की समस्या का समाधान: भारत, डेनमार्क के "फ्लेक्सिक्योरिटी" मॉडल को अपनाने पर विचार कर सकता है। यह मॉडल नियोक्ताओं के लिए श्रम बाजार में उच्च लचीलापन (प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने हेतु नियुक्ति एवं सेवा-समापन में सरलता) तथा श्रमिकों के लिए सुदृढ़ सामाजिक सुरक्षा (उच्च बेरोजगारी लाभ आदि) का समन्वय प्रस्तुत करता है।

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फ्लेक्सिक्योरिटी (Flexicurity)

यह एक डेनिश मॉडल है जो श्रम बाजार में उच्च लचीलापन (नियोक्ताओं के लिए नियुक्ति और सेवा-समापन में सरलता) और श्रमिकों के लिए सुदृढ़ सामाजिक सुरक्षा (उच्च बेरोजगारी लाभ) का समन्वय प्रस्तुत करता है।

वर्क्स काउंसिल (Works Council)

यह भी एक जर्मन मॉडल है जो एक कंपनी के कर्मचारियों के प्रतिनिधियों को प्रबंधन के साथ बातचीत करने और कुछ निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति देता है।

सह-निर्णय (Co-determination)

यह एक जर्मन मॉडल है जो कॉर्पोरेट प्रशासन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करता है, जहाँ श्रमिक प्रबंधन बोर्डों में प्रतिनिधित्व प्राप्त करते हैं।

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