दूरसंचार, खाद्य वितरण, विमानन: भारतीय बाजार पर हावी दो प्रमुख कंपनियां | Current Affairs | Vision IAS

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संक्षिप्त समाचार

01 Mar 2026

हाल ही में, विमानन क्षेत्रक में इंडिगो उड़ान संकट उत्पन्न हुआ था। इस संकट ने वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति में द्वयाधिकार के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं व चिंताओं को उजागर किया है।

द्वयाधिकार (Duopoly) क्या है?

  • यह एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है, जिसमें दो आपूर्तिकर्ता किसी वस्तु या सेवा के बाजार पर पूरी तरह हावी होते हैं। 
  • भारत में, केवल दो आपूर्तिकर्ताओं वाले बाजार सामान्य होते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए- कैब सेवाओं में ओला (Ola) और उबर (Uber) का द्वयाधिकार। 
  • द्वयाधिकार के बढ़ने के लिए उत्तरदायी कारक:
    • अत्यधिक पूंजी की आवश्यकता: बहुत अधिक निवेश की जरूरत लघु फर्मों के लिए व्यवसाय में प्रवेश करना और अस्तित्व को बनाए रखना कठिन बना देती है। उदाहरण के लिए- विमानन क्षेत्रक।
    • नेटवर्क प्रभाव: बड़ी कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए शुरुआती दौर में अत्यधिक व्यय करती हैं। इससे प्रतिस्पर्धी बाहर हो जाते हैं। उदाहरण के लिए- दूरसंचार क्षेत्रक।
    • विनियामक कमियां: यह प्रभुत्व को और मजबूत करने में सक्षम बनाती है।

द्वयाधिकार से उत्पन्न चुनौतियां

  • कीमतों में बढ़ोतरी और कम सामर्थ्य: प्रतिस्पर्धी दबाव की कमी के कारण प्रमुख कंपनियां बिना किसी विरोध के उत्पादों की कीमतें बढ़ा देती हैं। इससे उपभोक्ताओं के लिए लागत बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए- फूड डिलीवरी।
  • उपभोक्ताओं के पास सीमित बाजार विकल्प: लघु अभिकर्ताओं की कम मौजूदगी होने से उपभोक्ताओं के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं।
  • नवाचार में ठहराव: नवाचार केवल अपने एकमात्र प्रतिद्वंद्वी से बढ़त बनाए रखने के लिए किया जाता है, न कि नए प्रवेशकों के भय से। उदाहरण के लिए- दूरसंचार क्षेत्रक।
  • अत्यधिक लॉबिंग शक्ति और विनियामक प्रभाव: शक्तिशाली द्वयाधिकार संपन्न कंपनियां अपने हितों की रक्षा करने तथा नई तकनीकों को रोकने के लिए अपने प्रभाव का उपयोग कर सकती हैं। उदाहरण के लिए- ई-कॉमर्स क्षेत्रक।
  • प्रणालीगत सुभेद्यता और क्षमता की विफलता: द्वयाधिकार में एक अभिकर्ता की विफलता से अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान हो सकता है और मांग अधूरी रह सकती है। उदाहरण के लिए- विमानन क्षेत्रक में हालिया इंडिगो संकट।

निष्कर्ष

भारत में उभरते द्वयाधिकार को रोकने के लिए केवल "घटना के बाद" के विनियमन से आगे बढ़कर अग्र-सक्रिय बाजार डिजाइन की आवश्यकता है। इसमें भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की शक्तियों को बढ़ाना; CCI और क्षेत्रकीय विनियामकों के बीच समन्वय में सुधार करना; 'रेगुलेटरी सैंडबॉक्स' एवं साझा अवसंरचना के माध्यम से प्रवेश बाधाओं को कम करना तथा उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने के लिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण व डेटा पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करना शामिल है।

मौजूदा विनियामक तंत्र

  • प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002: यह बाजार विरूपण को रोकने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है और प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौतों व प्रभुत्व के दुरुपयोग को रोकता है।
    • भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI): यह प्रतिस्पर्धा कानूनों को लागू करने के लिए जिम्मेदार वैधानिक प्रहरी के रूप में कार्य करता है।
  • क्षेत्रकीय विनियामकों की भूमिका: जैसे- दूरसंचार क्षेत्रक में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI); विमानन क्षेत्रक में नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) आदि।

