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संक्षिप्त समाचार

01 Mar 2026
6 min

राष्ट्रपति द्वारा 131 पद्म पुरस्कारों के वितरण को मंजूरी प्रदान की गई।

  • इसमें 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्मश्री पुरस्कार शामिल हैं।
  • पुरस्कार प्राप्त करने वालों में 19 महिलाएं, विदेशी /NRI/ PIO/ OCI श्रेणी के 6 लोग और 16 मरणोपरांत पुरस्कार पाने वाले शामिल हैं। 2 संयुक्त मामले हैं, जिन्हें एक गिना गया है।

पद्म पुरस्कारों के बारे में

  • यह देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक हैं, जो निम्नलिखित तीन श्रेणियों में दिए जाते हैं-
    • पद्म विभूषण: असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए; 
  • पद्म भूषण: उच्च कोटि की विशिष्ट सेवा के लिए; तथा 
  • पद्मश्री: किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट सेवा के लिए।
    • अन्य नागरिक पुरस्कार भारत रत्न है। यह भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार/ सम्मान है। 
  • इतिहास: इसे 1954 में तीन श्रेणियों के साथ पद्म विभूषण के रूप में शुरू किया गया था। 1955 में इसका नाम बदलकर पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री कर दिया गया।
    • ये पुरस्कार प्रत्येक वर्ष दिए जाते हैं। हालांकि, 1978 व 1979 में और 1993 से 1997 तक ये पुरस्कार वितरित नहीं किए गए थे। 
  • गतिविधियां/ विषय: ये पुरस्कार विविध विषयों/ गतिविधियों से संबंधित क्षेत्रों में दिए जाते हैं। जैसे- कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक कार्य, विज्ञान व इंजीनियरिंग, व्यापार एवं उद्योग, चिकित्सा, साहित्य और शिक्षा, खेल, सिविल सेवा आदि।
    • अपात्रता: सरकारी कर्मचारी, जिनमें PSU में कार्य करने वाले कर्मचारी भी शामिल हैं। हालांकि, चिकित्सक और वैज्ञानिक पात्र हैं।
  • स्थिति: बालाजी राघवन बनाम भारत संघ वाद, 1996 में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि ये पुरस्कार संविधान के अनुच्छेद 18(1) के तहत कोई उपाधि नहीं हैं। इन्हें नाम के आगे या पीछे उपसर्ग या प्रत्यय के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। 
    • अनुच्छेद 18(1) राज्य को सैन्य और शैक्षणिक विशिष्टता को छोड़कर कोई भी उपाधि देने से रोकता है।
  • सीमा: पुरस्कारों की संख्या प्रतिवर्ष 120 तक सीमित है। हालांकि, मरणोपरांत और विदेशी/ NRI के मामले अपवाद हैं। 

सामान्यतः ये पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिए जाते हैं। हालांकि, अत्यधिक योग्य होने की स्थिति में, सरकार व्यक्ति को मरणोपरांत पुरस्कार देने की घोषणा कर सकती है।

राष्ट्रपति द्वारा गणतंत्र दिवस के अवसर पर सशस्त्र बलों के 70 कर्मियों को वीरता पुरस्कार (Gallantry Awards) प्रदान किए गए।

वीरता पुरस्कारों के बारे में

  • स्थापना:
    • युद्धकालीन पुरस्कार: इसमें परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र शामिल हैं। इसकी शुरुआत 26 जनवरी, 1950 से हुई थी।
    • शांतिकालीन पुरस्कार: इनकी शुरुआत 4 जनवरी, 1952 में हुई थी। इसमें अशोक चक्र श्रेणी-I, श्रेणी-II और श्रेणी-III शामिल थे। 
      • 1967 में इनका नाम बदलकर क्रमशः अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र कर दिया गया था।
  • प्रदानकर्ता: ये पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किए जाते हैं, जो सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं।
  • उद्देश्य: युद्ध और शांति दोनों समय में बहादुरी, वीरता या आत्म-बलिदान के कार्यों को मान्यता देना। 
  • चयन प्रक्रिया: रक्षा मंत्रालय वर्ष में दो बार सशस्त्र बलों और केंद्रीय गृह मंत्रालय से वीरता पुरस्कारों के लिए सिफारिशें आमंत्रित करता है।
  • आवृत्ति: वर्ष में दो बार, गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर घोषित किए जाते हैं।

