बायोफार्मा शक्ति (Biopharma SHAKTI) | Current Affairs | Vision IAS

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बायोफार्मा शक्ति (Biopharma SHAKTI)

31 Mar 2026
1 min

In Summary

  • केंद्रीय बजट 2026-27 में भारत को वैश्विक जैव-विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए बायोफार्मा शक्ति परियोजना शुरू की गई, जिसके लिए 5 वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है।
  • इस योजना का उद्देश्य बायोफार्मा इकोसिस्टम का निर्माण करना, एनआईपीईआर को उन्नत बनाना, क्लिनिकल ट्रायल साइटों को मान्यता देना और सीडीएससीओ को मजबूत करना है।
  • भारत की जैव अर्थव्यवस्था जैव-फार्मा (35%) के नेतृत्व में 2024 तक 165.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ गई, हालांकि इसे नियामक बाधाओं और अनुसंधान एवं विकास लागत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

In Summary

सुर्खियों में क्यों? 

केंद्रीय बजट 2026-27 में 'बायोफार्मा शक्ति/ Biopharma SHAKTI (ज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा विकास के लिए रणनीति)' की घोषणा की गई थी। यह पहल भारत को वैश्विक जैव-विनिर्माण हब के रूप में स्थापित करने पर केंद्रित है।

बायोफार्मा शक्ति योजना के बारे में

  • उद्देश्य: भारत को बायोफार्मास्यूटिकल विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाना। इसका मुख्य ध्यान 'बायोलॉजिक्स' और 'बायोसिमिलर्स' के घरेलू उत्पादन के लिए एक मजबूत तंत्र तैयार करने पर है।
    • बायोलॉजिक्स: ये वे दवाएं हैं, जो प्राकृतिक और जीवित स्रोतों जैसे पशु, पादप कोशिकाओं और सूक्ष्मजीवों से बनाई जाती हैं।
      • इनमें टीके, रक्त और रक्त के घटक, दैहिक कोशिकाएं, जीन थेरेपी, प्रोटीन आदि शामिल हैं।
    • बायोसिमिलर्स: ये दवाएं बायोलॉजिक्स की ही नकल होती हैं। ये मूल जैविक उत्पाद के समान ही प्रभावशाली होती हैं और इनमें कोई महत्वपूर्ण चिकित्सकीय अंतर नहीं होता है।
  • वित्त-पोषण: अगले 5 वर्षों के लिए ₹ 10,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
  • रणनीति:
    • 3 नए राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (NIPER) स्थापित किए जाएंगे तथा 7 मौजूदा संस्थाओं को अपग्रेड किया जाएगा।
    • पूरे देश में 1,000 से अधिक मान्यता प्राप्त नैदानिक (क्लिनिकल) परीक्षण केंद्रों का एक नेटवर्क तैयार किया जाएगा।
    • केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत बनाया जाएगा। इसके लिए विशेषज्ञों और एक समर्पित वैज्ञानिक समीक्षा संवर्ग (कैडर) की नियुक्ति की जाएगी, ताकि दवाओं की मंजूरी में लगने वाला समय कम हो सके।

बायोफार्मा और बायोइकोनॉमी (जैव-अर्थव्यवस्था) के बारे में

  • परिभाषा: बायोफार्मा या बायोफार्मास्युटिकल्स में मानव कोशिकाओं, कवक, या सूक्ष्मजीवों जैसे जैविक जीवों के माध्यम से उपचारों का उत्पादन, विनिर्माण या निष्कर्षण शामिल है।
    • उदाहरण: वर्तमान में व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली कुछ आधुनिक दवाएं बायोफार्मा के अंतर्गत आती हैं। इनमें टीके, एंटीबॉडी उपचार, जीन थेरेपी, कोशिका प्रत्यारोपण, आधुनिक इंसुलिन और रिकॉम्बिनेंट प्रोटीन दवाएं शामिल हैं।
    • बायोफार्मास्युटिकल्स वे औषधीय उत्पाद हैं जिन्हें जैव प्रौद्योगिकी तकनीकों का उपयोग करके तैयार किया जाता है।
  • बायोफार्मा, जैव-अर्थव्यवस्था नामक बड़े आर्थिक क्षेत्रक का एक उप-क्षेत्रक है।
    • जैव-अर्थव्यवस्था में भोजन, ऊर्जा और औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन के लिए पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों जैसे नवीकरणीय संसाधनों का उपयोग किया जाता है।
      • भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2014 के 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में 165.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई है। इसका लक्ष्य 2030 तक 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचना है।
      • यह राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 4.25% का योगदान देती है।
      • भारत की जैव-अर्थव्यवस्था चार प्रमुख उप-क्षेत्रकों द्वारा संचालित है: बायो-इंडस्ट्रियल (47%), बायोफार्मा (35%), बायो-एग्री (8%), और बायो-रिसर्च (9%)।