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) की संशोधित स्टार रेटिंग प्रणाली लागू हो गई है।

  • ऊर्जा दक्षता ब्यूरो की स्थापना ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के तहत एक सांविधिक निकाय के रूप में की गई है।

‘BEE स्टार रेटिंग’ के बारे में

  • यह मानक एवं लेबलिंग (S&L) कार्यक्रम की एक प्रमुख विशेषता है।
  • उद्देश्य: उपभोक्ताओं को बाजार में उपलब्ध उपकरणों की ऊर्जा बचत और उससे होने वाली लागत से संबद्ध बचत की क्षमता के बारे में जानकारी आधारित विकल्प प्रदान करना।
  • जिन उपकरणों के लिए रेटिंग अनिवार्य है: सीलिंग फैन, इलेक्ट्रिक गीजर, ट्यूबलर फ्लोरोसेंट लैंप, कलर टेलीविजन, आदि।
  • जिन उपकरणों के लिए रेटिंग स्वैच्छिक है: सामान्य प्रयोजन औद्योगिक मोटर, कंप्यूटर, माइक्रोवेव ओवन आदि।

कोकिंग कोल को MMDR अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग D में शामिल किया गया है। इस अनुसूची में महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों को सूचीबद्ध किया गया है।

  • यह निर्णय खनिज सुरक्षा सुनिश्चित करने और घरेलू इस्पात क्षेत्रक की आवश्यकताओं को पूरा करने में कोकिंग कोल की रणनीतिक भूमिका को मान्यता देता है।
    • वर्तमान में, इस्पात क्षेत्रक की कोकिंग कोल की लगभग 95% आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी की जाती है। इससे बहुत अधिक विदेशी मुद्रा देश से बाहर चली जाती है। 
  • इस निर्णय से तेजी से मंजूरी मिलने; 'व्यवसाय करने की सुगमता' में सुधार होने और गहरी परतों में दबे कोल निक्षेपों सहित अन्वेषण और खनन गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है।

कोकिंग कोल के बारे में

  • कोकिंग कोल ब्लास्ट फर्नेस (वात भट्टी) मार्ग के माध्यम से इस्पात उत्पादन में एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इसका उपयोग सीमेंट, रसायन और पेट्रोकेमिकल उद्योगों में भी किया जाता है।
  • भंडार: अनुमानित 37.37 बिलियन टन भंडार, जो मुख्य रूप से झारखंड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में स्थित हैं।
  • चुनौतियां: अपर्याप्त घरेलू उत्पादन, उच्च राख (Ash) सामग्री, गहराई में निक्षेप, खानों से जुड़े मुद्दे (जैसे- भूमिगत आगजनी और जमीन धंसना), सीमित भूगर्भीय डेटा और भूमि अधिग्रहण संबंधी चुनौतियां।
  • पहलें: मिशन कोकिंग कोल, वाणिज्यिक कोयला खनन में 100% FDI, राजस्व-साझाकरण नीलामी, और 39 'फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी' परियोजनाएं आदि।

खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम (MMDR Act), 1957 के बारे में

  • यह केंद्र सरकार को खानों के विनियमन और खनिज संसाधनों के विकास के संबंध में कानून बनाने का अधिकार देता है।
  • यह खनन से प्रभावित लोगों व क्षेत्रों के कल्याण के लिए जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) तथा अन्वेषण को बढ़ावा देने एवं अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास (NMET) की स्थापना का प्रावधान करता है।
  • इस कानून में 2023 में संशोधन किए गए थे। इन संशोधनों के माध्यम से निम्नलिखित बदलाव किए गए-
    • 12 परमाणु खनिजों की सूची से 6 खनिजों को हटा दिया गया;
    • केंद्र सरकार को महत्वपूर्ण खनिजों के लिए अनन्य रूप से खनिज रियायतें नीलाम करने का अधिकार दिया गया;
    • 'गहराई में निक्षेपित' और महत्वपूर्ण खनिजों के लिए अन्वेषण लाइसेंस की शुरुआत की गई।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत को फिनिश्ड सिल्वर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए चांदी के प्रसंस्करण की क्षमता बढ़ानी चाहिए और आयात के स्रोतों में विविधता लानी चाहिए।