दो मुख्य श्रेणियां

शत्रु का सामना करने के दौरान प्रदर्शित वीरता के लिए:

  • परमवीर चक्र: अत्यंत अदम्य साहस  के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च सैन्य सम्मान।
  • महावीर चक्र: विशिष्ट वीरता के कार्यों के लिए दूसरा सर्वोच्च सम्मान।
  • वीर चक्र: युद्ध के मैदान में बहादुरी के कार्यों के लिए वरीयता में तीसरा।

शत्रु का सामना करने के अलावा (शांतिकालीन) वीरता के लिए:

  • अशोक चक्र: युद्ध के मैदान से दूर वीरता के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च शांतिकालीन पुरस्कार।
  • कीर्ति चक्र: दूसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता सम्मान।
  • शौर्य चक्र: तीसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता सम्मान।

वरीयता क्रम (Order of Precedence): परमवीर चक्र, अशोक चक्र, महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र तथा शौर्य चक्र।

भद्रकाली अभिलेख 12वीं शताब्दी का एक महत्वपूर्ण पुरालेखीय साक्ष्य है। यह अभिलेख सोलंकी वंश के संरक्षण में सोमनाथ मंदिर के ऐतिहासिक और स्थापत्य-संबंधी विकास की प्रामाणिक पुष्टि करता है।

भद्रकाली अभिलेख के बारे में

  • अवस्थिति: यह गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित है। यह 1169 ईस्वी का अभिलेख प्राचीन भद्रकाली मंदिर की दीवार में स्थापित है। 
  • प्रसंग: यह सोलंकी (चालुक्य) राजा कुमारपाल के आध्यात्मिक गुरु, आचार्य भव-बृहस्पति की एक प्रशस्ति (स्तुति लेख) है।
  • कालक्रम:  यह अभिलेख चार युगों में सोमनाथ मंदिर के पौराणिक इतिहास का वर्णन करता है। इसमें उल्लेख है कि मंदिर का निर्माण क्रमशः स्वर्ण, रजत,  काष्ठ (लकड़ी), और अंततः भीमदेव सोलंकी द्वारा पाषाण (पत्थर) से किया गया।  
  • संरक्षण: यह अभिलेख सोमनाथ मंदिर के पुनरुत्थान में सोलंकी वंश की भूमिका को उजागर करता है। यह विशेष रूप से 12वीं शताब्दी में राजा कुमारपाल के प्रयासों का उल्लेख करता है। 

हाल ही में, जम्मू-कश्मीर के जहानपोरा में स्तूपों (मानव निर्मित टीले) की खोज की गई है। यह खोज कश्मीर की समृद्ध गांधार-बौद्ध विरासत तथा बौद्ध संस्कृति एवं शिक्षा के केंद्र के रूप में इसके ऐतिहासिक महत्त्व को रेखांकित करती है।

जहानपोरा स्थल (बारामूला, उत्तरी कश्मीर) के बारे में:

  • यहां से मिली स्तूप संरचनाएं कुषाण काल (पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी) की हैं।
  • यह स्थल कंधार की ओर जाने वाले प्राचीन रेशम मार्ग (Silk Route) पर स्थित है।
  • अन्य महत्वपूर्ण खोजें:
    • लकड़ी से निर्मित अधिरचनाओं के प्रमाण।
    • एक नगरीय बस्ती परिसर, जिसमें संभावित रूप से चैत्य और विहार शामिल हैं।
    • कुषाण युग के मृदभांड और तांबे की कलाकृतियां, आदि।