भारत में बायोफार्मास्युटिकल उद्योग की चुनौतियां

  • जटिल नियामक बाधाएं
    • एकाधिक एजेंसियां: यह उद्योग CDSCO और विभिन्न राज्य औषधि नियंत्रण प्राधिकरणों सहित कई एजेंसियों द्वारा शासित होता है, जहाँ नियामक अनुमोदन प्रक्रियाएं धीमी हैं।
    • अंतर्राष्ट्रीय अनुपालन: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, US FDA और यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (EMA) जैसे निकायों के कड़े मानकों को पूरा करना, संसाधन-गहन और समय लेने वाला है।
  • उच्च अनुसंधान एवं विकास (R&D) लागत: भारत में एक नई दवा विकसित करने में 800 मिलियन डॉलर तक की लागत आ सकती है और इसमें 8-10 वर्ष का समय लग सकता है।
  • आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियां: उद्योग मुख्य रूप से चीन से आयातित सक्रिय औषध सामग्रियों (Active Pharmaceutical Ingredients: APIs) पर अत्यधिक निर्भर है, जो इस उद्योग को भू-राजनीतिक तनाव या वैश्विक संकटों के प्रति संवेदनशील बनाता है।
  • पेटेंट विवाद: पेटेंट अधिकारों और पेटेंट "एवरग्रीनिंग" को लेकर बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के साथ अक्सर संघर्ष होते रहते हैं, जिससे महंगी और समय लेने वाली कानूनी लड़ाई होती है।
    • एवरग्रीनिंग दवा कंपनियों द्वारा उपयोग की जाने वाली एक रणनीति है जिसके माध्यम से वे समाप्ति के करीब पहुँच रहे ब्रांड-नाम वाली दवाओं के पेटेंट संरक्षण अवधि को बढ़ाते हैं, अक्सर मूल उत्पाद में मामूली और गैर-जरूरी संशोधन करके ऐसा किया जाता है।
  • मूल्य नियंत्रण: राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (National List of Essential Medicines: NLEM) पर आधारित औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) के माध्यम से आवश्यक दवाओं पर सरकार द्वारा लगाई गई मूल्य सीमा (Price caps) लाभप्रदता को सीमित करती है और नए शोध को प्रभावित करती है।

बायोफार्मास्युटिकल्स को बढ़ावा देने के लिए की गई पहलें

  • राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन (NBM) – इनोवेट इन इंडिया (i3): यह विश्व बैंक द्वारा सह-वित्तपोषित है और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के तहत जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) द्वारा कार्यान्वित किया गया है।
    • यह नए टीकों, बायो-थेराप्यूटिक्स, डायग्नोस्टिक्स और चिकित्सा उपकरणों के विकास पर केंद्रित है।
  • फार्मास्युटिकल्स के लिए उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना: यह महत्वपूर्ण सक्रिय औषध सामग्रियों (APIs), चिकित्सा उपकरणों आदि के घरेलू निर्माण को प्रोत्साहित करती है।
  • बल्क ड्रग पार्कों को बढ़ावा देना: ₹3,000 करोड़ के परिव्यय के साथ, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश में तीन विश्व स्तरीय बल्क ड्रग पार्क विकसित किए जा रहे हैं।
  • फार्मा-मेडटेक में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा (PRIP) योजना: बायोसिमिलर्स आदि में शुरुआती और बाद के चरण के अनुसंधान एवं विकास (R&D) को वित्तपोषित करने के लिए 2023 में शुरू की गई।
  • BioE3 नीति: जलवायु, भोजन और स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए बायोमैन्युफैक्चरिंग, बायो-AI हब और बायोफाउंड्री स्थापित करने पर केंद्रित है।
  • नियामक सुधार: पूंजी और तकनीक को आकर्षित करने के लिए, सरकार ग्रीनफील्ड फार्मास्युटिकल परियोजनाओं के लिए स्वचालित मार्ग के माध्यम से 100% FDI और ब्राउनफील्ड परियोजनाओं के लिए 74% तक की अनुमति देती है।

आगे की राह

  • विशिष्ट उपचारों (Niche Therapies) को लक्षित करना: भारतीय बायोफार्मा देश की बढ़ती AI और जीनोमिक क्षमताओं का लाभ उठाते हुए दुर्लभ और 'ऑर्फन ड्रग्स' (orphan drugs) जैसे उच्च-मूल्य और कम सेवा वाले बाजारों की ओर रुख कर सकता है।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) प्रोत्साहन: ब्राजील और चिली के समान, भारत को विशेष रूप से उन बहुराष्ट्रीय उद्यमों के लिए लक्षित प्रोत्साहन देना चाहिए जो जैव प्रौद्योगिकी जैसे उन्नत अनुसंधान एवं विकास रणनीतिक क्षेत्रों की स्थापना कर रहे हैं।
  • निजी क्षेत्रक की भागीदारी: अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) और अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) कोष का उपयोग निजी R&D को आकर्षित करने, उन्हें रणनीतिक दिशा प्रदान करने और अनुसंधान को बड़े पैमाने पर औद्योगिक क्षमता में बदलने के लिए किया जा सकता है।
  • फास्ट-ट्रैक लाइसेंसिंग: वियतनाम के "डिक्री 19" का अनुसरण किया जा सकता है, जो उच्च तकनीक वाले उद्योगों के लिए लाइसेंसिंग को सरल बनाने हेतु विशेष निवेश प्रक्रियाएं स्थापित करता है।
  • साझा बुनियादी ढांचा: भारत ट्रांसलेशनल रिसर्च सेंटर्स (TRCs) को साझा राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में स्थापित कर सकता है और उनका लाभ उठा सकता है।

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Translational Research Centers (TRCs)

Centers focused on translating research findings into practical clinical applications. Establishing and leveraging TRCs as shared national assets can benefit the biopharmaceutical sector.

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Pharmaceuticals developed for rare diseases that affect a small number of people. These drugs may have limited commercial viability due to a small patient population, often requiring government incentives for development.

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Production Linked Incentive Scheme, a government initiative designed to boost domestic manufacturing and exports by providing incentives to companies based on their incremental sales of manufactured goods.

Title is required. Maximum 500 characters.

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