  • भारत ने वर्ष 2024 में विश्व में चांदी के कुल व्यापार का लगभग 21.4% आयात किया। इससे भारत 'फिनिश्ड सिल्वर' का विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गया है।

चांदी के बारे में:

  • यह एक अपेक्षाकृत नरम और चमकदार धातु है।
  • प्रमुख अनुप्रयोग: चांदी में उच्चतम विद्युत और तापीय चालकता होती है, जो इसे इलेक्ट्रॉनिक्स, सर्किट बोर्ड, कनेक्टर, बैटरी और ऑटोमोटिव सिस्टम के लिए अपरिहार्य बनाती है।
    • चांदी के जीवाणुरोधी गुणों (antibacterial properties) के कारण इसका उपयोग घाव की ड्रेसिंग, चिकित्सा उपकरणों की कोटिंग, कैथेटर, सर्जिकल उपकरणों, जल-शोधन प्रणालियों और औषधि यौगिकों में किया जाता है।
  • प्राकृतिक रूप से उपलब्धता: चांदी मुख्य रूप से अर्जेंटाइट (argentite) और क्लोरार्गाइराइट (हॉर्न सिल्वर) जैसे अयस्कों में पाई जाती है।
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चावल उत्पादन और निर्यात की स्थिति:

  • प्रमुख चावल उत्पादक देश: भारत (150 मिलियन टन), चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, जापान, श्रीलंका और मिस्र।
  • भारत में राज्यवार उत्पादन (2024-25): उत्तर प्रदेश (13.8%), तेलंगाना (11.6%), पश्चिम बंगाल (10.6%), पंजाब (9.5%), छत्तीसगढ़ (7%) आदि।
  • निर्यात: भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है। वर्ष 2024-25 में 20.1 मिलियन मीट्रिक टन चावल का निर्यात किया गया था।
  • भारतीय चावल के प्रमुख निर्यात गंतव्य: सऊदी अरब, ईरान, इराक, बेनिन, संयुक्त अरब अमीरात आदि।

चावल की फसल के बारे में

  • फसल का प्रकार: यह विश्व की प्रमुख खाद्य फसल है और उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का मुख्य आहार है।
  • विकास के लिए अनुकूल दशाएं:
    • भारत में चावल 8°N से 30°N अक्षांश तक और समुद्र तल से लगभग 2,500 मीटर की ऊंचाई तक अलग-अलग परिस्थितियों में उगाया जाता है।
    • यह गाद वाली, दोमट और कंकड़ युक्त मृदा सहित विभिन्न प्रकार की मृदा में उगाया जाता है। इसके अतिरिक्त, अम्लीय के साथ-साथ क्षारीय मृदा को भी सहन कर सकता है।
    • जलवायु: प्रचुर वर्षा (100-150 सेमी), उच्च आर्द्रता तथा उच्च तापमान (दिन के समय 30°C और रात में 20°C)।
      • धान (चावल) एक अर्ध-जलीय पादप है, जिसे अपने वृद्धि वाले मौसम की तीन-चौथाई अवधि के लिए खड़े पानी (औसत 10-15 सेमी) की आवश्यकता होती है।
      • यह 5.5 और 6.5 के बीच pH मान वाली अपारगम्य (Impermeable) उप-मृदा में सर्वोत्तम वृद्धि करता है। 
  • भारत में फसल के मौसम: क्षेत्र के आधार पर चावल तीन अलग-अलग मौसमों में उगाया जाता है:
    • अमन (शीतकालीन चावल): जून-जुलाई में बुवाई और नवंबर-दिसंबर में कटाई।
    • औस (शरदकालीन चावल): मई-जून में बुवाई और सितंबर-अक्टूबर में कटाई।
    • बोरो (ग्रीष्मकालीन चावल): नवंबर और मई के बीच खेती, अक्सर उन क्षेत्रों में जो सर्दियों के दौरान नम रहते हैं।