प्रधानमंत्री ने असम के बोडो समुदाय की समृद्ध विरासत का उत्सव मनाने वाले “बागुरुम्बा दहोउ 2026” (Bagurumba Dwhou 2026) कार्यक्रम में भाग लिया।

बागुरुम्बा नृत्य के बारे में

  • यह असम के बोडो समुदाय का एक पारंपरिक लोक नृत्य है।
  • यह नृत्य प्रकृति से प्रेरित है और खिलते हुए फूलों का प्रतीक है। यह मानव जीवन और प्राकृतिक जगत के बीच प्रेम को दर्शाता है।
  • यह नृत्य मुख्य रूप से युवा बोडो महिलाओं द्वारा किया जाता है। पुरुष पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाकर संगीतकार के रूप में उनका साथ देते हैं।
  • यह आमतौर पर समूहों में आयोजित किया जाता है, जहाँ महिलाएँ घेरा या पंक्तियाँ बनाकर नृत्य करती हैं। यह देखने में बहुत सुंदर लगता है।  
  • सांस्कृतिक महत्व: यह नृत्य शांति, उर्वरता, खुशी और सामूहिक एकता का प्रतिनिधित्व करता है। यह नृत्य विशेष रूप से बोडो नव वर्ष 'बैसागु' (Bwisagu) और 'दोमासी' जैसे त्योहारों के दौरान आयोजित किया जाता है।

भारत के अलग-अलग हिस्सों में फसल-कटाई के पारंपरिक त्योहार मनाए जाते हैं।

  • देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाए जाने वाले ये त्योहार ऋतु परिवर्तन, सूर्य के उत्तरी गोलार्ध में यात्रा शुरू होने (उत्तरायण) तथा फसलों की कटाई के प्रतीक होते हैं।

फसल-कटाई के पारंपरिक त्योहार

  • मकर संक्रांति (महाराष्ट्र): यह सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है।
  • उत्तरायण (गुजरात और राजस्थान): पतंग उड़ाने के लिए प्रसिद्ध यह त्योहार सूर्य के उदय का प्रतीक है। यह आनंद और उल्लास का दिन माना जाता है।
  • पोंगल (तमिलनाडु): यह चार दिनों तक मनाया जाने वाला फसल कटाई का त्योहार है। चार दिनों में थाई पोंगल, मट्टू पोंगल, कानुम पोंगल और भोगी पोंगल मनाए जाते हैं। इस दौरान चावल और दाल से बना व्यंजन ‘पोंगल’ बनाया जाता है।
  • लोहड़ी (पंजाब): मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाने वाला यह त्यौहार रबी फसलों की कटाई का प्रतीक है। यह त्योहार अलाव के चारों ओर लोकगीतों, भांगड़ा और गिद्दा के आयोजनों के साथ मनाया जाता है।
  • माघ बिहू (असम): यह फसल कटाई के मौसम के अंत का त्योहार है। इसे सामुदायिक भोज, पारंपरिक खेलों और ‘मेजी’ को जलाने के साथ मनाया जाता है।
  • कनुमा (तेलंगाना): यह कृषि क्षेत्रक के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का त्योहार है।

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बालाजी राघवन बनाम भारत संघ वाद, 1996

यह एक ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय था जिसने यह स्थापित किया कि पद्म पुरस्कार संविधान के अनुच्छेद 18(1) के तहत उपाधियाँ नहीं हैं और इन्हें नाम के साथ उपसर्ग या प्रत्यय के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 18(1)

भारतीय संविधान का अनुच्छेद जो राज्य को सैन्य और शैक्षणिक विशिष्टता को छोड़कर कोई भी उपाधि देने से रोकता है, ताकि समानता के सिद्धांत को बनाए रखा जा सके।

भारत रत्न

भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार/सम्मान, जो असाधारण राष्ट्रीय सेवा के लिए प्रदान किया जाता है।

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