भारत और विश्व बैंक के बीच 2026–2031 अवधि के लिए नया देशीय साझेदारी फ्रेमवर्क (NCPF) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसके तहत भारत को 8–10 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

NCPF के बारे में

  • यह साझेदारी निजी क्षेत्र के नेतृत्व में रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित करती है। इसके तहत कौशल सुधार; लघु और मध्यम उद्यमों (SMEs) की बाधाओं को कम करने, तथा विशेष रूप से युवाओं और महिलाओं के लिए नए अवसर सृजन को प्रोत्साहित किया जाता है। 
  • NCPF के चार प्रमुख रणनीतिक लक्ष्य:
    • ग्रामीण समृद्धि बढ़ाना और चुनौती से निपटने में सक्षम बनाना: कृषि के अलावा अन्य स्रोतों से आय सृजन के अवसर के माध्यम से;
    • शहरी क्षेत्र में रूपांतरण को बढ़ावा देना: ऐसा इसलिए क्योंकि भारत की शहरी आबादी वर्ष 2050 तक बढ़कर 80 करोड़ होने का अनुमान है;
    • जन सुविधाओं में निवेश करना: स्वास्थ्य-देखभाल, शिक्षा और कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना;
    • ऊर्जा सुरक्षा, मूल अवसंरचना और जलवायु लचीलापन मजबूत करना। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक  परिवहन (ई-मोबिलिटी) पर भी ध्यान दिया जाता है।
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आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण (BEPS) पर OECD/ G20 समावेशी फ्रेमवर्क ने वैश्विक न्यूनतम कर व्यवस्थाओं के समन्वित संचालन के लिए एक 'साइड-बाय-साइड यानी समानांतर' व्यवस्था पैकेज पर सहमति व्यक्त की है।

  • वैश्विक न्यूनतम कर (Global Minimum Tax): यह वैश्विक आधार क्षरण-रोधी (GloBE) मॉडल नियमों पर आधारित है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बड़े बहुराष्ट्रीय उद्यम (MNEs) अपने संचालन वाले प्रत्येक क्षेत्राधिकार में अपनी आय पर न्यूनतम स्तर का कर भुगतान करें। इससे लाभ को दूसरे देशों में स्थानांतरित करना हतोत्साहित होगा और कर प्रतिस्पर्धा की एक सीमा तय होगी। इससे कॉर्पोरेट कर दरों को कम करने की स्पर्धा समाप्त हो जाएगी।
    • आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण (Base Erosion and Profit Shifting: BEPS): BEPS बहुराष्ट्रीय उद्यमों (MNEs) द्वारा उपयोग की जाने वाली कर नियोजन रणनीति है। ये कंपनियां कर का भुगतान करने से बचने के लिए कर नियमों में खामियों और अलग-अलग देशों के नियमों में अंतर का लाभ उठाती हैं। इसके तहत ये उद्यम अपने लाभ को उच्चतर कराधान वाले देशों से निम्नतर कराधान वाले देशों में स्थानांतरित कर देते हैं (जैसे कि ब्याज या रॉयल्टी जैसे कटौती योग्य भुगतानों के माध्यम से)। इस प्रकार वे कर भुगतान से बच जाते हैं। 

वैश्विक न्यूनतम कर पैकेज

  • इस पैकेज में निम्नलिखित पांच घटक शामिल हैं- 
    • सरलीकरण उपाय: बहुराष्ट्रीय उद्यमों (MNEs) और कर प्राधिकरणों के लिए अनुपालन के बोझ को कम करना।
      • MNEs ऐसी कंपनियों के समूह हैं, जो आमतौर पर स्थानीय रूप से निगमित सहायक कंपनियों या स्थायी प्रतिष्ठानों के माध्यम से विश्व भर में परिचालन करती हैं।
    • कर प्रोत्साहन संरेखण: यह कर प्रोत्साहनों के वैश्विक व्यवहार को संरेखित करने के लिए एक लक्षित 'वास्तविक आर्थिक गतिविधि-आधारित' (substance-based) कर प्रोत्साहन 'सेफ हार्बर' प्रस्तुत करता है।
    • पात्र MNEs के लिए सेफ हार्बर्स: यह उन MNE समूहों के लिए उपलब्ध है, जिनकी मूल संस्थाएं (Parent entities) पात्र क्षेत्राधिकारों में हैं और न्यूनतम कराधान आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।
    • समान अवसर: इसमें सभी समावेशी फ्रेमवर्क सदस्यों के लिए उचित व्यवहार सुनिश्चित करने हेतु साक्ष्य-आधारित स्टॉकटेक प्रक्रिया शामिल है।
    • घरेलू न्यूनतम कर संरक्षण: यह विशेष रूप से विकासशील देशों में स्थानीय कर आधार की रक्षा के लिए 'पात्र घरेलू न्यूनतम टॉप-अप कर' व्यवस्थाओं को प्राथमिक तंत्र के रूप में मजबूत करता है।

RBI ने 'भारतीय रिज़र्व बैंक (प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रक को ऋण – लक्ष्य और वर्गीकरण) दिशा-निर्देश, 2025' जारी किए हैं। 

  • PSL का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समाज के कमजोर वर्गों और अविकसित क्षेत्रों को ऋण तक आसान पहुंच प्राप्त हो।

RBI के नवीनतम PSL दिशा-निर्देशों पर एक नजर

  • अनुपालन में वृद्धि और बाहरी लेखा-परीक्षक: RBI ने अब बैंकों के लिए बाहरी लेखा परीक्षकों (या विशिष्ट संस्थाओं जैसे NCDC के लिए CAG-पैनल में शामिल लेखा-परीक्षकों) से प्रमाणन प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया है।
    • यह लेखा परीक्षक यह सुनिश्चित करेगा कि एक ही अंतर्निहित ऋण एक्सपोज़र को मूल बैंक और मध्यवर्ती संस्था (जैसे कि NBFC या सहकारी संस्था) दोनों द्वारा PSL के रूप में दावा न किया जाए।
  • क्षेत्रकीय लक्ष्यों में संशोधन: लघु वित्त बैंकों (SFBs) के लिए PSL लक्ष्य को उनके समायोजित निवल बैंक ऋण (ANBC) के 75% से घटाकर 60% कर दिया गया है।
  • ग्रामीण ऋण के लिए NCDC का समावेश: बैंकों द्वारा राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) को सहकारी समितियों को आगे ऋण देने के लिए दिए गए ऋण को अब आधिकारिक तौर पर PSL के रूप में वर्गीकृत किया जायेगा।
  • अन्य: 
    • बैंकों को PSL लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सह-ऋण प्रदायगी व्यवस्था करने की अनुमति है।
    • बैंकों को कृषि और MSMEs को दिए गए निर्यात ऋण को PSL ऋण के रूप में मानने की अनुमति दी गई है।

हाल ही में, RBI ने 'भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति रिपोर्ट 2024-25' जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय बैंकों का NPA कई दशकों के निचले स्तर पर पहुंच गया है। 2025 के अंत तक सकल NPA (GNPA) अनुपात गिरकर 2.1% हो गया है।

  • मार्च 2025 के अंत तक निवल NPA (NNPA) अनुपात घटकर 0.5% रह गया।
  • बैंकों का GNPA अनुपात 2018 में 11.18% के उच्चतम स्तर पर था।

गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (NPAs) क्या हैं?

  • जब किसी बकाया ऋण या अग्रिम के मूलधन या ब्याज का भुगतान निर्धारित तिथि से 90 दिनों तक नहीं किया जाता है, तब वह ऋण NPA बन जाता है।
    • सकल NPA: उन ऋणों का कुल मूल्य है, जहां ब्याज या मूलधन बकाया है।
    • निवल NPA: यह GNPA में से 'प्रोविजन' को घटाकर प्राप्त किया जाता है।
      • प्रोविजन: यह वह धनराशि है, जिसे बैंक संभावित नुकसान को कवर करने के लिए अलग रखते हैं। 
  • NPAs के प्रमुख चालक: आर्थिक मंदी, धोखाधड़ी करने वाले कर्जदार, ऋण की खराब निगरानी आदि।
  • NPAs से जुड़ी चुनौतियां: उच्च प्रोविजनिंग, बैंकों की ऋण देने की क्षमता में कमी, बैलेंस शीट पर दबाव आदि

NPA कम करने के लिए शुरू की गई प्रमुख पहलें: इन सरकारी और विनियामक पहलों ने NPA को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है:

  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016: इसके तहत तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान के लिए एक समयबद्ध व ऋणदाता-संचालित फ्रेमवर्क तैयार किया गया है।
  • वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन (सरफेसी/ SARFAESI) अधिनियम, 2002: यह सुरक्षित ऋणदाताओं को ऋण चूक की स्थिति में उस संपार्श्विक/ जमानत (collateral) को कब्जे में लेने की अनुमति देता है, जिसके बदले ऋण दिया गया था।
  • परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियां (ARCs): बैंकों ने अपने NPAs को ARCs को बेचकर अपनी बैलेंस शीट को ठीक करना जारी रखा है।
  • अन्य उपाय: सार्वजनिक क्षेत्रक के बैंकों (PSBs) के सुधार के लिए इंद्रधनुष योजना (PSBs में पूंजी निवेश योजना) संचालित की जा रही है; ऋण वसूली अधिकरणों (DRTs) की स्थापना की गई है आदि।

ये पायलट उप-योजनाएं ‘निर्यात संवर्धन मिशन (Export Promotion Mission)’ के निर्यात प्रोत्साहन घटक का हिस्सा हैं। 

नई योजनाओं के बारे में

  • प्री- और पोस्ट-शिपमेंट निर्यात ऋण पर ब्याज सहायता: भारतीय रुपये में लिए गए निर्यात ऋण पर 2.75% (आधार दर) की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
    • अधिसूचित कम-प्रतिनिधित्व वाले या उभरते बाजारों में निर्यात के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन
    • वार्षिक सीमा: वित्त वर्ष 2025–26 के लिए 50 लाख रुपये की अधिकतम सहायता
    • पात्रता: हार्मोनाइज़्ड सिस्टम (HS) 6-अंकीय स्तर पर अधिसूचित सकारात्मक सूची के अंतर्गत आने वाली टैरिफ लाइनें तक सीमित। यह सूची भारत की लगभग 75% टैरिफ लाइनों (मदों) को शामिल करती है। 
  • निर्यात ऋण के लिए संपार्श्विक (कोलेटरल) सहायता: यह योजना सूक्ष्म एवं लघु उद्यम क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (CGTMSE) के साथ साझेदारी में लागू की जाएगी।
    • गारंटी कवरेज:
      • सूक्ष्म और लघु निर्यातकों के लिए 85% तक।
      • मध्यम श्रेणी के निर्यातकों के लिए 65% तक।
    • अधिकतम सीमा: प्रति वित्तीय वर्ष प्रति निर्यातक 10 करोड़ रुपये तक की बकाया गारंटीकृत ऋण राशि।
    • पात्रता: प्रथम (ऊपर उल्लिखित) उप-योजना की शर्तों के अनुसार। 

पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) ने NPS वात्सल्य योजना, 2025 के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

NPS वात्सल्य योजना, 2025 के बारे में

  • नोडल मंत्रालय: केंद्रीय वित्त मंत्रालय।
  • विनियामक निकाय: पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA)।
  • मुख्य उद्देश्य: बच्चों में कम उम्र से ही बचत की आदत डालना और लंबे समय के लिए अनुशासित निवेश को बढ़ावा देना। इससे बच्चों की वित्तीय सुरक्षा और भविष्य की पेंशन की तैयारी सुनिश्चित हो सके।

 

सरकार ने गायों की दो नई कृत्रिम नस्लों; करण फ्राइज़ (Karan Fries) और वृंदावनी (Vrindavani) का पंजीकरण किया है। ये नस्लें अधिक दूध देती हैं। 

  • साथ ही, सरकार ने देशी नस्ल की कुछ नई गायों और भैंसों को भी मान्यता दी है। इनमें मेदिनी (झारखंड), रोहिखंडी (उत्तर प्रदेश) और मेलघाटी (महाराष्ट्र) शामिल हैं।

गाय की कृत्रिम नस्लों का महत्व: यह जलवायु अनुकूलन और रोग प्रतिरोधक क्षमता से युक्त होती हैं। साथ ही, दूध उत्पादन बढ़ाने में सहयक होती हैं। 

इस रिपोर्ट में किफायती आवास के लिए एक परिवर्तनशील परिभाषा प्रदान करती है। इस परिभाषा के अनुसार:

  • महानगरीय शहरों में: एक ऐसी आवासीय इकाई, जिसका कारपेट एरिया 60 वर्ग मीटर तक और मूल्य ₹60 लाख तक हो, किफायती आवास है।
  • गैर-महानगरीय क्षेत्रों में: एक ऐसी आवासीय इकाई, जिसका कारपेट एरिया 90 वर्ग मीटर तक और मूल्य ₹45 लाख तक हो, किफायती आवास है।
    • प्रधान मंत्री आवास योजना-शहरी (PMAY-U) 2.0, 2024 किफायती आवास को उपर्युक्त कार्पेट एरिया और ₹45 लाख से अनधिक मूल्य के रूप में परिभाषित करती है।

किफायती आवास को लेकर की गई मुख्य सिफारिशें

  • ज़ोनिंग सुधार: शहर के मास्टर प्लान और टाउन प्लानिंग योजनाओं के भीतर 'किफायती आवास क्षेत्र' नामित किए जाने चाहिए। इसमें सभी आवासीय भूमि का कम-से-कम 10% किफायती आवास के लिए चिह्नित होना चाहिए। 
    • उदाहरण के तौर पर वियना और दक्षिण कोरिया ने इस दृष्टिकोण को अपनाया है।
  • संक्रमण-उन्मुख विकास (Transit-oriented development: TOD): शहरों द्वारा मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन स्टेशनों के निकटवर्ती क्षेत्रों को अनन्य रूप से मिश्रित-उपयोग विकास के लिए निर्धारित किया जाना चाहिए। इन क्षेत्रों में कार्यालय, वाणिज्यिक स्थान और किफायती आवास का संयोजन होना चाहिए। 
  • आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS)/ निम्न आय वर्ग (LIG) आवास के लिए आरक्षण: 10,000 वर्ग मीटर से अधिक निर्मित क्षेत्र (Built-up area) या 5,000 वर्ग मीटर से अधिक के प्लॉट वाली सभी आवासीय एवं वाणिज्यिक परियोजनाओं में EWS/ LIG आवास के लिए 10-15% निर्मित क्षेत्र का अनिवार्य आरक्षण होना चाहिए।
  • किराया आवास कानूनी ढांचे में सुधार: राज्यों को PMAY-U 2.0 के 'किफायती किराया आवास' (ARH) घटक के अनुरूप, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के माध्यम से समर्पित किराया आवास स्टॉक नीतियां अपनानी चाहिए।

यह संशोधित योजना RBI-विनियमित संस्थाओं द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं से संबंधित ग्राहकों की शिकायतों के समाधान के लिए बनाई गई है। यह 1 जुलाई, 2026 से प्रभावी होगी।

RB-IOS, 2026 की मुख्य विशेषताएं

  • उद्देश्य: RBI द्वारा विनियमित संस्थाओं के खिलाफ शिकायतों के समाधान के लिए एक लागत प्रभावी, त्वरित और गैर-प्रतिकूल वैकल्पिक शिकायत निवारण तंत्र प्रदान करना।
  • RBI ओम्बड्समैन: RBI अपने एक या अधिक अधिकारियों को 'RBI ओम्बड्समैन' और 'RBI डिप्टी-ओम्बड्समैन' के रूप में नियुक्त कर सकता है। सामान्यतः यह नियुक्ति तीन वर्ष की अवधि के लिए होगी।
  • केंद्रीकृत प्राप्ति और प्रसंस्करण केंद्र (CRPC): शिकायतों को प्राप्त करने और उनकी जांच (प्रसंस्करण) करने के लिए RBI एक CRPC स्थापित करेगा।
  • ओम्बड्समैन की शक्तियां: 
    • RBI ओम्बड्समैन के पास लाए जाने वाले विवाद की राशि पर कोई सीमा नहीं है।
    • ओम्बड्समैन के पास ₹30 लाख तक का मुआवजा प्रदान करने की शक्ति है।
  • शिकायत का आधार: किसी विनियमित संस्था (बैंक, NBFC आदि) द्वारा की गई ऐसी चूक या कार्य जिसके परिणामस्वरूप सेवा में कमी आई हो।
  • अपील: विनियमित संस्था या शिकायतकर्ता निर्णय के विरुद्ध 30 दिनों के भीतर अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपील दायर कर सकते हैं।
  • नोडल अधिकारी: विनियमित संस्था अपने मुख्य कार्यालय में एक प्रधान नोडल अधिकारी नियुक्त करेगी। यह अधिकारी दर्ज की गई शिकायतों के संबंध में जानकारी प्रस्तुत करने के लिए उत्तरदायी होगा।

  • वैश्विक आर्थिक संभावनाएं (GEP): विश्व बैंक द्वारा जारी की गई।
    • यह रिपोर्ट वर्ष में दो बार (जनवरी और जून) प्रकाशित की जाती है। यह वैश्विक आर्थिक संवृद्धि की संभावनाओं का आकलन करती है।
    • भारत की संवृद्धि दर के अनुमान में संशोधन: वित्त वर्ष 2025–26 के लिए 7.2% की संवृद्धि दर का अनुमान है। जून 2025 की रिपोर्ट में 6.3% संवृद्धि दर का अनुमान लगाया गया था।
      • कारण: मजबूत घरेलू मांग, निजी उपभोग व्यय का बढ़ना, कराधान में सुधार तथा ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक घरेलू आय में वृद्धि।
    • वैश्विक व्यापार संवृद्धि: 2025 की 3.4% दर से घटकर 2026 में 2.2% रहने का अनुमान।
    • ऋण का उच्चतम स्तर: उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों (EMDEs) में सरकारी ऋण बढ़कर GDP के लगभग 70% हो गया है। यह विगत 55 वर्षों का उच्चतम स्तर है।
  • ILO की “रोजगार और सामाजिक रुझान 2026” रिपोर्ट: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा जारी किया गया।
    • गुणवत्तापूर्ण रोजगार में प्रगति बाधित हुई: 2015–2025 के बीच कामकाजी लोगों में अत्यधिक गरीबी में केवल 3.1% की आंशिक गिरावट दर्ज की गई।
    • अनौपचारिक क्षेत्रक में रोजगार में वृद्धि: 2026 तक वैश्विक स्तर पर 2.1 बिलियन श्रमिकों के अनौपचारिक क्षेत्रक में कार्यरत होने का अनुमान है।
    • वैश्विक विनिर्माण क्षेत्रक में भारत की हिस्सेदारी 3% है।
  • वैश्विक निवेश रुझान मॉनिटर (GITM): संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास (UNCTAD) द्वारा जारी किया गया।
    • 2025 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 73% बढ़कर 47 अरब डॉलर हो गया।
      • निवेश बढ़ने के कारण: वित्तीय, आईटी और R&D जैसे सेवा क्षेत्रकों में बड़े निवेश; विनिर्माण क्षेत्रक में बढ़ता निवेश; भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़ने वाली सरकारी नीतियां।

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भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI)

यह भारत में दूरसंचार सेवाओं को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार एक सांविधिक निकाय है। TRAI ने डेटा सेंटर प्रोत्साहन योजना (DCIS) और डेटा सेंटर आर्थिक क्षेत्र (DCEZs) जैसी पहलों की सिफारिश की है।

नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA)

भारत में नागरिक उड्डयन का नियामक निकाय। यह विमानन सुरक्षा मानकों, हवाई यातायात नियंत्रण और एयरलाइंस के संचालन की देखरेख करता है।

रेगुलेटरी सैंडबॉक्स

एक नियंत्रित वातावरण जहां वित्तीय प्रौद्योगिकी (फिनटेक) कंपनियां नए उत्पादों, सेवाओं और व्यावसायिक मॉडल का परीक्षण कर सकती हैं, जिसमें नियामक पर्यवेक्षण होता है। इसका उद्देश्य नवाचार को बढ़ावा देना और प्रवेश बाधाओं को कम करना है।

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